रविवार, 25 जनवरी 2015

विचारधारा से प्रेरणा

इतिहास गवाह है कि कालानुक्रम में विचारधारा से प्रेरीत होकर विभिन्न संगठनों का उद्भव और विकास हुआ है। एक विचारधारा या क्रान्ति अपने साथ नए संगठनों को भी जन्म देता है। जब भी किसी एक राष्ट्र, भौगोलिक क्षेत्र या फिर विश्व के कोने में विचारधाराओं से प्रेरीत आंदोलन हुए हैं तब उन आंदोलनों के बाद नए संगठनों का  जन्म हुआ है जो बाद में शासन प्रक्रिया में भी अहम भूमिका निभाते हैं। मार्क्स के सर्वहारा वर्ग की क्रान्ति से चलकर लेनीन और स्टालिन तक तथा फिर बाद में भारत की वामपंथी पार्टीयों के रुप में एक विचारधारा ही चली आ रही है। माओत्से तुंग और चीनी क्रान्ति से प्रभावित होकर माओवादियों का उद्भव हुआ। इतिहास के पन्नों को पलटने को पर हमें यह भी मालुम चलता है कि फासीवाद और नाजीयों से प्रेरीत होकर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संध का उद्भव और विस्तार हुआ था। पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार श्रीलंका में बोडू बाला सेना नामक सिंहली बौद्धों का एक संगठन, संघ और नरेन्द्र मोदी से इस कदर प्रभावित है कि वे मोदी को अपना आदर्श मानते हैं तथा संघ की विचारधारा और संगठनात्मक ढांचे को आत्मसात करने की बात करते हैं।     
बोडू बाला सेना का इतिहास यह बताता है कि यह एक कट्टरपंथी संगठन है। यह संगठन कथित तौर पर श्रीलंका के बौद्धों के लिए आवाज उठाता है। पिछले वर्ष श्रीलंका में हुए मुस्लिम विरोधी दंगे में इनकी भूमिका पर संयुक्त राष्ट्र और यूरोपिय संघ चिंता जाहिर कर चुके हैं। इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट में सेना के एक उच्चस्थ नेता बताते हैं कि भारत की तरह श्रीलंका में भी धर्मांतरण का खतरा मंडरा रहा है। अल्पसंख्यक ज्यादा बच्चे पैदा कर जनसंख्या के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं, और इसमें विदेशी पैसा लगा है जिसे हम रोकने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए मोदी और उनकी पार्टी हमारे लिए प्रेरणा है।  श्रीलंका में सेना को एक बाहरी तत्व तथा धार्मिक पुलिस के रुप में देखा जाता है जो कि अल्पसंख्यको को अपना निशाना बनाता है  और अल्पसंख्यक वोट बैंक के प्रभाव पर सवाल खड़े करता है।
बोडू बाला सेना का प्रेरणा बना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास भी इसको प्रेरीत ही बताता है। संघ का इतिहास बताता है कि 1920 से 30 के दशक में जब इसकी स्थापना हुई थी तब यह भी इटली की फासीवाद से प्रेरीत था। फ्रंटलाइन की कवर स्टोरी में इस बात का जिक्र किया गया है कि संघ के संस्थापक हेडगवार के करीबी रहे डा. बी एस मुंजे 1930 के दशक में इटली गए थे और उन्होनें मुसोलिनी से मुलाकात की थी। नेहरू स्मृति संग्राहालय सह पुस्तकालय में रखी उनकी डायरी में उन्होनें मुसोलिनी से अपनी मुलाकात का वर्णन किया है। उन्होनें मुसोलिनी से कहा था कि