चुनाव प्रचार में राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग और एक दूसरे के उपर कीचड़
उछालने की बात नई नहीं है। प्रचार के दौरान रैलियों और सभाओं में मतदाताओं को
लुभाने के लिए एक दुसरे के उपर आक्षेप लगाए जाते हैं। दलबदल राजनीतिक व्यवस्था के
इस दौर में भी चुनाव के समय नेताओं को इस बात का भान नहीं रहता है कि वे जिस दल या
नेता के उपर जुबानी हमले कर रहे हैं, चुनाव परिणाम के बाद उन्हें उनकी जरुरत भी
पड़ सकती है। ऐसा अक्सर होता है कि चुनाव परिणाम के बाद दो धूर विरोधी भी गठबंधन
के माध्यम से एक हो जाते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान भी नेताओं के बीच जुबानी
जंग देखने को मिल रही है।
वैसे तो चुनाव प्रचार में
नेताओं के बीच बातों का तकरार आम बात है पर
जब ऐसे जुबानी हमले किसी खास वर्ग, जाती, नस्ल को ध्यान में रखकर
किए जाते हैं तब सवाल उठने लाजिमी हैं। हालिया चुनावों में या फिर दिल्ली विधानसभा के
इस चुनाव में सियासी मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भी कसौटी पर है। यह चुनाव घोर
आपत्तिजनक, अमर्यादित और गाली-गलौच
के स्तर तक उतर आई टिप्पणियों के लिए भी याद रखा जाएगा। सत्ता की जंग में कूदे
नेताओं की जुबान जानबूझकर फिसल रही है और दिल्ली में
सरकार चलाने का ख्वाब देख रही पार्टियों के नेता ऐसी भाषा बोल रहे हैं जिसे सुनकर
अनपढ़-गंवार भी शरमा जाए
चुनाव प्रचार के शुरुआती दिनों में जब
भाजपा सांसद साध्वी निरंजना ज्योति दिल्ली की सड़कों पर उतरीं तो उन्होंने 'रामजादों
की सरकार और हरामजादों की सरकार' वाली ऐसी टिप्पणी की जिसकी धमक संसद भवन तक सुनाई पड़ी।
भाजपा के ही सांसद साक्षी महाराज के बयानों को लेकर भी खूब हंगामा हुआ। भाजपा के
कई अन्य नेताओं के बयान भी कतई अमर्यादित थे। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस मामले में
केवल भाजपा के ही नेता शामिल हों, आम आदमी
पार्टी की ओर से भी अभद्र टिप्पणियां कम नहीं की गईं। हद तो तब हुई जब भाजपा ने ‘गोत्र’ का
मामला प्रचार में उछाल दिया।
सवाल ये है कि आखिर जिन अमर्यादित बयानों
से आम जनता को लुभाने की इच्छा रखने वाले राजनेता इस तरह की बयानबाजी क्यूं करते
हैं?
क्या इस प्रकार के जुबानी हमले स्वीकार्य होंगे? राजनातिक दलों और नेताओं को इस बात
का ख्याल रखना होगा कि जिस अमर्यादित ढ़ंग से वे
जनता को ठगने का प्रयास कर रहे हैं वो इतनी नासमझ नहीं है। नेताओं को यह भी
समझना होगा कि ऐसे बयानों से आपसी सौहार्द भी प्रभावित हो सकता है। लोकतंत्र की
असली ताकत वोट में है, इसका ये मतलब नहीं है कि इस प्रकार के बयानों से लोक को ठगा जाए।
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