हम दोनों के “ना” कहने में बड़ा फर्क है।
कहने के भावों में, कारण में, आवाज की तीव्रता में, परिस्थितियों में और उसके बाद
पड़ने वाले प्रभाव में बहुत अंतर है।
नहीं ऐसा नहीं है बाबू!! तुम्हें ऐसा क्यूं लगता है?? तुम क्या सोचते हो कि मैं
बहाना करती हूं या तुमसे झूठ बोलती हूं। तुम्हारी कसम!!! मैं कभी तुमसे झूठ नहीं
बोली।
अरे पागल!!! मैनें कब कहा कि तुम मुझसे झूठ बोलती हो?? यदि ऐसा है तो फिर मैं भी
तो कभी-कभी “ना” कहता हूं। तो क्या मैं तुमसे झूठ बोलता हूं?? मेरे कहने का मतलब ये नहीं था।
तो क्या मतलब है तुम्हारा?? यही कि मैं जानबूझ कर “ना” बोलती हूं?? तुम्हे मुझपर इतना सा भी
भरोसा नहीं है!! तुम मुझे कभी समझ नहीं पाओगे। चाहे मैं कुछ भी कर लुं तुम्हारे लिए, तुम्हे
हर बात में मेरी ही गलती नजर आएगी। तुम मुझे ही दोष दोगे।
चूप करो तुम अब। पूरी बात
सुनती ही नहीं हो और बोलने लगती हो। साला, प्यार को फील करने में भी बड़ी मुसीबत
है। जब भी थोड़े दार्शनिक खयाल आते हैं, तुम बिना मिमांसा किए कारण-प्रभाव तक
पहुंच जाती हो। लगता है कि “मिल” , “लॉक” और अरस्तु से बहुल ज्यादा
ही प्रभावित हो। अच्छा होता यदि “प्लेटो” औऱ “कांट” द्वारा प्रतिपादित
तत्वमिमांसा को भी जान लेती।
देखो!!! मुझे फिलॉस्फी मत पढ़ाओ।
बहुत बोझिल विषय है। जो कहना है साफ-साफ कहो..सीधी बात..वैसे भी तुम्हे पता है ना
कि आजकल दर्शन पढ़ना ही कौन चाहता है, सब शॉर्टकट के फेर में हैं। आजकल सब चीजों
का शॉर्टकट भी हो गया है। मुझे भी यही पसंद है।
सही कह रही हो तुम। तुम अब
शॉर्टकट में प्यार भी करने लगी हो। लेकिन एक बात याद रखना ये शॉर्टकट होता तो बड़ा
सरल है पर इसकी कोई गारंटी नहीं है।
देखो, तुम फिर से मुझे गलत
ठहराने लगे। अरे मैनें तो बस यूं ही कह दिया था। मुझे प्यार में शॉर्टकट नहीं
पसंद है। मैं अपने प्यार को जीना
चाहती हूं, महसूस करना चाहती हूं लम्बे वक्त तक। अब मुझे बताओ कि तुम क्या कहने
वाले थे। वही “ना” वाली बात। कब से फिजूल में लड़ रहे हैं हमलोग।
जब मैं रात में फोन पर बात
करते वक्त मैं तुमसे पूछता हूं कि , तुम्हे नींद लग रही है? तब तुम कैसे
“ना” बोलते हो। जैसे लगता है कि अभी-अभी कोई परीक्षार्थी नींद से जगा है और पिता
के पूछने पर तपाक से कहता हैं कि नहीं , मैं सोया ही कब था। जब मैं तुमसे किसी
छूट्टी वाले दिन मिलने के लिए बाहर आने को कहता हूं तब तुम किस भाव से कहते हो कि “ नहीं बाबू, आज घर पर सभी
लोग हैं, मैं कोई बहाना भी नहीं कर सकती। तुम मेरे घर की तरफ आ जाओं मैं तुम्हें
कम से कम एक नजर देख लूंगी”। ऐसा लगता है जैसे खेल में
हार जाने के बाद विरोधी खिलाड़ी को बधाई दे रही हो, क्यूंकि तुम्हारी आने की उतनी
ही चाहत होती है जितनी की खेल में किसी भी तरह जीत जाने की। पर यहां विरोधी
खिलाड़ी यानी तुम्हारे घर वालों की उपस्थिति बहुत बढ़िया खेल दिखा रही होती है।
मैं इसी तरह की“ ना” कहने की बात कर रहा था। मेरे पर इन दोनों “ना” असर भी अलग-अलग होता है।
हाहाहाहा, बाबू तुम भी ना!!!! और अपनी बात नहीं करोगे , जब मैं तुमसे कहती हूं कि “तुम्हारी तबियत ठीक नहीं
है, खांसी भी है इसलिए तुम आराम करो कल मिल लेंगे और बात करेंगे”। तब तुम फोन को तकिए से
दबा के खांस लेते हो और फिर सांस को अंदर भर कर कहते हो कि ”नहीं बाबू, मैं ठीक हूं और
मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है। I am fit
and ok.” तो ऐसा लगता है जैसे मरीज अपने परिजनों को
ढ़ाढ़स बंधा रहा है और चिंता नहीं करने की सलाह देता है। मेरी स्थिति वैसी होती है
जैसे परिजन सबकुछ जानते हुए भी थोड़ी देर के लिए खुश हो जाते हैं और फिर उपचार के
बाकी इंतजामों का जुगाड़ उत्साह और जोश के साथ करने लगते हैं। लगता है कि मुझे कल
तुमसे मिल कर खुद तुम्हे डॉक्टर के पास लेकर जाना चाहिए। और मैं कल की तैयारियों
में लग जाती हूं।
देख लिए, याद है ना तुम्हे।
इसी इसी तरह ना, ना करते करते मुझे तुमसे प्यार भी हो गया था। मैं भी इसी “ना” के चक्कर में पता नहीं कितनी
सिगरेट कि डिब्बियां फूंक डाली हैं।
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