गुरुवार, 15 जनवरी 2015

बेटी



 नन्हीं सी कली के आगमन में
कहीं बाजे है बधाइ , कहीं साजे है शहनाइ
नन्हीं सी कली के आगमन में
कराहती वो माई, झुमे है वो भाई
बिटीया का आना, किसी ने नहीं था जाना
किसी का प्यार से गोद में लगाना
किसी को नहीं लगा सुहाना
कोई प्यार लुटाता ,कोई दुत्कार के बुलाता
किसी की बेरुखी उसे बिल्कुल नहीं भाता
दोहरा रवैया बचपन से झेली थी
भाई के जैसा कभी नहीं खेली थी
कल्पना के सागर में अकेले ही गोते लगाती
दुनिया के प्रतिबंधों पर दिल को समझाती
खुद को मनाती, अपने शौक को दफनाती
मनुहारी समाज की रीतियों में पलती
हुई सयानी बेटी की कहानी
बापू की चिंता बढ़ने लगी थी
एक नयी बोझ से लदने लगी थी
बिटीया हुई जवान पर नहीं मिला कद्रदान
सड़कें सवाल करती थीं
समाज आइना दिखाता
व्यवस्था का संरक्षण भी था
पर, पर सपनों पर पहरे लगे थे
बेटी होना सताता था
कोई नहीं गले लगाता था
किसी को हवस की आग थी
कोई पैसों पर बेचता था
सबकी अपनी उत्कंठा थी
भाग्य खुद को कोसता था।
अपने पराया कहते
दुनिया संवेदना दिखाती
बेटी चली ससुराल
लिए अतीत का जंजाल.
बेटी अब औरत है, ममता की मूरत है
परिवार की गिरह है, सास की जिरह है.
बापु का अभिमान है, पति का सम्मान है

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