मैं भारत में भी एक लड़ाका पीढ़ी तैयार करना चाहता हूं। मैनें भारत में एक संगठन की शुरुआत की है जिसके उद्देश्य आपसे प्रेरीत हैं। इटली से वापस लौटकर मुंजे ने हेडगवार के साथ मिलकर संघ का विस्तार किया। प्रकाशित लेखों तथा अन्य दस्तावेजों से यह साफ जाहिर होता है कि 1920 से 40 के दशक में सारे हिन्दु संगठन फासीवाद से प्रेरीत थे। मुसोलिनी के फासीवाद की तर्ज पर संध का विस्तार हुआ। दरअसल फासीवाद के लड़ाका प्रशिक्षण तरीके को अपनाते हुए इन संगठनों का विस्तार हुआ।
 एक ही विचारधारा से बंधे रहने पर उसपर सवाल उठने लाजमी हैं क्यूंकि किसी भी विचारधारा कि उत्पति तात्कालिक परिस्थितियों के अनुरुप होती है। फासीवाद के प्रेरणा से संघ का विस्तार होना तथा फिर अब संघ से प्रेरीत होकर श्रीलंका के बोड़ू बाला सेना की गतिविधियां आज के लोकतांत्रिक समाज से मेल नही खाती हैं। ये माना जा सकता है कि गुलाम भारत में राष्ट्रवादी सोच के प्रचार प्रसार के लिए संध की स्थापना हुई थी पर आज के दौर में वैसा राष्ट्रवाद प्रासंगिक नहीं है। आज हम आजाद हो चुके हैं और दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश के रुप मे पहचान रखते हैं। धर्म आधारित राष्ट्रवाद आज के दौर में समझ से परे लगता है। लोकतंत्र में फासीवाद का कोई स्थान नहीं है। राष्ट्रवादी उद्देश्य के होने पर भी संघ को अपनी कार्यशैली के साथ-साथ सोच में भी बदलाव लाना होगा। श्रीलंका की बोड़ू बाला सेना ने संघ से प्रेरीत होकर जिस प्रकार कि छवि बनायी है वह भी संघ की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करती है।
किसी विचारधारा से प्रेरीत होना कोई गलत बात नहीं है। प्रत्येक विचारधारा का आकलन करने पर उसकी खामियों के साथ-साथ उसकी अच्छाइयां भी नजर आती हैं। विचारधारा केवल एकनिष्ठ नहीं होती बल्कि यह समाज पर आधारित और वर्ग विशेष होती है। विचारधारा थोपी भी नहीं जा सकती है बल्कि यह आत्मसात करने के लिए है। यह दूसरों के प्रेरीत करने के साथ-साथ प्रभावित भी करती है। यह अंतहीन है और इसका प्रभाव पीढी दर पीढ़ी होता है। हालांकि इससे प्रेरीत और प्रभावित होने वालों की संख्या मे कमी आ सकती है पर विचारधारा अमरणशील है। यह उग्रवादी होने के साथ-साथ साम्यवादी भी हो सकती है और समाजवाद के दौर में अधिनायकवादी भी। विचारधारा के प्रवाह के क्रम में परिस्थिति, देश तथा काल के अनुसार परिवर्तन होता है। इसे परिवर्तित रुप में ही अपनाया जाना चाहिए। परिवर्तन के क्रम में इसमें कालानुसार संशोधन भी होना चाहिए। ऐसी विचारधारा जो कि आज से सौ साल पहले थी उसको यदि समय, देश तथा काल के अनुसार अंगीकार नहीं किया गया तो उसके प्रतिकूल परिणाम भी सामने आ सकते हैं। बेहतर होगा कि कि संघ अपनी कार्यशैली और सोच में बदलाव लाए जिससे बोड़ू बाला सेना जैसी संस्थाएं प्रेरीत होकर लोकतंत्र के प्रसार में सहायक हों। फासीवादी सोच और तकनीक में परिवर्तन की आवश्यकता है।  

