अब तक बहसों और परिचर्चाओं में ये अक्सर सुना करता था कि बिहार के किसान अंदर से बहुत मजबूत होते हैं। उनके पास अदम्य साहस और सहनशीलता होती है। ये एक धड़ा कहा करता था। एक दुसरा भी धड़ा था जो यह पक्ष रखता था कि बिहार के किसान अपेक्षाकृत रुप से कम खेती करते हैं। उनके कहने का अभिप्राय यह था कि दूसरे प्रदेशों के किसानों की तुलना में बिहार में नगदी या जिविकोपार्जन आधारित खेती कम की जाती है। इस प्रकार यहां के किसानों पर कम बोझ एंव जिम्मेदारी होती है।
ये दोनो पक्ष अपनी समझ और नजरिए के लिहाज से बहुत हद तक स्थिति का बयान भी अपने-अपने ढ़ंग से करते हैं। दरअसल एक पक्ष वो है जो बिहार के किसानों और खेती से भावनात्मक लगाव रखता है। शायद किसी ना किसी रुप से वह इनसे जुड़ा भी होता है। शायद वह इसी जुड़ाव के कारण अपनी मनोदशा को ही किसानों की मनोदशा समझ लेता है। स्पष्ट है कि वह अपना पक्ष और स्थिति का आकलन अपने नजरिए और समझ के हिसाब से करता है। जो दूसरा पक्ष है वह रिपोर्टें तैयार करता है। पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखता है। टीवी की बहसों में भाग लेता है और कृषि एवं अर्थशास्त्र के संदर्भ ग्रन्थों को अपनी समझ में व्यापक तौर पर इस्तेमाल करता है। फसल उत्पादन और विकास दर को अपने हर एक वक्तव्य में उद्धृत करता है। इस धड़े के संदर्भ में इतना ही कह सकते हैं कि ये पक्ष भी आंकड़ो और उत्पादन पर अपनी समझ और नजरिए को व्यक्त करता है।
हां, हम एक काम जरुर कर सकते हैं कि इन दोनो धड़ों के विचारो के समन्वित और समेकित नजरिए पर अपनी नजर डाल सकते हैं। संयुक्त रुप से दोनो तरह के विचार बहुत हद तक स्थिति का वर्णन करने में सक्षम हैं। लेकिन, पूरी स्थिति तब स्पष्ट होगी जब हम वास्तव में सबसे निचले और बुनियादी स्तर पर इसकी पड़ताल करते हैं। ग्राउंड जीरो की स्थिति एक अलग तस्वीर पेश करती है। यहां आपको मनेर के किसान गजेंद्र के परिवार से मुलाकात होगी। ये वो गजेंद्र नहीं है जो किसी हाई वोल्टेज और आयोजित रैली के दौरान पेड़ से लटक कर आत्महत्या करता है। ये वो किसान नहीं है जिसके हक के लिए समाजसेवी और सिविल सोसाईटी के लोग धरने देते हैं, अदालतों में याचिकाएं दायर की जाती है। यह वह किसान भी नहीं है जिसके प्रतिनिधि संसद में बेबाक होकर उसके हक की मांग करते हैं। यह उस प्रदेश से भी नहीं आता जिसके कवरेज के लिए पत्रकारों और केमरामैनों का जत्था जाता है।
दरअसल, गजेंद्र और उसके जैसे किसान गुमनामी और अनदेखी का शिकार होकर अपनी सहनशीलता का परिचय देते हैं। वह उत्पादन और पैदवार के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय पटल पर रिकार्ड विकास दर दर्ज कराता है। यह वह किसान है जो खेती के नए तरीकों को ढूंढता है और संमूची दुनिया उसे अपनाती है। राष्ट्रीय पटल पर इसकी गुंज दूसरे प्रदेशों के किसानों की आत्महत्याओं और अपने प्रदेश की राजनीति के मकड़जाल में दब कर चूुप हो जाती है। कर्ज अदायगी के मामले में भी सूबे के किसानों ने सबको आईना दिखाया है। इन सब के बावजूद वह आज भी प्रेमचंद के उपन्यासों का नायक बना हुआ है। उसकी माली हालत आज भी वैसी ही है जो औपनिवेशिक काल के दौरान थी। अंतत: वह अपने जीवन की इहलीला समाप्त करता है। अधिकतर मामलों मे तो जीवन प्राकृतिक आपदाओं की भेंट चढ़ जाता है। वह इतने कर्ज में डूब जाता है कि उससे उबरने के लिए आत्महत्या की बजाय शहर पलायन को तवज्जो देता है। हालांकि, गजेंद्र शहर नहीं जा पाया क्यूंकि उसे परिवार की फिक्र थी। वह, टीवी कैमरों के सामने नहीं बल्कि बंद कोठरी के अंधेरों में दम तोड़ता है। वह गुमनाम है। उसकी खबर अखबारों को मौत के 5 दिन बाद मिलती है। वह केवल स्थानीय पन्नों और क्षेत्रीय टीवी चैनलों पर स्थान बना पाता है।
यदि वास्तव में बिहार के किसानों और खेती को जानना है तो पहले गजेंद्र जैसे किसान की व्यथा को जानना होगा। वह सरकार को नहीं कोसता है बल्कि जीवनदाता को कोसता है। यदि वास्तव में बिहार के किसानों और खेती में प्रगती के अभिलाषी हैं तो सबसे पहले इन्हें मुख्यधारा में लाना होगा। बिहार के किसान लाईमलाईट में नहीं रहना चाहते हैं बल्कि उन्हें जागरुक करने की आवश्यकता है। सहनशीलता, परिश्रम और जुझारुपन से लबरेज किसानी ही नहीं बल्कि गुमनामी और बेरुखी की दंश झेल रही किसानी के रुप में भी वर्णित कीजिए बिहार के किसान को।
