बुधवार, 21 जनवरी 2015

हमारी अधूरी कहानी-जनता परिवार

               मन कर रहा है अपने उन साथियों से एक फिर से हाथ मिलाने का जिनसे कभी ढ़ेर सारे मुद्दों पर मतभेद के चलते अनबन हो गया था।  तब भी हमारे आदर्श एक थे और अभी भी एक ही है। हमारे बीच अनबन का सबसे बड़ा कारण था कि हम सबको यह जताना चाहते थे कि अपने गुरु के आदर्शों का पालन हम सबसे अच्छा करते हैं। हम ना सही हमारे गुरु ने तो जनता के बीच एक ऐसी छवि बनायी ही थी कि उसी के दम पर हम अपनी सामाजिक और राजनीतिक रोटियां सेक सकते थे। हमने ऐसा करने में अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। ऐसा करते करते अब आगे निकलने की होड़ में हमारे बीच टकराव पैदा हो गए हैं। हमने एक दूसरे से किनारा कर लिया लेकिन हमारे मान्य आदर्श पूराने ही रहे। हमारी पद्धती एक दुसरे से भिन्न थी। आदर्श हमारे लिए उतना मायने नहीं रखते जितना की सत्ता हासिल करने की महत्वाकांक्षा  रखती है। किसी भी तरीके से शासक बनने की जद में हमनें एक दूसरे के उपर कीचड़ भी उछाले। कथित तौर पर हम सब लोहिया के विचारों की विचारों की उपज है। जयप्रकाश आंदोलन की वैचारिक क्रान्ति हमारी विरासत रही है। हम समाज के असली धरोहर हैं। समाजवाद हमारा एकमात्र लक्ष्य है।
              हमने समाज को पहचाना, उसे जातीगत आधार पर श्रेणीबद्ध किया। हम गरीबों के असली नुमाइंदे हैं क्यूंकि सत्ता में रहकर उनके लिए एक से बढ़कर एक नीतियां और योजनाएं चलायी। चूंकि हम गरीबों का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए उन योजनाओं का सबसे ज्यादा लाभ हमने लिया। अपने सगे-संबंधियों सहीत अपने काम में मदद करने वालों के लिए भी हमने विशेष प्रयास किये। आखिर टुटे रिश्ते का दर्द हमसे ज्यादा कौन समझ सकता है। समाज के उस तबके के लिए जो अब तक वर्ण- व्यवस्था के आधार पर हाशिए पर धकेल दिया गया था, उनके लिए तो मसीहा का काम किया है। हम उनसे भावनात्मक लगाव रखते हैं, उन्हें अपने मोहपाश में इस तरह बांध लिया है कि हमारे एक आह्वान पर वे उमड़ कर हमारे साथ खड़े होते हैं। हमनें उन्हें यह भरोसा दिलाया है कि उनके हर एक समस्या के लिए हम जहां तक संभव हो सके आवाज उठाएंगे। केन्द्र सरकार को भी हिला कर रख देंगे। उन्हीं के लिए तो हमने अब तक की संभवतसारी सरकारों को कभी बाहर से तो कभी अंदर से समर्थन प्रदान किया है। अब इस सरकार को हमारी जरुरत नहीं है इसलिए तो हमने ये फैसला किया है कि इसका मुकाबला हम एकजुट होकर करेंगे। हमने समाज को एक अलग नजरिए से देखा जिसके आधार पर उसका विभाजन किया। धर्म के आधार पर, जाती के आधार पर, सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर और अपनी विशेषीकृत सोच के आधार पर हमने समाज को बांटकर परंपरागत रुढियों को और ज्यादा सशक्त बनाया। इस तरह से हमनें संस्कृति और सभ्यता को बचाये रखनें में भी अक्षुण्ण योगदान दिया।
              कहने को तो हम अलग थलग थे पर हमने सामाजिक वर्गीकरण की एक ऐसी पद्धति चुनी जिसके अंतर्गत हमने समाज को आपस में बांट लिया। किसी ने एक वर्ग को अपना साधन समझा तो किसी ने एक वर्ग को अपना मोहरा बनाया। आखिर हमने जिस वर्ग के प्रतिनिधित्व करने का फैसला किया था वही तो हमारे सत्ता की सीढ़ी थी। अपने इन मोहरों से खेलते हुए हमने सत्ता का स्वाद भी चखा। अब आप हमसे सवाल करेंगे की हमने जिनको सत्ता का साधन बनाया उनके लिए क्या किया? हम तो सिर्फ एक ही बात जानते हैं कि हम उनके सच्चे हितैषी हैं, हम उनसे भावनात्मक लगाव रखते हैं। उनके हर एक दुख दर्द में शामिल होते हैं, उनसे अभी भी अपील करते हैं अन्याय और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने के लिए ताकि उनमें असंतोष की भावना नहीं फैले। अब बताइए इससे ज्यादा और क्या कर सकते हैं। हमनें अपनी तरफ से जो भी बन पड़ा उनके लिए किया। हम अलग इसलिए हुए थे कि एक साथ आपस में सत्ता सूख बांटनें में परेशानी हो रही थी। एक परिवार के सदस्यों की संख्या में इजाफा हो जाने से स्वाभाविक है कि थोड़ी कलह होगी।