          

बुधवार, 21 जनवरी 2015

हमारी अधूरी कहानी-जनता परिवार

               मन कर रहा है अपने उन साथियों से एक फिर से हाथ मिलाने का जिनसे कभी ढ़ेर सारे मुद्दों पर मतभेद के चलते अनबन हो गया था।  तब भी हमारे आदर्श एक थे और अभी भी एक ही है। हमारे बीच अनबन का सबसे बड़ा कारण था कि हम सबको यह जताना चाहते थे कि अपने गुरु के आदर्शों का पालन हम सबसे अच्छा करते हैं। हम ना सही हमारे गुरु ने तो जनता के बीच एक ऐसी छवि बनायी ही थी कि उसी के दम पर हम अपनी सामाजिक और राजनीतिक रोटियां सेक सकते थे। हमने ऐसा करने में अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। ऐसा करते करते अब आगे निकलने की होड़ में हमारे बीच टकराव पैदा हो गए हैं। हमने एक दूसरे से किनारा कर लिया लेकिन हमारे मान्य आदर्श पूराने ही रहे। हमारी पद्धती एक दुसरे से भिन्न थी। आदर्श हमारे लिए उतना मायने नहीं रखते जितना की सत्ता हासिल करने की महत्वाकांक्षा  रखती है। किसी भी तरीके से शासक बनने की जद में हमनें एक दूसरे के उपर कीचड़ भी उछाले। कथित तौर पर हम सब लोहिया के विचारों की विचारों की उपज है। जयप्रकाश आंदोलन की वैचारिक क्रान्ति हमारी विरासत रही है। हम समाज के असली धरोहर हैं। समाजवाद हमारा एकमात्र लक्ष्य है।
              हमने समाज को पहचाना, उसे जातीगत आधार पर श्रेणीबद्ध किया। हम गरीबों के असली नुमाइंदे हैं क्यूंकि सत्ता में रहकर उनके लिए एक से बढ़कर एक नीतियां और योजनाएं चलायी। चूंकि हम गरीबों का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए उन योजनाओं का सबसे ज्यादा लाभ हमने लिया। अपने सगे-संबंधियों सहीत अपने काम में मदद करने वालों के लिए भी हमने विशेष प्रयास किये। आखिर टुटे रिश्ते का दर्द हमसे ज्यादा कौन समझ सकता है। समाज के उस तबके के लिए जो अब तक वर्ण- व्यवस्था के आधार पर हाशिए पर धकेल दिया गया था, उनके लिए तो मसीहा का काम किया है। हम उनसे भावनात्मक लगाव रखते हैं, उन्हें अपने मोहपाश में इस तरह बांध लिया है कि हमारे एक आह्वान पर वे उमड़ कर हमारे साथ खड़े होते हैं। हमनें उन्हें यह भरोसा दिलाया है कि उनके हर एक समस्या के लिए हम जहां तक संभव हो सके आवाज उठाएंगे। केन्द्र सरकार को भी हिला कर रख देंगे। उन्हीं के लिए तो हमने अब तक की संभवतसारी सरकारों को कभी बाहर से तो कभी अंदर से समर्थन प्रदान किया है। अब इस सरकार को हमारी जरुरत नहीं है इसलिए तो हमने ये फैसला किया है कि इसका मुकाबला हम एकजुट होकर करेंगे। हमने समाज को एक अलग नजरिए से देखा जिसके आधार पर उसका विभाजन किया। धर्म के आधार पर, जाती के आधार पर, सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर और अपनी विशेषीकृत सोच के आधार पर हमने समाज को बांटकर परंपरागत रुढियों को और ज्यादा सशक्त बनाया। इस तरह से हमनें संस्कृति और सभ्यता को बचाये रखनें में भी अक्षुण्ण योगदान दिया।
              कहने को तो हम अलग थलग थे पर हमने सामाजिक वर्गीकरण की एक ऐसी पद्धति चुनी जिसके अंतर्गत हमने समाज को आपस में बांट लिया। किसी ने एक वर्ग को अपना साधन समझा तो किसी ने एक वर्ग को अपना मोहरा बनाया। आखिर हमने जिस वर्ग के प्रतिनिधित्व करने का फैसला किया था वही तो हमारे सत्ता की सीढ़ी थी। अपने इन मोहरों से खेलते हुए हमने सत्ता का स्वाद भी चखा। अब आप हमसे सवाल करेंगे की हमने जिनको सत्ता का साधन बनाया उनके लिए क्या किया? हम तो सिर्फ एक ही बात जानते हैं कि हम उनके सच्चे हितैषी हैं, हम उनसे भावनात्मक लगाव रखते हैं। उनके हर एक दुख दर्द में शामिल होते हैं, उनसे अभी भी अपील करते हैं अन्याय और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने के लिए ताकि उनमें असंतोष की भावना नहीं फैले। अब बताइए इससे ज्यादा और क्या कर सकते हैं। हमनें अपनी तरफ से जो भी बन पड़ा उनके लिए किया। हम अलग इसलिए हुए थे कि एक साथ आपस में सत्ता सूख बांटनें में परेशानी हो रही थी। एक परिवार के सदस्यों की संख्या में इजाफा हो जाने से स्वाभाविक है कि थोड़ी कलह होगी।
