इस बार के गणतंत्र दिवस परेड में सेना के तीनो अंगो में महिलाओं की भागीदारी देखकर अच्छा लगा। सेना के तीनों अंगों का नेतृत्व
महिलाओं ने किया। वो पल बहुत ही गौरवपूर्ण रहा जब विंग कमांडर पूजा ठाकुर ने परेड
के मुख्य अतिथि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया, और
महिला दस्ते की अगुवाई में परेड की शुरुआत हुई। अपने शक्ति प्रदर्शन के दौरान हम
पूरी दुनिया को यह बताने में कामयाब रहे कि नारी शक्ति भी हमारी सेना की एक खास
विशेषता है।
पहली बार भारतीय सेना की तीनों अंगो की
टुकड़ियों का नेतृत्व महिला अधिकारियों ने किया। नारी शक्ति का ऐसा प्रदर्शन हमें
गौरवान्वित करता है। भारत की महिलाओं ने आज हर क्षेत्र में मेहनत, संघर्ष और काबिलियत
के बल पर अभुतपूर्व प्रगति की है। सेना में भी महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए
कानूनी लड़ाई लड़ी है तब जाकर उन्हें ये अवसर प्राप्त हुआ है। वैसे तो सेना में
महिलाओं की भर्ती 1927 से हो रही है पर 1992 में पहली बार उन्हें शॉर्ट सर्विस
कमीशन प्रदान किया गया। वायू सेना और नौ सेना में 2008 में ही उन्हें स्थायी
सर्विस कमीशन दिया गया पर थल सेना में अभी तक उन्हें ये कमीशन नहीं मिला
है। जिन सेनाओं में उन्हें स्थायी सर्विस कमीशन दिया गया है उनमें भी उनकी भूमिका
केवल सहायक स्टाफ तक ही सीमित है, युद्ध क्षेत्र में उनकी कोई भूमिका नहीं है।
एक तरफ जहां हम 26 जनवरी के परेड समारोह में
नारी सशक्तिकरण प्रदर्शित करनें के उद्देश्य से सेना के तीनों अंगों का नेतृत्व
नारीयों से करवाते हैं वहीं सेना के उच्च पदों पर उन्हें स्थायी कमीशन देने से
कतराते हैं। आखिर क्या कारण है कि अपने यहां की महिलाओं को युद्ध क्षेत्र में जाने
पर रोक लगाते हैं जबकि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान की महिला फायटर पायलट आएशा
फारुक ने न सिर्फ फायटर विमान उड़ाया बल्कि किसी इलाके में बम भी गिराया है। क्या
हमारी यहां कि महिलाएं ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं जबकि उन्होनें इसके लिए मांग
भी की है। क्या महिलाएं युद्ध क्षेत्र में समान दमखम से पुरुषों का मुकाबला नहीं
कर सकतीं?
जबकि इस बाबत सर्वोच्च न्यायलय ने भी महिला अधिकारियों के संबंध में ये टिप्पणी
किया है कि वे इसकी हकदार हैं।
यदि भारतीय सेना की बात करें तो 12 लाख की थल
सेना में महज 2250 महिलाएं हैं । वायू सेना के कुल 1 लाख 40 हजार की संख्या में 1100
और 99 हजार की नौसेना में केवल 465 महिलाएं हैं।
यदि संख्या और अनुपात के लिहाज से देखें तो देश की आधी आबादी के सेना में
इतना मामूली प्रतिनिधत्व हमारी व्यवस्था की सोच को दर्शाता है। महिलाओं की
भागीदारी के मुद्दे पर थल सेना का यह मानना है कि ‘उन्हें पहले उस ग्रामीण
पृष्ठभूमि का ख्याल रखना होगा जहां से सेना में पुरुष सैनिक आते हैं। युद्ध में वे
सभी लोग एक महिला अधिकारी के निर्देषों का कैसे पालन कर सकेंगे’। इतना ही नहीं सेना ने ते सर्वोच्च न्यायालय में दायर अपने शपथ पत्र में
ये भी कहा है कि ‘ सिद्धान्तों मे थल सेना में महिलाओं की
भागीदारी अच्छी दिख सकती है मगर व्यवहार में भारतीय सेना में वह काम नहीं कर सकी है और एक अवधारणा के तौर पर भी
हमारा समाज युद्धक भूमिकाओं में महिलाओं को देखने के लिए तैयार नहीं है’।
महिला अधिकारियों ने सेना में भर्ती और स्थायी
सर्विस कमीशन पाने के लिए अदालत का दरवाजा भी खटखटाया है। हालांकि अदालत ने महिलाओं
को बराबर मानते हुए उन्हें समुचित भागीदारी देने की बात भी कही है। महिला
अधिकारियों द्वारा सन् 2003 में डाली गई याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि ऐसा कोई कारण
नहीं है कि काबिल और समर्थ महिलाओं को पुरुषों के बराबर स्थायी हकदार नहीं माना
जाए। सेना में महिलाओं के साथ इस प्रकार का भेदभाव यह दर्शाता है कि आज भी किस
प्रकार हम महिलाओं की क्षमता पर शक करते हैं। जहां एक तरफ तो हम उन्हें दुर्गा के
रुप में पूजते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी शारीरीक क्षमता पर सवाल खड़े करते हैं। हम
यह भूल जाते हैं कि ये भारतवर्ष की ही महिलाएं है जो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के
रुप में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देती है और रजिया बेगम के रुप में न केवल अपने
सम्राज्य की रक्षा करती हैं बल्कि शासन करने में भी सफल होती है।
ये हमारे समाज और व्यवस्था की सोच औऱ मान्यता का
ही नतीजा है कि हम दुर्गा को शक्ति का प्रतीक और किताबों में ऐतिहासिक विरांगनाओं
के उदाहरण देने के बावजूद आज भी उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम करके आंकते हैं। यह
कोई खैरात नहीं है बल्कि महिला अधिकारियों द्वारा मांगे गए सांवैधानिक अधिकारों को
लागु करना है। हम महिला अधिकारियों की इन मांगों को माने बगैर नारी सशक्तीकरण की
मिशाल पेश नहीं कर सकते। इससे न केवल महिलाओं को उनका अधिकार मिलेगा बल्कि समाज
में भी उनको एक सशक्त पहचान मिलेगी। पुरुषवादी समाजिक ढ़ांचे के लिए तो यह एक
दर्पण के समान होगा जिसमें रहते हुए नारी को कमजोर, भोग्या और नाकाबिल माना जाता
है। हमें महिलाओं के सुरक्षा के लिए इतनी हो हल्ला मचाने की जरुरत नहीं पड़ेगी
क्यूंकि तब महिलाएं स्वयं हमारी और साथ-साथ देश की रक्षा करते नजर आएंगी।
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