              सत्ता में रहते हुए हमारी कुछ और भी उपलब्धियां हैं मसलन, जंगल राज की स्थापना, चारा घोटाला, भाई-भतीजावाद का प्रसार, दलित से महादलित का निर्माण, मंडल कमीशन, वगैरह वगैरह। हम सत्ता के भूखे थे, क्यूंकि हमें पता था कि हमारा सर्वोच्च लक्ष्य बिना सत्ता हासिल किए मुमकिन नहीं है। हम सम्पूर्ण भारत-वर्ष में अपना दबदबा रखते हैं। यद्दपि हमारे बीच बिखराव हो गए थे तथापि पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण में हमारे घटक मौजूद थे। हमनें सत्ता के लिए क्या कुछ नहीं किया? कृष्ण ने जिस प्रकार गीता में शाम, दाम, दण्ड, भेद का पाठ अर्जुन को पढ़ाया था, सही मायनों में हमने उसे आत्मसात किया है। हमनें लोगों को लालच दिया, झुठा भरोसा दिया और उनके साथ छल भी किया। हमनें अपने विरोधियों को दण्ड देने के लिए जंगल राज का मॉड़ल चुना। उनके बीच आपस में विद्वेष बढ़ाने के उद्देश्य से मंड़ल कमीशन के रुप में आरक्षण सुनिश्चित करते हुए प्रायोजित दंगे भी कराए। हां, लोकतंत्र के प्रति निष्ठा रखने के मामले में हमारा कोई सानी नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में मतों की कीमत सबसे ज्यादा होती है। हमनें उनका मुल्य समझा, उनकी खरीद- बिक्री की। हम तो यही कहेंगे कि हमने जिस तरह से दल-बदल को अपनाया है उसी का यह नतीजा है कि आज भारत में बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था सांस ले रही है।
                हम आज बिखराव के दौर में हैं। जिस सामुहिक लक्ष्य के साथ हम एकजूट हुए थे वह समय के साथ व्यक्तिगत हो गया। हमने अपना अलग-अलग रास्ता चुन लिया। हमारे विरोधियों ने भी हममें फूट ड़ालने की कोशिश की और कामयाब हो गए। चूंकि हम समाज के अलग-अलग वर्गों तथा असमान भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते थे अतएव आसानी से टूट गए। हमें बहकाया गया इसलिए हमनें एक दुसरे के साख पर कीचड़ भी उछाले। एक दूसरे पर हमले किए और आपस में धूर विरोधी भी बन गए। पर, उस बिखराव के दौर में भी हमनें अपनी नियत नहीं बदली ना ही शासन के अपने तरीके में परिवर्तन किया। हमसे गलती भी हुई। हमनें अपने आदर्शों को पीछे छोड़ दिया था। जिस बुनियाद पर हमारी दीवार खड़ी हुई थी, हमें उसका ख्याल नहीं रहा था। यही कारण है कि हम भरभराकर टूट गए। अपने गुरु के दिए तालीम को भूल जाने से ही हमारा क्षय हुआ। हमारी टूट का एक और कारण यह भी था कि जिस राजनीतिक पद्धति के सहारे हम चल रहे थे, वैसा ही तरीका हमारे विरोधियों ने भी अपना लिया था। हम गरीब तबके से आते थे इसलिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन और संगठनात्मक ढ़ांचा मौजूद नहीं था, जबकि विरोधी साधन-संपन्न थे। उनका संगठनात्मक ढांचा भी हमसे ज्यादा व्यापक और मजबूत था। जिस तरह से हमनें अपने से अनुभवी और पुराने लोगों को चूनौती दी थी और उनसे आगे भी निकल गए थे, ऐसा लग रहा था कि हम पूरे भारत में अपना एकाधिकार जमा लेंगे। पर हमारा दांव उल्टा पड़ गया था। विरोधियों ने हमारे तरीके को ही आत्मसात कर हमें तोड़ते हुए हरा दिया था।
              अब एक बार फिर से हम एक होना चाहते हैं और इसके लिए जनता से कुछ नए वादे भी किए हैं। अपने विरोधियों पर सामूहिक प्रहार करना चाहते है। विरोधी अब हमारे अस्तित्व को चूनौती दे रहे हैं। हमें अपने आदर्शों की और मुड़ना होगा। समाजवाद के सपने को साकार करने की खातिर हमारा पून; एकजूट होना आवश्यक है। हम वही जनता परिवार हैं जिसने भारतीय इतिहास में पहली बार कांग्रेस मुक्त भारत का सपना दिखाया था। हम लोहिया और जयप्रकाश के विचारों और आंदोलन की उपज है। अब एक बार फिर से हम एक होना चाहते हैं। अपने विरोधियों पर सामूहिक प्रहार करना चाहते है। विरोधी अब हमारे अस्तित्व को चूनौती दे रहे हैं। हमें अपने आदर्शों की और मुड़ना होगा। समाजवाद के सपने को साकार करने की खातिर हमारा पून; एकजूट होना आवश्यक है। हम वही जनता परिवार हैं जिसने भारतीय इतिहास में पहली बार कांग्रेस मुक्त भारत का सपना दिखाया था। इस बार हम अपने आदर्शों पर टिके रहने की कोशिश करेंगे और अपनी पद्धति में भी बदलाव लाएंगे। पिछली गलतियों से सबक लेते हुए इमानदार प्रयास करेंगे। जनता के खोए भरोसे को वापस हासिल करेंगे। वर्तमान में कमजोर दिख रहे विपक्ष को मजबूत बनाएंगे। हम साथ आएंगे और जेपी के सपने को साकार करेंगे।    
                                                                                                    


   

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