              सत्ता में रहते हुए हमारी कुछ और भी उपलब्धियां हैं मसलन, जंगल राज की स्थापना, चारा घोटाला, भाई-भतीजावाद का प्रसार, दलित से महादलित का निर्माण, मंडल कमीशन, वगैरह वगैरह। हम सत्ता के भूखे थे, क्यूंकि हमें पता था कि हमारा सर्वोच्च लक्ष्य बिना सत्ता हासिल किए मुमकिन नहीं है। हम सम्पूर्ण भारत-वर्ष में अपना दबदबा रखते हैं। यद्दपि हमारे बीच बिखराव हो गए थे तथापि पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण में हमारे घटक मौजूद थे। हमनें सत्ता के लिए क्या कुछ नहीं किया? कृष्ण ने जिस प्रकार गीता में शाम, दाम, दण्ड, भेद का पाठ अर्जुन को पढ़ाया था, सही मायनों में हमने उसे आत्मसात किया है। हमनें लोगों को लालच दिया, झुठा भरोसा दिया और उनके साथ छल भी किया। हमनें अपने विरोधियों को दण्ड देने के लिए जंगल राज का मॉड़ल चुना। उनके बीच आपस में विद्वेष बढ़ाने के उद्देश्य से मंड़ल कमीशन के रुप में आरक्षण सुनिश्चित करते हुए प्रायोजित दंगे भी कराए। हां, लोकतंत्र के प्रति निष्ठा रखने के मामले में हमारा कोई सानी नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में मतों की कीमत सबसे ज्यादा होती है। हमनें उनका मुल्य समझा, उनकी खरीद- बिक्री की। हम तो यही कहेंगे कि हमने जिस तरह से दल-बदल को अपनाया है उसी का यह नतीजा है कि आज भारत में बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था सांस ले रही है।
                हम आज बिखराव के दौर में हैं। जिस सामुहिक लक्ष्य के साथ हम एकजूट हुए थे वह समय के साथ व्यक्तिगत हो गया। हमने अपना अलग-अलग रास्ता चुन लिया। हमारे विरोधियों ने भी हममें फूट ड़ालने की कोशिश की और कामयाब हो गए। चूंकि हम समाज के अलग-अलग वर्गों तथा असमान भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते थे अतएव आसानी से टूट गए। हमें बहकाया गया इसलिए हमनें एक दुसरे के साख पर कीचड़ भी उछाले। एक दूसरे पर हमले किए और आपस में धूर विरोधी भी बन गए। पर, उस बिखराव के दौर में भी हमनें अपनी नियत नहीं बदली ना ही शासन के अपने तरीके में परिवर्तन किया। हमसे गलती भी हुई। हमनें अपने आदर्शों को पीछे छोड़ दिया था। जिस बुनियाद पर हमारी दीवार खड़ी हुई थी, हमें उसका ख्याल नहीं रहा था। यही कारण है कि हम भरभराकर टूट गए। अपने गुरु के दिए तालीम को भूल जाने से ही हमारा क्षय हुआ। हमारी टूट का एक और कारण यह भी था कि जिस राजनीतिक पद्धति के सहारे हम चल रहे थे, वैसा ही तरीका हमारे विरोधियों ने भी अपना लिया था। हम गरीब तबके से आते थे इसलिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन और संगठनात्मक ढ़ांचा मौजूद नहीं था, जबकि विरोधी साधन-संपन्न थे। उनका संगठनात्मक ढांचा भी हमसे ज्यादा व्यापक और मजबूत था। जिस तरह से हमनें अपने से अनुभवी और पुराने लोगों को चूनौती दी थी और उनसे आगे भी निकल गए थे, ऐसा लग रहा था कि हम पूरे भारत में अपना एकाधिकार जमा लेंगे। पर हमारा दांव उल्टा पड़ गया था। विरोधियों ने हमारे तरीके को ही आत्मसात कर हमें तोड़ते हुए हरा दिया था।
              अब एक बार फिर से हम एक होना चाहते हैं और इसके लिए जनता से कुछ नए वादे भी किए हैं। अपने विरोधियों पर सामूहिक प्रहार करना चाहते है। विरोधी अब हमारे अस्तित्व को चूनौती दे रहे हैं। हमें अपने आदर्शों की और मुड़ना होगा। समाजवाद के सपने को साकार करने की खातिर हमारा पून; एकजूट होना आवश्यक है। हम वही जनता परिवार हैं जिसने भारतीय इतिहास में पहली बार कांग्रेस मुक्त भारत का सपना दिखाया था। हम लोहिया और जयप्रकाश के विचारों और आंदोलन की उपज है। अब एक बार फिर से हम एक होना चाहते हैं। अपने विरोधियों पर सामूहिक प्रहार करना चाहते है। विरोधी अब हमारे अस्तित्व को चूनौती दे रहे हैं। हमें अपने आदर्शों की और मुड़ना होगा। समाजवाद के सपने को साकार करने की खातिर हमारा पून; एकजूट होना आवश्यक है। हम वही जनता परिवार हैं जिसने भारतीय इतिहास में पहली बार कांग्रेस मुक्त भारत का सपना दिखाया था। इस बार हम अपने आदर्शों पर टिके रहने की कोशिश करेंगे और अपनी पद्धति में भी बदलाव लाएंगे। पिछली गलतियों से सबक लेते हुए इमानदार प्रयास करेंगे। जनता के खोए भरोसे को वापस हासिल करेंगे। वर्तमान में कमजोर दिख रहे विपक्ष को मजबूत बनाएंगे। हम साथ आएंगे और जेपी के सपने को साकार करेंगे।    
                                                                                                    