ये दोनो पक्ष अपनी समझ और नजरिए के लिहाज से बहुत हद तक स्थिति का बयान भी अपने-अपने ढ़ंग से करते हैं। दरअसल एक पक्ष वो है जो बिहार के किसानों और खेती से भावनात्मक लगाव रखता है। शायद किसी ना किसी रुप से वह इनसे जुड़ा भी होता है। शायद वह इसी जुड़ाव के कारण अपनी मनोदशा को ही किसानों की मनोदशा समझ लेता है। स्पष्ट है कि वह अपना पक्ष और स्थिति का आकलन अपने नजरिए और समझ के हिसाब से करता है। जो दूसरा पक्ष है वह रिपोर्टें तैयार करता है। पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखता है। टीवी की बहसों में भाग लेता है और कृषि एवं अर्थशास्त्र के संदर्भ ग्रन्थों को अपनी समझ में व्यापक तौर पर इस्तेमाल करता है। फसल उत्पादन और विकास दर को अपने हर एक वक्तव्य में उद्धृत करता है। इस धड़े के संदर्भ में इतना ही कह सकते हैं कि ये पक्ष भी आंकड़ो और उत्पादन पर अपनी समझ और नजरिए को व्यक्त करता है।
हां, हम एक काम जरुर कर सकते हैं कि इन दोनो धड़ों के विचारो के समन्वित और समेकित नजरिए पर अपनी नजर डाल सकते हैं। संयुक्त रुप से दोनो तरह के विचार बहुत हद तक स्थिति का वर्णन करने में सक्षम हैं। लेकिन, पूरी स्थिति तब स्पष्ट होगी जब हम वास्तव में सबसे निचले और बुनियादी स्तर पर इसकी पड़ताल करते हैं। ग्राउंड जीरो की स्थिति एक अलग तस्वीर पेश करती है। यहां आपको मनेर के किसान गजेंद्र के परिवार से मुलाकात होगी। ये वो गजेंद्र नहीं है जो किसी हाई वोल्टेज और आयोजित रैली के दौरान पेड़ से लटक कर आत्महत्या करता है। ये वो किसान नहीं है जिसके हक के लिए समाजसेवी और सिविल सोसाईटी के लोग धरने देते हैं, अदालतों में याचिकाएं दायर की जाती है। यह वह किसान भी नहीं है जिसके प्रतिनिधि संसद में बेबाक होकर उसके हक की मांग करते हैं। यह उस प्रदेश से भी नहीं आता जिसके कवरेज के लिए पत्रकारों और केमरामैनों का जत्था जाता है।
दरअसल, गजेंद्र और उसके जैसे किसान गुमनामी और अनदेखी का शिकार होकर अपनी सहनशीलता का परिचय देते हैं। वह उत्पादन और पैदवार के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय पटल पर रिकार्ड विकास दर दर्ज कराता है। यह वह किसान है जो खेती के नए तरीकों को ढूंढता है और संमूची दुनिया उसे अपनाती है। राष्ट्रीय पटल पर इसकी गुंज दूसरे प्रदेशों के किसानों की आत्महत्याओं और अपने प्रदेश की राजनीति के मकड़जाल में दब कर चूुप हो जाती है। कर्ज अदायगी के मामले में भी सूबे के किसानों ने सबको आईना दिखाया है। इन सब के बावजूद वह आज भी प्रेमचंद के उपन्यासों का नायक बना हुआ है। उसकी माली हालत आज भी वैसी ही है जो औपनिवेशिक काल के दौरान थी। अंतत: वह अपने जीवन की इहलीला समाप्त करता है। अधिकतर मामलों मे तो जीवन प्राकृतिक आपदाओं की भेंट चढ़ जाता है। वह इतने कर्ज में डूब जाता है कि उससे उबरने के लिए आत्महत्या की बजाय शहर पलायन को तवज्जो देता है। हालांकि, गजेंद्र शहर नहीं जा पाया क्यूंकि उसे परिवार की फिक्र थी। वह, टीवी कैमरों के सामने नहीं बल्कि बंद कोठरी के अंधेरों में दम तोड़ता है। वह गुमनाम है। उसकी खबर अखबारों को मौत के 5 दिन बाद मिलती है। वह केवल स्थानीय पन्नों और क्षेत्रीय टीवी चैनलों पर स्थान बना पाता है।
यदि वास्तव में बिहार के किसानों और खेती को जानना है तो पहले गजेंद्र जैसे किसान की व्यथा को जानना होगा। वह सरकार को नहीं कोसता है बल्कि जीवनदाता को कोसता है। यदि वास्तव में बिहार के किसानों और खेती में प्रगती के अभिलाषी हैं तो सबसे पहले इन्हें मुख्यधारा में लाना होगा। बिहार के किसान लाईमलाईट में नहीं रहना चाहते हैं बल्कि उन्हें जागरुक करने की आवश्यकता है। सहनशीलता, परिश्रम और जुझारुपन से लबरेज किसानी ही नहीं बल्कि गुमनामी और बेरुखी की दंश झेल रही किसानी के रुप में भी वर्णित कीजिए बिहार के किसान को।
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