बुधवार, 11 मार्च 2015

विरोध किससे है?


दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र भारत में इन दिनों लोकतंत्र के मान्य आदर्शों को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चल रही इस बहस को बीबीसी द्वारा बनाई डाक्यूमेंट्री भारत की बेटीने एक नया आयाम दे दिया है। नई बहस इस बात को लेकर है कि क्या बीबीसी को निर्भया कांड के मुख्य आरोपियों में से एक मुकेश के साक्षात्कार को दिखाया जाना चाहिए या नहीं? दूसरी बहस इस बात को लेकर है कि बलात्कार के आरोपियों के वकील द्वारा कही गई बातें जायज हैं या नहीं?    

यदि हम लोकतंत्र के पैरोकार हो सकते हैं तो फिर किसी बलात्कारी को क्यूं नहीं सुन सकते हैं? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उसे भी है। यदि लोकतंत्र में भरोसा करते हैं तो फिर उस संस्थान बीबीसी को क्यूं भला- बूरा कह रहे हैं जिसने लोकतंत्र को उसके शिखर पर पहुंचाया। बीबीसी ने लोकतंत्र को किशोर से जवान बनते देखा है। दुनिया मानती है कि बीबसी ने लोकतंत्र के प्रसार और मजबूती के लिए एक स्तंभ की भूमिका निभाई है। बलात्कारी क्या सोचता है ये जानना उतना ही जरुरी है जितना कि उसका विरोध करना। असली बलात्कारी तो उसकी सोच ही है। जड़ तो अभी भी सांसे ले रहा है। सोच को मारना होगा। बलात्कारी तो खुद ही मर जाएगा। बीबीसी ने इसी सोच को दिखाया है जो अब तक जिंदा है।

इस बात को लेकर भी चर्चा हो रही है कि जब ये मामला अदालत के विचाराधीन है तब क्या इस डाक्यूमेंट्री को सार्वजनिक रुप से प्रसारित किया जाना चाहिए? डाक्यूमेंट्री में आरोपी पक्ष के वकील ने बलात्कार के कारणों और महिलाओं के संदर्भ में जो बाते कहीं हैं उसकी घोर निंदा की जानी चाहिए। भारतीय समाज की सोच वैसी नहीं है जो उस वकील ने साक्षात्कार में दर्शायी है।  वकील की दलील के मायने समझना जरुरी है। उसने ये बात आदालत के सामने कही होती तो समझा सकता था कि वह अपने पक्ष को बचाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे ये बात समझनी चाहिए थी कि वो एक प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय समाचार चैनल को साक्षात्कार दे रहा था। यदि एक भारतीय कानूनची जब इस प्रकार की बातें कर रहा हो तब पूरी दुनिया में भारत की छवि धूमिल होती है।

बलात्कार के एक आरोपी मुकेश की सोच को दुनिया के सामने लाया जाना जरुरी था। एक बलात्कारी क्या सोच कर इस तरह का घिनौना काम करता है, ये जानना जरुरी इसलिए है क्यूंकि हम बलात्कार के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। इसी सोच को तो खत्म करना है। साक्षात्कार के दौरान आरोपी को तनिक भी अपराधबोध नहीं होना हमारी अब तक की लड़ाई पर सवाल खड़े करता है। इसका सीधा मतलब है कि अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। हमे और भी मजबूती से लड़ने की जरुरत है।

ऐसा क्यूं होता है कि हम किसी को बस प्रतीक मानकर रह जाते हैं? उस पीड़िता को भारत की बेटी बनाकर हमने उसके लिए क्या किया है। उसे एक नया नाम दिया है, उसके नाम पर सरकारी फंड बनाया है और आने वाले दिनों में सरकारी योजनाएं चलाई जाएंगी। ये भी हो सकता है कि राष्ट्रपिता और राष्ट्रकवि के जैसे उसको भी इतिहास मानकर जयंती और पुण्यतिथि मनाने की प्रथा शुरु कर दें। हम लड़ किससे रहे हैं? नाम से या प्रतीकों से? यदि हमारी लड़ाई इनसे है तो फिर बलात्कार और बलात्कारी से लड़ने की बात महज ढोंग है।

लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार मिला है। बीबीसी सभी के लिए वो मंच मुहैया कराती है। दरअसल, बात केवल बीबीसी की ही नहीं है। हाल ही में मुम्बई के उर्दु दैनिक अवधनामा की संपादक शिरीन दलवी के खिलाफ फतवा जारी होना किस प्रकार की स्वतंत्रता को दर्शाता है? बीबीसी ने शिथिल और जड़ हो चूके आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की है। बहस, आरोपी बलात्कारी की सोच और उसके वकील की दलील पर होनी चाहिए। लोकतंत्र में विरोध करने की आजादी सभी के पास है।

 