   

रविवार, 18 जनवरी 2015

ओबामा का परेड दर्शन

भारतीय इतिहास में पहली बार एक अमेरीकी राष्ट्रपति का गणतंत्र दिवस की परेड में मुख्य अतिथि के तौर पर भारत आगमन हो रहा है। अमेरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इससे पहले भी एक बार भारत आ चुके हैं। सप्रंग सरकार के शासन काल में ओबामा के भारत आने के बाद से भारत और अमरीका के संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। परमाणु अप्रसार संधि, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर अमरीका की सोच स्पष्ट हुई है। चीन के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए अमरीका के साथ आर्थिक, राजनैतिक तथा कुटनीतिक  संबंध बनाने जरुरी हैं।  अमरीका वेसे भी सुपर पावर कहलाता है इस बात को ध्यान में रखते हुए उससे मैत्रीपूर्ण संबंध तथा आपसी सहयोग आवश्यक है। वर्तमान में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार भी इस दिशा में पहल कर रही है। कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री का अमेरीकी दौरा, अमेरीकी विदेश मंत्री का भारत दौरा तथा अब अमरीका के राष्ट्रपति का गणतंत्र दिवस की परेड में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होना यह बताता है कि दोनों देश आपसी संबंधों को नए आयाम देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इससे पहले भी गणतंत्र दिवस की परेड़ मे विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों का बतौर अतिथि आगमन हुआ है। पर इस बार बराक ओबामा का मुख्य अतिथि होना कई मामलों मे खास है। ये आगमन न केवल आपसी संबंधों को मधुर बनाने के लिए प्रस्तावित है बल्कि अपने साथ कई विवादों और मुद्दों को जन्म देनेवाला भी हैं।
हाल के दिनों में अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छापी जा रही है कि बराक ओबामा के भारत आगमन पर सुरक्षा की दृष्टि से तमाम तरह के इंतजामात किए गए हैं। जहां भी ओबामा के रुकने का कार्यक्रम है वहां सुरक्षा के लिए भारी पुलिस बल के साथ-साथ सामान्य नागरिकों के लिए तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए जाने हैं।  मसलन, वो होटल जहां ओबामा रुकने वाले हैं उसे तीन दिन पहले ही अन्य लोगों के लिए बंद कर दिए जाएंगे। आसपास के इलाके में भी भारी पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है तथा सड़कों को भी आम लोगों के लिए बंद कर दिया जाएगा। गणतंत्र दिवस के परेड़ के दौरान भी अमरीकी राष्ट्रपति के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। उनके बैठने के लिए अलग व्यवस्था की गई है। सुरक्षा कारणों के चलते ओबामा अपनी गाड़ी से परेड़ स्थल तक आएंगे। जबकि इसके पहले तक ऐसी परंपरा थी कि मुख्य अतिथि राष्ट्रपति के साथ गाड़ी में आते थे। राजपथ के पूरे इलाके को दो दिन पहले ही सील कर दिया जाएगा। पूरी दिल्ली में 15000 सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं। ओबामा के साथ उनका पूरा दस्ता भी आ रहा रहा है जिसमे कि विमानों , गाड़ीयों तथा अन्य सुरक्षाकर्मी भी शामिल हैं। पूरे प्रतिनिधि दल के भी रहने का इंतजाम पंचसितारा होटलों में किया जा रहा है. कुछ दिनों पहले आई एक अमेराकी जांच समिति के रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि दिल्ली में प्रदुषण के स्तर को देखते हुए ओबामा का अधिक देर तक खुले में बैठना भी हानिकारक है। यह उनके फेफडों को नुकसान पहुंचा सकता है। राष्ट्रपति के प्रोटोकाल के अनुसार वे कहीं भी एक स्थान पर 20 मिनट से ज्यादा देर तक नहीं बैठ सकते हॆं। उन्हें अपना स्थान बदलते रहना होगा जो कि गणतंत्र दिवस की परेड़ में संभव नहीं है। सुरक्षा करणों के चलते अमरीकी सुरक्षा एजेंसियों ने यह मांग भी है कि राजपथ को नो फ्लाइंग जोन बनाया जाए। दिल्ली के बाद ओबामा का कार्यक्रम आगरा में ताजमहल के दीदार का भी है। उसके लिए भी सुरक्षा के चौकस इंतजाम किए गए हैं. सबसे बड़ा कदम तो यमुना एक्सप्रेसवे को दो दिन पहले से ही बंद किए जाना है। आगरा पहुंचने बाद भी उसी तरह की व्यवस्था की गई है कि जैसी की राजधानी दिल्ली में है। इस प्रकार अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा के भारत आगमन पर सुरक्षा के अभूतपूर्व उपाय किए गए हैं। आज तक भारत के इतिहास में किसी राष्ट्रप्रमुख के आगमन पर ऐसी व्यवस्था नहीं की गई है। हालांकि इसके पहले भी ओबामा के भारत आने पर ऐसे सुरक्षा उपाय किए गए थे पर गणतंत्र दिवस के समय ऐसा कभी नहीं हुआ है।
ओबामा का भारत आगमन कई मायनों में महत्वपूर्ण है। ओबामा के भारत आने पर दोनो देशों के बीच आर्थिक तथा कुटनीतिक सहीत कई मसलों पर सहमती के आसार हैं। मल्टी ब्रांड रिटेल से लेकर सैन्य खरीदारी  आपसी समन्वय के बगैर असंभव है। चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना भी अमरीका के साथ हाथ मिलाने से ही संभव है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अमरीका के साथ बेहतर संबंध हमारी जरुरत में शामिल है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि ओबामा को मुख्य अतिथि के रुप में बुलाकर सुरक्षा के नाम पर अपना मजाक बनवाया जाए। अमरीकी सुरक्षा एजेंसियों के नखरे इतने सारे हैं कि भारत में उनकी भरपायी नहीं की जा सकती। इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता है कि ओबामा आतंकियों की हिट लिस्ट में शामिल हैं। साथ ही साथ भारत की सुरक्षा व्यवस्था के हालात भी किसी से छिपे नहीं हैं। ये सारी बाते जानते हुए भी ओबामा को गणतंत्र दिवस के समय आमंत्रित करना कहीं से भी जायज नहीं लगता। उन्हें कभी और भी बुलाया जा सकता था। जब आपकी सुरक्षा ही संदिग्ध हो तब आप ओबामा को सुरक्षा कैसे प्रदान करेगे। ओबामा का अपना प्रोटोकाल है जिसका पालन भारत के वर्तमान हालात मे संभव नहीं है। इस प्रकार से हम अपना मजाक नहीं बना रहें हैं तो और क्या?

