रविवार, 25 जनवरी 2015

विचारधारा से प्रेरणा

इतिहास गवाह है कि कालानुक्रम में विचारधारा से प्रेरीत होकर विभिन्न संगठनों का उद्भव और विकास हुआ है। एक विचारधारा या क्रान्ति अपने साथ नए संगठनों को भी जन्म देता है। जब भी किसी एक राष्ट्र, भौगोलिक क्षेत्र या फिर विश्व के कोने में विचारधाराओं से प्रेरीत आंदोलन हुए हैं तब उन आंदोलनों के बाद नए संगठनों का  जन्म हुआ है जो बाद में शासन प्रक्रिया में भी अहम भूमिका निभाते हैं। मार्क्स के सर्वहारा वर्ग की क्रान्ति से चलकर लेनीन और स्टालिन तक तथा फिर बाद में भारत की वामपंथी पार्टीयों के रुप में एक विचारधारा ही चली आ रही है। माओत्से तुंग और चीनी क्रान्ति से प्रभावित होकर माओवादियों का उद्भव हुआ। इतिहास के पन्नों को पलटने को पर हमें यह भी मालुम चलता है कि फासीवाद और नाजीयों से प्रेरीत होकर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संध का उद्भव और विस्तार हुआ था। पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार श्रीलंका में बोडू बाला सेना नामक सिंहली बौद्धों का एक संगठन, संघ और नरेन्द्र मोदी से इस कदर प्रभावित है कि वे मोदी को अपना आदर्श मानते हैं तथा संघ की विचारधारा और संगठनात्मक ढांचे को आत्मसात करने की बात करते हैं।     
बोडू बाला सेना का इतिहास यह बताता है कि यह एक कट्टरपंथी संगठन है। यह संगठन कथित तौर पर श्रीलंका के बौद्धों के लिए आवाज उठाता है। पिछले वर्ष श्रीलंका में हुए मुस्लिम विरोधी दंगे में इनकी भूमिका पर संयुक्त राष्ट्र और यूरोपिय संघ चिंता जाहिर कर चुके हैं। इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट में सेना के एक उच्चस्थ नेता बताते हैं कि भारत की तरह श्रीलंका में भी धर्मांतरण का खतरा मंडरा रहा है। अल्पसंख्यक ज्यादा बच्चे पैदा कर जनसंख्या के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं, और इसमें विदेशी पैसा लगा है जिसे हम रोकने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए मोदी और उनकी पार्टी हमारे लिए प्रेरणा है।  श्रीलंका में सेना को एक बाहरी तत्व तथा धार्मिक पुलिस के रुप में देखा जाता है जो कि अल्पसंख्यको को अपना निशाना बनाता है  और अल्पसंख्यक वोट बैंक के प्रभाव पर सवाल खड़े करता है।
बोडू बाला सेना का प्रेरणा बना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास भी इसको प्रेरीत ही बताता है। संघ का इतिहास बताता है कि 1920 से 30 के दशक में जब इसकी स्थापना हुई थी तब यह भी इटली की फासीवाद से प्रेरीत था। फ्रंटलाइन की कवर स्टोरी में इस बात का जिक्र किया गया है कि संघ के संस्थापक हेडगवार के करीबी रहे डा. बी एस मुंजे 1930 के दशक में इटली गए थे और उन्होनें मुसोलिनी से मुलाकात की थी। नेहरू स्मृति संग्राहालय सह पुस्तकालय में रखी उनकी डायरी में उन्होनें मुसोलिनी से अपनी मुलाकात का वर्णन किया है। उन्होनें मुसोलिनी से कहा था कि मैं भारत में भी एक लड़ाका पीढ़ी तैयार करना चाहता हूं। मैनें भारत में एक संगठन की शुरुआत की है जिसके उद्देश्य आपसे प्रेरीत हैं। इटली से वापस लौटकर मुंजे ने हेडगवार के साथ मिलकर संघ का विस्तार किया। प्रकाशित लेखों तथा अन्य दस्तावेजों से यह साफ जाहिर होता है कि 1920 से 40 के दशक में सारे हिन्दु संगठन फासीवाद से प्रेरीत थे। मुसोलिनी के फासीवाद की तर्ज पर संध का विस्तार हुआ। दरअसल फासीवाद के लड़ाका प्रशिक्षण तरीके को अपनाते हुए इन संगठनों का विस्तार हुआ।
 एक ही विचारधारा से बंधे रहने पर उसपर सवाल उठने लाजमी हैं क्यूंकि किसी भी विचारधारा कि उत्पति तात्कालिक परिस्थितियों के अनुरुप होती है। फासीवाद के प्रेरणा से संघ का विस्तार होना तथा फिर अब संघ से प्रेरीत होकर श्रीलंका के बोड़ू बाला सेना की गतिविधियां आज के लोकतांत्रिक समाज से मेल नही खाती हैं। ये माना जा सकता है कि गुलाम भारत में राष्ट्रवादी सोच के प्रचार प्रसार के लिए संध की स्थापना हुई थी पर आज के दौर में वैसा राष्ट्रवाद प्रासंगिक नहीं है। आज हम आजाद हो चुके हैं और दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश के रुप मे पहचान रखते हैं। धर्म आधारित राष्ट्रवाद आज के दौर में समझ से परे लगता है। लोकतंत्र में फासीवाद का कोई स्थान नहीं है। राष्ट्रवादी उद्देश्य के होने पर भी संघ को अपनी कार्यशैली के साथ-साथ सोच में भी बदलाव लाना होगा। श्रीलंका की बोड़ू बाला सेना ने संघ से प्रेरीत होकर जिस प्रकार कि छवि बनायी है वह भी संघ की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करती है।
किसी विचारधारा से प्रेरीत होना कोई गलत बात नहीं है। प्रत्येक विचारधारा का आकलन करने पर उसकी खामियों के साथ-साथ उसकी अच्छाइयां भी नजर आती हैं। विचारधारा केवल एकनिष्ठ नहीं होती बल्कि यह समाज पर आधारित और वर्ग विशेष होती है। विचारधारा थोपी भी नहीं जा सकती है बल्कि यह आत्मसात करने के लिए है। यह दूसरों के प्रेरीत करने के साथ-साथ प्रभावित भी करती है। यह अंतहीन है और इसका प्रभाव पीढी दर पीढ़ी होता है। हालांकि इससे प्रेरीत और प्रभावित होने वालों की संख्या मे कमी आ सकती है पर विचारधारा अमरणशील है। यह उग्रवादी होने के साथ-साथ साम्यवादी भी हो सकती है और समाजवाद के दौर में अधिनायकवादी भी। विचारधारा के प्रवाह के क्रम में परिस्थिति, देश तथा काल के अनुसार परिवर्तन होता है। इसे परिवर्तित रुप में ही अपनाया जाना चाहिए। परिवर्तन के क्रम में इसमें कालानुसार संशोधन भी होना चाहिए। ऐसी विचारधारा जो कि आज से सौ साल पहले थी उसको यदि समय, देश तथा काल के अनुसार अंगीकार नहीं किया गया तो उसके प्रतिकूल परिणाम भी सामने आ सकते हैं। बेहतर होगा कि कि संघ अपनी कार्यशैली और सोच में बदलाव लाए जिससे बोड़ू बाला सेना जैसी संस्थाएं प्रेरीत होकर लोकतंत्र के प्रसार में सहायक हों। फासीवादी सोच और तकनीक में परिवर्तन की आवश्यकता है।  

          

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