रविवार, 8 मार्च 2015

"ना" के असर ...लप्रेक

हम दोनों के ना कहने में बड़ा फर्क है। कहने के भावों में, कारण में, आवाज की तीव्रता में, परिस्थितियों में और उसके बाद पड़ने वाले प्रभाव में बहुत अंतर है।
नहीं ऐसा नहीं है बाबू!! तुम्हें ऐसा क्यूं लगता है?? तुम क्या सोचते हो कि मैं बहाना करती हूं या तुमसे झूठ बोलती हूं। तुम्हारी कसम!!! मैं कभी तुमसे झूठ नहीं बोली।
अरे पागल!!!  मैनें कब कहा कि तुम मुझसे झूठ बोलती हो?? यदि ऐसा है तो फिर मैं भी तो कभी-कभी ना कहता हूं। तो क्या मैं तुमसे झूठ बोलता हूं?? मेरे कहने का मतलब ये नहीं था।
तो क्या मतलब है तुम्हारा??  यही कि मैं जानबूझ कर नाबोलती हूं?? तुम्हे मुझपर इतना सा भी भरोसा नहीं है!! तुम मुझे कभी समझ नहीं पाओगे। चाहे मैं कुछ भी कर लुं तुम्हारे लिए, तुम्हे हर बात में मेरी ही गलती नजर आएगी। तुम मुझे ही दोष दोगे।
चूप करो तुम अब। पूरी बात सुनती ही नहीं हो और बोलने लगती हो। साला, प्यार को फील करने में भी बड़ी मुसीबत है। जब भी थोड़े दार्शनिक खयाल आते हैं, तुम बिना मिमांसा किए कारण-प्रभाव तक पहुंच जाती हो। लगता है कि मिल, लॉक”  और अरस्तु से बहुल ज्यादा ही प्रभावित हो। अच्छा होता यदि प्लेटोऔऱ कांट”  द्वारा प्रतिपादित तत्वमिमांसा को भी जान लेती।
देखो!!! मुझे फिलॉस्फी मत पढ़ाओ। बहुत बोझिल विषय है। जो कहना है साफ-साफ कहो..सीधी बात..वैसे भी तुम्हे पता है ना कि आजकल दर्शन पढ़ना ही कौन चाहता है, सब शॉर्टकट के फेर में हैं। आजकल सब चीजों का शॉर्टकट भी हो गया है। मुझे भी यही पसंद है।
सही कह रही हो तुम। तुम अब शॉर्टकट में प्यार भी करने लगी हो। लेकिन एक बात याद रखना ये शॉर्टकट होता तो बड़ा सरल है पर इसकी कोई गारंटी नहीं है।

       देखो, तुम फिर से मुझे गलत ठहराने लगे। अरे मैनें तो बस यूं ही कह दिया था। मुझे प्यार में शॉर्टकट  नहीं  पसंद  है। मैं अपने प्यार को जीना चाहती हूं, महसूस करना चाहती हूं लम्बे वक्त तक। अब मुझे बताओ कि तुम क्या कहने वाले थे। वही नावाली बात। कब से फिजूल में लड़ रहे हैं हमलोग।
             
        जब मैं रात में फोन पर बात करते वक्त मैं तुमसे पूछता हूं कि , तुम्हे नींद लग रही है?  तब तुम कैसे  ना बोलते हो। जैसे लगता है कि अभी-अभी कोई परीक्षार्थी नींद से जगा है और पिता के पूछने पर तपाक से कहता हैं कि नहीं , मैं सोया ही कब था। जब मैं तुमसे किसी छूट्टी वाले दिन मिलने के लिए बाहर आने को कहता हूं तब तुम किस भाव से कहते हो कि नहीं बाबू, आज घर पर सभी लोग हैं, मैं कोई बहाना भी नहीं कर सकती। तुम मेरे घर की तरफ आ जाओं मैं तुम्हें कम से कम एक नजर  देख लूंगी। ऐसा लगता है जैसे खेल में हार जाने के बाद विरोधी खिलाड़ी को बधाई दे रही हो, क्यूंकि तुम्हारी आने की उतनी ही चाहत होती है जितनी की खेल में किसी भी तरह जीत जाने की। पर यहां विरोधी खिलाड़ी यानी तुम्हारे घर वालों की उपस्थिति बहुत बढ़िया खेल दिखा रही होती है। मैं इसी तरह कीना कहने की बात कर रहा था। मेरे पर इन दोनों नाअसर भी अलग-अलग होता है।
                

   हाहाहाहा, बाबू तुम भी ना!!!!  और अपनी बात नहीं करोगे , जब मैं तुमसे कहती हूं कि तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, खांसी भी है इसलिए तुम आराम करो कल मिल लेंगे और बात करेंगे। तब तुम फोन को तकिए से दबा के खांस लेते हो और फिर सांस को अंदर भर कर कहते हो किनहीं बाबू, मैं ठीक हूं और मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है। I am fit and ok.” तो ऐसा लगता है जैसे मरीज अपने परिजनों को ढ़ाढ़स बंधा रहा है और चिंता नहीं करने की सलाह देता है। मेरी स्थिति वैसी होती है जैसे परिजन सबकुछ जानते हुए भी थोड़ी देर के लिए खुश हो जाते हैं और फिर उपचार के बाकी इंतजामों का जुगाड़ उत्साह और जोश के साथ करने लगते हैं। लगता है कि मुझे कल तुमसे मिल कर खुद तुम्हे डॉक्टर के पास लेकर जाना चाहिए। और मैं कल की तैयारियों में लग जाती हूं।

      
    देख लिए, याद है ना तुम्हे। इसी इसी तरह ना, ना करते करते मुझे तुमसे प्यार भी हो गया था। मैं भी इसी ना के चक्कर में पता नहीं कितनी सिगरेट कि डिब्बियां फूंक डाली हैं।