ओबामा का भारत आगमन भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के साथ-साथ जनता के लिए भी सिरदर्द साबित हो रहा है। ओबामा की आगवानी में सुरक्षा के नाम पर एक तो जनता के पैसों को पानी की तरह बहाया जा रहा है साथ ही साथ उसपर तमाम तरह के प्रतिबंध भी लाद दिए गए हैं। मौर्या शेरेटन होटल और आसपास के इलाकों को तीन दिन पहले ही आम जनता के लिए बंद किए जाना परेशानी तो आम जनता के लिए ही है। राजपथ को भी दो दिन पहले ही बंद किया जाना यही दर्शाता है। यमुना एक्सप्रेसवे का भी दो दिन पहले बंद किये जाने से आम यातायात पर भारी असर पड़ेगा। जब इतनी बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती ओबामा की सुरक्षा के लिए होगी तब आम जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारियां कौन लेगा? जबकि पहले ही गणतंत्र दिवस के दिन आतंकी हमलों की आशंका जतायी जा चूकी है। जरुरी नहीं है कि कोई भी घटना परेड़ के दौरान राजपथ के पास ही हो। दिल्ली जैसे शहर में कहीं भी आतंकी हमला हो सकता है और आतंकी अपनी कोशिश में सफल हो जाएंगे। भारत का मजाक भी देश के लोगों के साथ मजाक ही तो है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ओबामा का भारत आगमन यदि किसी मामले में सफल हो भी जाता है फिर भी भारत की प्रतिष्ठा पर तो आंच आएगी ही। राष्ट्रमंड़ल खेलों के दौरान भी ऐसा ही हुआ था। आमरीका के साथ संबंध बनाने की कीमत पर देश के साख के साथ मजाक भविष्य में दीर्धकालिक असर ड़ालेगा। जनता तो ऐसे झेलने कीआदी हो गई है। हां जनता के लिये एक कि बहुत ही अच्छी खबर है कि अब जो सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने हैं उसकी सुरक्षा के लिए मददगार साबित होंगे. ये अलग बात है  है कि अभी तक सुरक्षा की कोई ऐसी व्यवस्था नहीं थी.  
हमारे लिए मेहमान देवता के समान होता है.  मेहमान के आतिथ्य के लिए हम ये भी ख्याल करना भूल जाते हैं कि हमारी हालत और संसाधन पर्याप्त हैं कि नहीं. ये हमारी परंपरा भी है और खासियत भी.  पर जब मेजबानी में कोई हमारा मखौल उड़ाये तब ऐसे आतिथ्य का क्या औचित्य है.  

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

बेटी



 नन्हीं सी कली के आगमन में
कहीं बाजे है बधाइ , कहीं साजे है शहनाइ
नन्हीं सी कली के आगमन में
कराहती वो माई, झुमे है वो भाई
बिटीया का आना, किसी ने नहीं था जाना
किसी का प्यार से गोद में लगाना
किसी को नहीं लगा सुहाना
कोई प्यार लुटाता ,कोई दुत्कार के बुलाता
किसी की बेरुखी उसे बिल्कुल नहीं भाता
दोहरा रवैया बचपन से झेली थी
भाई के जैसा कभी नहीं खेली थी
कल्पना के सागर में अकेले ही गोते लगाती
दुनिया के प्रतिबंधों पर दिल को समझाती
खुद को मनाती, अपने शौक को दफनाती
मनुहारी समाज की रीतियों में पलती
हुई सयानी बेटी की कहानी
बापू की चिंता बढ़ने लगी थी
एक नयी बोझ से लदने लगी थी
बिटीया हुई जवान पर नहीं मिला कद्रदान
सड़कें सवाल करती थीं
समाज आइना दिखाता
व्यवस्था का संरक्षण भी था
पर, पर सपनों पर पहरे लगे थे
बेटी होना सताता था
कोई नहीं गले लगाता था
किसी को हवस की आग थी
कोई पैसों पर बेचता था
सबकी अपनी उत्कंठा थी
भाग्य खुद को कोसता था।
अपने पराया कहते
दुनिया संवेदना दिखाती
बेटी चली ससुराल
लिए अतीत का जंजाल.
बेटी अब औरत है, ममता की मूरत है
परिवार की गिरह है, सास की जिरह है.
बापु का अभिमान है, पति का सम्मान है

