पालने की खामोशी बताती है
अपने अकेलेपन को, अपने इंतजार को
कोने में पड़ा हर क्षण
किसी की राह तकता है
बेखबर इस बात से कि
जिस लाल के चाह में
उसका वजूद आया
खो नहीं जाए कहीं.
रात के अंधेरे में
काना-फूसी सुनता है
अपने वजुद के जनक की
लाल की जननी की
आशंकित हो उठता है
फिर से एक बार
अपने कल के लिए
स्वच्छंद डुलने की चाह में.
बड़े इंतजार के बाद
आंसूओं के सूख जाने पर
स्वामी की झल्लाहट थी
जननी का अपराधबोध था
क्यूंकि लाली को जना था
क्यूंकि नन्हीं कली खिली थी
पालना मुस्कराया है,
गोद में कोई तो आया है
लाली का आना
पालने के लिए वरदान था
परिवार के लिए अभिशाप था
पिता को कल की चिंता थी
अपराधी मां की ममता थी
पर इससे बेखबर, पालना
आंगन की धूप में , लाली के रुप में
स्वच्छंदता से डोल रहा था।
पालने को गुस्सा आता था, जब
लाल के पालने से स्वयं को निकृष्ट पाता था
पालना थक जाता था ,जब
लाली को दिन भर अपनी गोद में सुलाता था
माता-पिता की बेरुखी
उसको बहुत अखरती थी
लाली पर मुग्ध हो जाता
जब वह संवरती थी
पालने को चिंता भी थी
लाली से दूर हो जाने की
लाली सयानी हो हो चली थी
पर कैसे सोच सकती थी
पालने को भूल जाने की
संग उसके पालने की साथ थी
संग उसके पिछली वो रात थी।।।।।।।।
------- नीरज प्रियदर्शी------
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