आजकल सिनेमा घरों में जाने पर फिल्म की शुरुआत होती है एक संदेश के साथ,
जिसमें बताया जाता है कि सिगरेट, बीड़ी और अन्य ताम्बाकू पदार्थों का सेवन किस
प्रकार से हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। उस विज्ञापन का निहितार्थ होता है “ ताम्बाकू पदार्थ( किसी भी रुप में) जानलेवा
हैं”। विज्ञापन के दौरान एक किशोर जो ताम्बाकू के अत्यधिक सेवन
के कारण मुंह के कैंसर से ग्रस्त हो जाता है, वह कुछ कहता है, शायद अपनी उस लत और
उससे जनीत परिणामों के बारे में बता रहा
होता है। लेकिन उसकी आवाज हमारे कानों तक सही से नहीं सुनाई पड़ती क्यूंकि सिनेमा
देखने आए अन्य लोग बड़बडाते हैं। कुछ लोग तो गालियां भी देते हैं और हंसते है उस
किशोर की दिखायी जाने वाली व्यथा पर। फिर बाद में विज्ञापन के दौरान सिगरेट पीने
के नफे-नुकसान के बारे में बताया जाता है। फेपड़ों में बसे सिगरेट के तत्वों की
तुलना टार से की जाती है। इस बात पर पीछे बैठे कुछ युवक खुब ठहाके लगाते हैं और
अपना सीना तान कर दिखाने लगते हैं। कुछ लोग जो बहुत शिद्दत के साथ पैसे खर्च करके
और अपना मुल्यवान समय लेकर आए होते हैं वो तो थियेटर स्टाफ के साथ-साथ इस नए चलन
को कोसते हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि ये चलन अथवा प्रयोग कितना कारगर है, इस पर सोचने की
जरुरत है। जिनको लक्ष्य मानकर विज्ञापन दिखाया जाता है वो कितनी गंभीरता से उन
बातों को लेते हैं? जो संदेश विज्ञापन में निहित है, क्या वो संदेश अपने सही
रुप में लक्षितों तक पहुंच पाता है? ये बात केवल सिनेमा घरों में
दिखाए जाने वाले उस विज्ञापन की ही नहीं है बल्कि “ सिगरेट
और अन्य ताम्बाकू उत्पाद अघिनियम 2003” के अन्य प्रावधानों की भी है। इस
अधिनियम के तहत सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीने की मनाही, सिगरेट और अन्य
ताम्बाकू उत्पादों के जहरीले परिणामों के प्रचार, 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के
ताम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध एंव तांबाकू उत्पादों पर अनिवार्य रुप से
स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी देने की बात कही गई है। सवाल यह है कि जिन उद्देश्यों के
साथ इस अधिनियम को लाया गया था , क्या वे उद्देश्य सही मायनों में सार्थक हो रहे
हैं?
सिगरेट और अन्य ताम्बाकू पदार्थों के
सेवन से होने वाले दुष्परिणामों के प्रचार का वास्तविक रुप तो हम सबके सामने आ ही
गया है। अगर बात करे अन्य प्रावधानों की तो उनकी वास्तविकता भी धरातल पर आने में
देर नहीं लगती है। जहां तक बात सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीने की मनाही की है
तो यह कमोबेश केवल उस जागरुक समाज तक ही असरदार लगती है, जहां पीने वाले भी जागरुक
हैं और वैसे लोग भी हैं जो इसके खिलाफ आवाज उठाने से हिचकिचाते नहीं है। अन्य
जगहों की बात करें तो ये महज एक मजाक बन कर रह जाता है। आए दिन लोग मिल ही जाते
हैं जो बड़े आराम से किसी बस स्टैंड पर, ट्रेनों में, रेलवे स्टेशनों पर और अन्य
सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट के धुएं का छल्ला बनाते दिख जाते हैं। वैसी ही हालत
उस प्रावधान की भी है जिसमें 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति के तांबाकू उत्पादों
की बिक्री पर प्रतिबंध की बात है। आप किसी रेलगाड़ी में , रेलवे स्टेशनों पर, छोटे
शहरों या गावों की किसी गुमटी पर ऐसे बच्चों को तांबाकू उत्पाद बेचते पाएंगे जिनकी
उम्र अभी स्कूल जाने की होती है। ताम्बाकू उत्पादों के पैकेटों पर स्वास्थ्य संबंधी