लाली का पालना

पालने की खामोशी बताती है
अपने अकेलेपन को, अपने इंतजार को
कोने में पड़ा हर क्षण
किसी की राह तकता है
बेखबर इस बात से कि
जिस लाल के चाह में
उसका वजूद आया
खो नहीं जाए कहीं.
रात के अंधेरे में
काना-फूसी सुनता है
अपने वजुद के जनक की
लाल की जननी की
आशंकित हो उठता है
फिर से एक बार
अपने कल के लिए
स्वच्छंद डुलने की चाह में.
बड़े इंतजार के बाद
आंसूओं के सूख जाने पर
स्वामी की झल्लाहट थी
जननी का अपराधबोध था
क्यूंकि लाली को जना था
क्यूंकि नन्हीं कली खिली थी
पालना मुस्कराया है,
गोद में कोई तो आया है
लाली का आना
पालने के लिए वरदान था
परिवार के लिए अभिशाप था
पिता को कल की चिंता थी
अपराधी मां की ममता थी
पर इससे बेखबर, पालना
आंगन की धूप में , लाली के रुप में
स्वच्छंदता से डोल रहा था।
पालने को गुस्सा आता था, जब
लाल के पालने से स्वयं को निकृष्ट पाता था
पालना थक जाता था ,जब
लाली को दिन भर अपनी गोद में सुलाता था
माता-पिता की बेरुखी
उसको बहुत अखरती थी
लाली पर मुग्ध हो जाता
जब वह संवरती थी
पालने को चिंता भी थी
लाली से दूर हो जाने की
लाली सयानी हो हो चली थी
पर कैसे सोच सकती थी
पालने को भूल जाने की
संग उसके पालने की साथ थी
संग उसके पिछली वो रात थी।।।।।।।।

                                        ------- नीरज प्रियदर्शी------


शनिवार, 10 जनवरी 2015

धर्म के पार

किसी के अभिव्यक्ति के अधिकार पर चोट करना, मासूम बच्चों का कत्लेआम करना, लोगों को आस्था के नाम पर गुमराह करना और जबरन किसी पर अपनी रुढ़ियों और विचारों को थोपना आज के समय में धार्मिक कृत्यों की श्रेणी में गिने जाने लगे हैं। पूरी दुनिया में इस प्रकार के धार्मिक कार्यों का चलन सा शुरु हो गया है। एक बात समझ के दायरे के बाहर है कि ऐसे धार्मिक कार्यों का वर्णन कहाँ और किस प्रकार है? आप सारे धर्मग्रन्थों को छान मारिए, किसी भी धर्मग्रन्थ में ऐसे कृत्यों का उल्लेख नही मिलेगा। तब यह सवाल उठता है कि क्या सच में ऐसे कृत्य धर्म के लिए ही किये जाते है? इन कामों को करने वालों की मानें तो धर्म की रक्षा तथा प्रचार प्रसार के लिए उनका धर्म ऐसे कामों के लिए अधिकार प्रदान करता है।

वर्तमान समय में धर्म सबसे शक्तिशाली संस्था है जिसके पास तमाम तरह के अधिकार और शक्तियां हैं। अपने विकास के क्रम में धर्म ने आज पूरी मजबूती से समाज में अपनी पैठ बना ली है। परिभाषा के आधार पर धर्म को मान्यता और आस्था से जोड़ कर देखा जाता है। इसे संस्कृति एवं इतिहास के प्रतीक के रुप में भी देखा जाता है। विद्वानों के बीच धर्म को लेकर अभी तक विरोधाभास कायम है। धर्म का इतिहास प्राचीन है। हमें इतिहास, मान्यताओं, रुढ़ियों और सिद्धान्तों से अलग धर्म को व्यवहारिक धरातल पर रखकर सोचने की आवश्यकता है। यदि धर्म की कसौटी की बात करें तो धर्म कहता है कि जो अपने अनुकूल नही हो वैसा व्यवहार दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। इस कसौटी पर वर्तमान समय में धर्म कितना प्रासंगिक है? धर्म हमसे क्या कहता है और हम धर्म के लिए क्या करते है? हम धर्म का उपयोग किस प्रकार करते हैं? खोखली मान्यताओं के लिए या फिर मानवता को शर्मशार करने के लिए?

