मेरी कलम चलेगी,
कलम के बांझपन पर
बीहड़ों में, खेतों की मेड़ों पर
पंचायत में, दुखती रगों के लिए
मड़ई में जल रही चिमनी के लिए
बधार में, बोझा के साथ लदे मजदूरों के लिए
प्राथमिक विद्दयालय में बोरे पर बैठे नौनिहालों के लिए
अस्पताल में जिंदा लाशों के लिए
समाज की रीतियों मे कैद दुर्गा के लिए
सरकार से तंग मूक बनी आवाज के लिए
कलम के बांझपन पर
बीहड़ों में, खेतों की मेड़ों पर
पंचायत में, दुखती रगों के लिए
मड़ई में जल रही चिमनी के लिए
बधार में, बोझा के साथ लदे मजदूरों के लिए
प्राथमिक विद्दयालय में बोरे पर बैठे नौनिहालों के लिए
अस्पताल में जिंदा लाशों के लिए
समाज की रीतियों मे कैद दुर्गा के लिए
सरकार से तंग मूक बनी आवाज के लिए
मेरी कलम चलेगी,जहां
झिंगुर की आवाज सपनों का संगीत है
खेतों की दशा कल की दिशा है
मुखिया का चौपाल है
हक एक सवाल है
लालटेन की मध्यम रौशनी है
बिजली का इंतजार है
पेट में सर्वसुलभ वायू है
रोटी एक ही समय की बात है
झिंगुर की आवाज सपनों का संगीत है
खेतों की दशा कल की दिशा है
मुखिया का चौपाल है
हक एक सवाल है
लालटेन की मध्यम रौशनी है
बिजली का इंतजार है
पेट में सर्वसुलभ वायू है
रोटी एक ही समय की बात है
मेरी कलम चलेगी, जहां
रास्ते आगवानी के लिए तरसते है
फसलें पानी की आस में हैं
अधिकारों से अनभिज्ञ इन्सान हैं
लकड़ी चुनते अबोध हैं
मड़ई और खप्पर जीवनस्तर बताते हैं
चुल्हे कई दिनों तक बिना जले रह जाते हैं
रीत अपनी धौंस जमाए है
साधु अपना असली चेहरा बताए है
रास्ते आगवानी के लिए तरसते है
फसलें पानी की आस में हैं
अधिकारों से अनभिज्ञ इन्सान हैं
लकड़ी चुनते अबोध हैं
मड़ई और खप्पर जीवनस्तर बताते हैं
चुल्हे कई दिनों तक बिना जले रह जाते हैं
रीत अपनी धौंस जमाए है
साधु अपना असली चेहरा बताए है
मेरी कलम चलेगी जहां
नालियों में गलियां हैं
विद्दालयों का खस्ताहाल है
खेतों में किसान बेहाल है
सड़के जैसी तरणताल हैं
सरकार की हवा नहीं पहूंची है
संसद अब तक अन्जान है
पंचायत का खाप है
पुलिस के इरादे नापाक हैं
नालियों में गलियां हैं
विद्दालयों का खस्ताहाल है
खेतों में किसान बेहाल है
सड़के जैसी तरणताल हैं
सरकार की हवा नहीं पहूंची है
संसद अब तक अन्जान है
पंचायत का खाप है
पुलिस के इरादे नापाक हैं
मेरी कलम चलेगी जहां
बेटीयां कैद हैं
औरत मौन है
समाज का ताना-बाना है
पुरुष शक्तिमान है
स्त्री का केवल शील है
रिशतों का नहीं कोई भान है
परिवार का दबाव है
आजादी का अभाव है
बेटीयां कैद हैं
औरत मौन है
समाज का ताना-बाना है
पुरुष शक्तिमान है
स्त्री का केवल शील है
रिशतों का नहीं कोई भान है
परिवार का दबाव है
आजादी का अभाव है
मेरी कलम चलेगी, जहां
दलित मुखौटा हैं
राजनीति एक खेल है
मंडल और कमंडल है
भुरा बाल है
जाति एक अभिशाप है
प्रेम के लिए घृणा है
राजा दुखिया है
सेवक शासक है....
दलित मुखौटा हैं
राजनीति एक खेल है
मंडल और कमंडल है
भुरा बाल है
जाति एक अभिशाप है
प्रेम के लिए घृणा है
राजा दुखिया है
सेवक शासक है....
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