अनिवार्य चेतावनी की बात तो बस कंपनियों की मजबूरी लगती है। खरीदारों और सेवन करने
वालों से इसका सरोकार न के बराबर लगता है। इस प्रकार ये सारे प्रावधान जो “ सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम
2013” तहत लाए गए हैं, अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में
असफल नजर आते हैं।
आखिर, ऐसे अधिनियम को लाने के बाद भी इसके उद्देश्य क्यूं अपनी प्रासंगिकता खो
बैठे हैं? अगर
इस बात की तह में जाकर पड़ताल करें तो हम पाएंगे कि इस अधिनियम को लाना महज खानापूर्ति
था। कुछ लोगों की मांग मान लेने, समाज को यह दिखाने की सरकार जागरुक है और तांबाकू
उत्पाद कंपनियों का भरोसा जीतने के सिवा इसका बाकी कोई उद्देश्य प्रासंगिक नहीं
नजर आता। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो भारत में दुनिया की 10 प्रतिशत सिगरेट और
बीड़ी पीने वाली जनता रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक कम
आय वाले लोग , ज्यादा आय वाले लोगों की अपेक्षा ज्यादा सिगरेट/बीड़ी पीते हैं। इस लिहाज से देखें तो सरकार को आबकारी शुल्क के रुप में
मोटी रकम प्राप्त होती है। अगर ताम्बाकू उत्पाद पर लगने वाले करों की बात करें तो
अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम है। भारत में सिगरेट पर लगने वाला कर खुदरा शुल्क
का मात्र 38 प्रतिशत है। सिगरेट पर लगने वाला कर का यह दर विश्व बैंक द्वारा प्रस्तावित
दर से काफी कम है। विश्व बैंक के अनुसार यह 65 से 80 प्रतिशत के बीच होना चाहिए।
भारत में अधिकतर ताम्बाकू उत्पादक इकाइयां (99.8 प्रतिशत) जो कि सकल मुल्य का 30
प्रतिशत उत्पादन करती हैं, अनौपचारिक क्षेत्र में हैं। जिसमें कि बीड़ी उत्पादन
करने वाली 99.8 प्रतिशत इकाइयां हैं जो कि सकल मुल्य मेँ 56 प्रतिशत की भागीदारी
करती हैं। ये अनौपचारिक क्षेत्र करों के दायरे के बाहर आता है। भारत में बीड़ी पर
लगने वाला कर का दर भी अपेक्षाकृत रुप से काफी कम है। औसतन बीड़ी का एक पैकेट 4 से
5 रुपये में मिल जाता है जिसपर कर का दर केवल 9 प्रतिशत ही है। सिगरेट और बीड़ी पर
लगने वाला कर का दर काफी जटील है जो क्रमश: लम्बाइ और मशीनी
उत्पादन के आधार पर
तय किया जाता है। भारत में सिगरेट और अन्य ताम्बाकू उत्पादों पर लगने वाला कर अथवा
आबकारी शुल्क इतना कम क्यूं है, इस सवाल का जवाब सरकार ही बता पाएगी।
एक तरफ तो हम तांबाकू उत्पादों के बिक्री और सेवन से संबधित प्रावधान बनाते
हैं ताकि इसके दुष्परिणामों की जानकारी प्रदान करते हुए सेवन करने वालों की संख्या
कम करें अथवा लोगों को काल के ग्रास में जाने से बचाएं, वहीं दूसरी तरफ इन उत्पादों
पर इतना कम कर लगाते हैं कि ये आम लोगों के लिए सस्ते हो जाते हैं। ज्यादा खपत से
उत्पादन ज्यादा होगा और उत्पादन होने से सरकार के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी। एक
अध्ययन के मुताबिक यह मानी हुई बात है कि ताम्बाकू का उपयोग कम करने का सबसे कारगर
तरीका है , आबकारी शुल्क को इतना बढ़ा दिया जाए जिससे कि यह आम लोगों के लिए महंगा
हो जाए। ऐसा करने से राजस्व भी उत्तरोतर रुप से बढ़ेगा। यदि सिगरेट और अन्य ताम्बाकू
उत्पाद अधिनियम 2013 के प्रावधानों की बात करें तो वे तभी प्रासंगिक और सार्थक
होंगे जब समाज उसके लिए समर्पित होकर उन्हें अपनाए। महज अधिनियम बना देने भर से ताम्बाकू और सिगरेट उत्पादों के सेवन में कमी नहीं आएगी। पुलिस, प्रशासन और आम जनता जब तक अपने कर्तव्यों की अहमियत नहीं समझेगी तब तक अधिनियम सार्थक नहीं हो पाएगा। अन्यथा दूसरा उपाय ज्यादा कारगर है।
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