मनु संहिता मे वर्णित धर्म के दस लक्षण (धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥) आज धर्मग्रन्थों तक ही सीमित हैं। व्यवहार से इनका कोई नाता नहीं रह गया है। धर्म अब मान्यता नहीं रह गया है, एक बाजार बन गया है। एक ऐसा बाजार जहां विभिन्न धार्मिक कृत्यों को पूंजी के साधन के रुप में समझा जाने लगा है। धर्म का दर्शन अब आध्यात्म नहीं है बल्कि मिथक और आडंबर है। प्रार्थना और सम्मान धार्मिक कार्य नहीं रह गए हैं, इनका स्थान जोर-जबरदस्ती और दूसरों के भावनाओं को ठेस पहुंचाना हो गया है। जबरन अपनी रुढ़ियों को दूसरे पर थोपना और मनवाना घरवापसी मानी जाने लगी है। एक खास धर्म अब अपना एकाधिकार चाहता है। उसे क्षमा और धैर्य से कोई मतलब नहीं है, वह तो बस किसी के निहित स्वार्थ का निमित्त मात्र है। एकाधिकार की चाह में किसी भी हद तक जाना जिहाद कहा जाने लगा है। जिहाद जैसा धार्मिक कृत्य कैसे धर्म को प्रतिबिंबित करता है यह तो दिख ही चुका है। अभिव्यक्ति और जीवन के अधिकार के बावजूद भी धार्मिक कृत्य थोपे जाने लगे हैं। धर्म के प्रचार-प्रसार के ऐसे तरीके अपनाए जाने लगे हैं कि धर्मग्रन्थ भी थोथे नजर आते हैं।धर्म का घिनौना चेहरा तब नजर आता है जब इन धार्मिक कृत्यों पर सवाल खड़े होते है, कोई इन्हें मानने से इन्कार कर देता है और धर्म के आकाओं से पूछने की हिमाकत की जाती है। आखिर कोई सवाल क्यूं नहीं कर सकता। जब मान्यता के साथ-साथ मानवता भी शर्मशार हो तब हिसाब-किताब तो देना ही पड़ेगा। धर्म का अतिरंजक चेहरा सबके सामने आना चाहिए। स्वयंभू धर्मगुरुओं से उनके धार्मिक कृत्यो के दुष्परिणामों का जवाब तो लेना ही पड़ेगा। कोई कब तक हमें बरगलाता रहेगा।

अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। दर्द जब सताने लगता है तब छटपटाहट होनी स्वाभाविक है। आपके ही दिए गए मजहबी जख्मों पर मलहम लगाए जाने के प्रयास हो रहे हैं। जब आप किसी को कुछ करने की सलाह देते हो तब आपको भी अपने कृत्यों का ब्यौरा पेश करना पड़ेगा। घरवापसी केवल इन्सानों की ही नहीं होती है। घर में कलह और पाखंड की अतिरंजना हो जाने पर नए विचारों और मान्यताओं की भी घरवापसी होती है। कभी कोई पीके आएगा तो कभी शार्ली एब्दा। बेहतर होगा कि आप अपने धार्मिक कृत्यों का लेखा करा लें अन्यथा पेशावर के स्कूली बच्चों जैसे अन्य बच्चे भी लेखाकार बनने की जुगत मे हैं। 

शनिवार, 3 जनवरी 2015

सरकार आई है!!

देखो ना सरकार आई है
मंगलयान पर सवार आई है
जनधन अपार लाई है
स्वच्छता की बयार लाई है
हमारी-आपकी बहार आई है!

देखो ना सरकार आई है
पर घरवापसी के लिए संघी कार लाई है
अध्यादेशों के साथ हुंकार आई है
योजना को नकार आई है
नए वर्ष के साथ नयी नीति लाई है!

देखो ना सरकार आई है
थोक महंगाई पर लगाम लाई है
पिंजड़े के तोते को बोलना सीखा आई है
भ्रष्टाचार के दीमक के लिए रामबाण लाई है
आपके न्याय की गुहार लाई है!

देखो ना सरकार आई है
मेक इन इंडिया की सौगात लाई है
गंगा के लिए मान लाई है
उद्दयोगपतियों में नई जान लाई है
किसानों के लिए स्वाभिमान लाई है!

देखो ना सरकार आई है
वादों की बऱसात लाई है
काले धन को लाने की ठान आई है
विकास की रफ्तार में धार आई है
जनता का कथित विश्वास साथ लाई है!

पर, देखो ना सरकार आई है
शिक्षा में स्मृति का बहस लाई है
देवों की भाषा को थोप आई है
सिर्फ हिन्दु के लिए नया हिन्दुस्तान लाई है
बाकियों को बदलने की कवायद लाई है!

पर, देखो ना सरकार आई है
रंजीत के जगह अनिल लाई है
पिंजड़े को चूहेदानी में बदल लाई है
पड़ोसी से रिश्ते में दरार लाई है
अमेरिका में झुठ का दहाड़ आई है!

पर, देखो ना सरकार आई है
घर की शांति को भेद आई है
सहारनपूर से चलकर त्रिलोकपूरी में दंगे साथ लाई है
सबके साथ का नारा लाई है
शासन में एकाधिकार लिए आई है!

देखो देखो सरकार आई है
टीवी में छाई है,टीआरपी की लड़ाई है
अखबारों में छायी है, मालिकों की कमाई है
क्या पुरानी ही नया मुखौटा लगाई है
अब समझ लिजिए इसके मन में क्या समाई है!
                              ---- नीरज प्रियदर्शी-------