शनिवार, 10 जनवरी 2015

धर्म के पार

किसी के अभिव्यक्ति के अधिकार पर चोट करना, मासूम बच्चों का कत्लेआम करना, लोगों को आस्था के नाम पर गुमराह करना और जबरन किसी पर अपनी रुढ़ियों और विचारों को थोपना आज के समय में धार्मिक कृत्यों की श्रेणी में गिने जाने लगे हैं। पूरी दुनिया में इस प्रकार के धार्मिक कार्यों का चलन सा शुरु हो गया है। एक बात समझ के दायरे के बाहर है कि ऐसे धार्मिक कार्यों का वर्णन कहाँ और किस प्रकार है? आप सारे धर्मग्रन्थों को छान मारिए, किसी भी धर्मग्रन्थ में ऐसे कृत्यों का उल्लेख नही मिलेगा। तब यह सवाल उठता है कि क्या सच में ऐसे कृत्य धर्म के लिए ही किये जाते है? इन कामों को करने वालों की मानें तो धर्म की रक्षा तथा प्रचार प्रसार के लिए उनका धर्म ऐसे कामों के लिए अधिकार प्रदान करता है।

वर्तमान समय में धर्म सबसे शक्तिशाली संस्था है जिसके पास तमाम तरह के अधिकार और शक्तियां हैं। अपने विकास के क्रम में धर्म ने आज पूरी मजबूती से समाज में अपनी पैठ बना ली है। परिभाषा के आधार पर धर्म को मान्यता और आस्था से जोड़ कर देखा जाता है। इसे संस्कृति एवं इतिहास के प्रतीक के रुप में भी देखा जाता है। विद्वानों के बीच धर्म को लेकर अभी तक विरोधाभास कायम है। धर्म का इतिहास प्राचीन है। हमें इतिहास, मान्यताओं, रुढ़ियों और सिद्धान्तों से अलग धर्म को व्यवहारिक धरातल पर रखकर सोचने की आवश्यकता है। यदि धर्म की कसौटी की बात करें तो धर्म कहता है कि जो अपने अनुकूल नही हो वैसा व्यवहार दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। इस कसौटी पर वर्तमान समय में धर्म कितना प्रासंगिक है? धर्म हमसे क्या कहता है और हम धर्म के लिए क्या करते है? हम धर्म का उपयोग किस प्रकार करते हैं? खोखली मान्यताओं के लिए या फिर मानवता को शर्मशार करने के लिए?

मनु संहिता मे वर्णित धर्म के दस लक्षण (धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥) आज धर्मग्रन्थों तक ही सीमित हैं। व्यवहार से इनका कोई नाता नहीं रह गया है। धर्म अब मान्यता नहीं रह गया है, एक बाजार बन गया है। एक ऐसा बाजार जहां विभिन्न धार्मिक कृत्यों को पूंजी के साधन के रुप में समझा जाने लगा है। धर्म का दर्शन अब आध्यात्म नहीं है बल्कि मिथक और आडंबर है। प्रार्थना और सम्मान धार्मिक कार्य नहीं रह गए हैं, इनका स्थान जोर-जबरदस्ती और दूसरों के भावनाओं को ठेस पहुंचाना हो गया है। जबरन अपनी रुढ़ियों को दूसरे पर थोपना और मनवाना घरवापसी मानी जाने लगी है। एक खास धर्म अब अपना एकाधिकार चाहता है। उसे क्षमा और धैर्य से कोई मतलब नहीं है, वह तो बस किसी के निहित स्वार्थ का निमित्त मात्र है। एकाधिकार की चाह में किसी भी हद तक जाना जिहाद कहा जाने लगा है। जिहाद जैसा धार्मिक कृत्य कैसे धर्म को प्रतिबिंबित करता है यह तो दिख ही चुका है। अभिव्यक्ति और जीवन के अधिकार के बावजूद भी धार्मिक कृत्य थोपे जाने लगे हैं। धर्म के प्रचार-प्रसार के ऐसे तरीके अपनाए जाने लगे हैं कि धर्मग्रन्थ भी थोथे नजर आते हैं।धर्म का घिनौना चेहरा तब नजर आता है जब इन धार्मिक कृत्यों पर सवाल खड़े होते है, कोई इन्हें मानने से इन्कार कर देता है और धर्म के आकाओं से पूछने की हिमाकत की जाती है। आखिर कोई सवाल क्यूं नहीं कर सकता। जब मान्यता के साथ-साथ मानवता भी शर्मशार हो तब हिसाब-किताब तो देना ही पड़ेगा। धर्म का अतिरंजक चेहरा सबके सामने आना चाहिए। स्वयंभू धर्मगुरुओं से उनके धार्मिक कृत्यो के दुष्परिणामों का जवाब तो लेना ही पड़ेगा। कोई कब तक हमें बरगलाता रहेगा।

अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। दर्द जब सताने लगता है तब छटपटाहट होनी स्वाभाविक है। आपके ही दिए गए मजहबी जख्मों पर मलहम लगाए जाने के प्रयास हो रहे हैं। जब आप किसी को कुछ करने की सलाह देते हो तब आपको भी अपने कृत्यों का ब्यौरा पेश करना पड़ेगा। घरवापसी केवल इन्सानों की ही नहीं होती है। घर में कलह और पाखंड की अतिरंजना हो जाने पर नए विचारों और मान्यताओं की भी घरवापसी होती है। कभी कोई पीके आएगा तो कभी शार्ली एब्दा। बेहतर होगा कि आप अपने धार्मिक कृत्यों का लेखा करा लें अन्यथा पेशावर के स्कूली बच्चों जैसे अन्य बच्चे भी लेखाकार बनने की जुगत मे हैं। 

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