दुनिया
के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र भारत में इन दिनों लोकतंत्र के मान्य आदर्शों को
लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चल रही इस बहस को बीबीसी
द्वारा बनाई डाक्यूमेंट्री “भारत
की बेटी” ने एक नया आयाम दे
दिया है। नई बहस इस बात को लेकर है कि क्या बीबीसी को निर्भया कांड के मुख्य
आरोपियों में से एक मुकेश के साक्षात्कार को दिखाया जाना चाहिए या नहीं? दूसरी बहस इस बात को
लेकर है कि बलात्कार के आरोपियों के वकील द्वारा कही गई बातें जायज हैं या नहीं?
यदि हम लोकतंत्र के पैरोकार हो सकते हैं तो फिर किसी बलात्कारी को क्यूं नहीं सुन सकते हैं? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उसे भी है। यदि लोकतंत्र में भरोसा करते हैं तो फिर उस संस्थान बीबीसी को क्यूं भला- बूरा कह रहे हैं जिसने लोकतंत्र को उसके शिखर पर पहुंचाया। बीबीसी ने लोकतंत्र को किशोर से जवान बनते
देखा है। दुनिया मानती है कि बीबसी ने लोकतंत्र के प्रसार और मजबूती के लिए एक स्तंभ
की भूमिका निभाई है। बलात्कारी क्या सोचता है ये जानना उतना ही जरुरी है जितना कि उसका विरोध करना। असली बलात्कारी तो उसकी सोच ही है। जड़ तो अभी भी सांसे ले रहा है। सोच को मारना होगा। बलात्कारी तो खुद ही मर जाएगा। बीबीसी ने इसी सोच को दिखाया है जो अब तक जिंदा है।
इस
बात को लेकर भी चर्चा हो रही है कि जब ये मामला अदालत के विचाराधीन है तब क्या इस
डाक्यूमेंट्री को सार्वजनिक रुप से प्रसारित किया जाना चाहिए? डाक्यूमेंट्री में
आरोपी पक्ष के वकील ने बलात्कार के कारणों और महिलाओं के संदर्भ में जो बाते कहीं
हैं उसकी घोर निंदा की जानी चाहिए। भारतीय समाज की सोच वैसी नहीं है जो उस वकील ने
साक्षात्कार में दर्शायी है। वकील की दलील
के मायने समझना जरुरी है। उसने ये बात आदालत के सामने कही होती तो समझा सकता था कि
वह अपने पक्ष को बचाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे ये बात समझनी चाहिए थी कि वो
एक प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय समाचार चैनल को साक्षात्कार दे रहा था। यदि एक
भारतीय कानूनची जब इस प्रकार की बातें कर रहा हो तब पूरी दुनिया में भारत की छवि
धूमिल होती है।
बलात्कार
के एक आरोपी मुकेश की सोच को दुनिया के सामने लाया जाना जरुरी था। एक बलात्कारी क्या
सोच कर इस तरह का घिनौना काम करता है, ये जानना जरुरी इसलिए है क्यूंकि हम
बलात्कार के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। इसी सोच को तो खत्म करना है। साक्षात्कार के
दौरान आरोपी को तनिक भी अपराधबोध नहीं होना हमारी अब तक की लड़ाई पर सवाल खड़े
करता है। इसका सीधा मतलब है कि अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। हमे और भी मजबूती से
लड़ने की जरुरत है।
ऐसा
क्यूं होता है कि हम किसी को बस प्रतीक मानकर रह जाते हैं? उस पीड़िता को भारत
की बेटी बनाकर हमने उसके लिए क्या किया है। उसे एक नया नाम दिया है, उसके नाम पर
सरकारी फंड बनाया है और आने वाले दिनों में सरकारी योजनाएं चलाई जाएंगी। ये भी हो
सकता है कि राष्ट्रपिता और राष्ट्रकवि के जैसे उसको भी इतिहास मानकर जयंती और
पुण्यतिथि मनाने की प्रथा शुरु कर दें। हम लड़ किससे रहे हैं? नाम से या प्रतीकों
से? यदि हमारी लड़ाई इनसे
है तो फिर बलात्कार और
बलात्कारी से लड़ने की बात महज ढोंग है।
लोकतंत्र
में सबको अपनी बात कहने का अधिकार मिला है। बीबीसी सभी के लिए वो मंच मुहैया कराती
है। दरअसल, बात केवल बीबीसी की ही नहीं है। हाल ही में मुम्बई के उर्दु दैनिक “अवधनामा” की संपादक शिरीन
दलवी के खिलाफ फतवा जारी होना किस प्रकार की स्वतंत्रता को दर्शाता है? बीबीसी ने शिथिल और
जड़ हो चूके आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की है। बहस, आरोपी बलात्कारी की सोच और
उसके वकील की दलील पर होनी चाहिए। लोकतंत्र में विरोध करने की आजादी सभी के पास
है।
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