बुधवार, 29 अप्रैल 2015

त्रासदी के बाद

भूकंप आने की भविष्यवाणी और भूकंप झेलने के बाद के जीवन की कल्पना का वर्णन करना ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार मृत्यु का आभास और मर जाने के बाद परिजनों के बीच बिखरा मातम का माहौल। तमाम कोशिशों के बावजूद मौसम वैज्ञानिक और भूगर्भवेत्ता आज तक भूकंप की भविष्यवाणी करने में नाकाम रहे हैं। ज्योतिष और धर्मगुरुओं ने हालांकि इसके कारणों को जरुर गिनाया है लेकिन उनके बाताये कारण उसी प्रकार हास्यास्पद लगते हैं जैसे चोर चोरी करने के कारणों को बयान करता है। वैसे ही भूकंप के बाद की वास्तविक स्थिति का आकलन करना भी प्रतीत होता है। जिस प्रकार मनुष्य मृत्यु के बाद आत्मा के रुप में अपने परिजनों को रोते बिलखते देखने के बावजूद बाध्यकारी होकर कुछ नहीं कह पाता है और उन्हें इस बात का अहसास नहीं करा पाता कि मनुष्य मरणशील है। भूकंप के कारणों का असली पता होने के बावजूद भी विशेषज्ञों की तरफ से आयी प्रतिक्रिया भी वैसी ही लगती है जैसे रोते बिलखते परिजन मृत व्यक्ति की बुराईयों का पर्दाफाश उसकी नेकनीयती और सुंदर आचरण को बता कर करते हैं।
पिछले दिनों नेपाल और उससे सटे भारतीय राज्यों में आए भीषण भूकंप के बाद अब राहत और बचाव कार्य प्रगति पर है। पीड़ितों के पुनर्वास और मलवे में दबे शवों को निकालने का काम जोरों पर है। अभी तक 5000 से भी ज्यादा लोगों के मरने की पूष्टि हो चूकी है जबकि वहां के प्रधानमंत्री ने 10000 से भी ज्यादा लोगों के मरने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि भूकंप का केंद्र नेपाल की राजधानी से 90 किमी दूर पोखर था, लेकिन इससे मची तबाही का असर न केवल नेपाल में बल्कि उससे सटे भारतीय राज्यों में भी  देखने को मिला। भारत में भी भूकंप के कारण लगभग 150 जानें गई हैं। अपेक्षाकृत रुप से भारत में जान-माल का नुकसान कम हुआ लेकिन यहां के लोग भी दहशत में जीने को मजबूर हो गए। कारण था कि भूकंप के झटके लगातार आ रहे थे। नेपाल में तो छोटे बड़े कुल मिलाकर 60 से भी ज्यादा झटके महसूस किए गए। नेपाल के इतिहास में ऐसा भूकंप आठ दशकों के बाद आया है जिसकी अधिकतम तीव्रता 7.8 आंकी गई। भूकंप के बाद हुए जानमाल के नुकसान की तस्वीर तब स्पष्ट होगी जब राहत, बचाव और पुनर्वास कार्य पूरा होगा। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इस भायानक हादसे के कारण नेपाल को करोड़ो अरबों रुपए का नुकसान हुआ है और न जाने कितनी जिंदगियां  काल का ग्रास बन चुकी हैं। ये भी अनुमान लगाया जा रहा है कि इस हादसे से उबरने में नेपाल को एक लम्बा वक्त लगेगा और उसकी अर्थव्यवस्था बहुत पीछे चली गई है। वहां की इमारतें खासकर पुराने भवन और घरोहर अब धरोहर नहीं रह जाएंगे।
भूकंप के कारणों को वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य से देखें तो यह एक सामान्य सी प्राकृतिक प्रक्रिया है जो हमेशा गतिशील रहती है। पृथ्वी की संरचना विभिन्न परतों से मिलकर हुई है जिन्हें मेंटल, क्रस्ट और कोर कहते हैं। पृथ्वी के गर्भ में जब ये परतें एक दूसरे से टकराती हैं तब कंपन होना स्वाभाविक है। कभी कभार ये परतें जोर से टकराती हैं तब भूकंप की तीव्रता और भीषणता बढ़ जाती है। ये परतें अपने विकास के क्रम में ही एक दूसरे से टकराती हैं। यह एक प्रकार से प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रकिया है, जिसपर काबू नहीं पाया जा सकता है। ऐसे में भूकंप को रोका नहीं जा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि भूकंप का केंद्र कहां है जिससे विनाश और बर्बादी कम हो। ये बात तो तय है कि भूकंप को रोका नहीं जा सकता है लेकिन  कुछ उपायों और सावधानीयों को अपना कर हम इस तबाही और इसके दुष्परिणाम को कम जरुर कर सकते हैं। इमारतों के निर्माण के समय जरुरी मानकों को अपना कर, आपदा प्रबंधन को प्रभावी बना कर, नागरिकों को जरुरी जागरुकता प्रदान कर और पर्यावरणीय जरुरतों का खयाल रखकर हम तबाही को कम कर सकते हैं।
हमें हिमालय को भी ध्यान में रखना होगा। ये बात गौर करने लायक है कि बीते दिनों में ज्यादातर प्राकृतिक आपदाएं हिमालय से सटे प्रदेशों में ही हुई है, मसलन पिछले साल केदारनाथ की तबाही और अब नेपाल में आया भूकंप। अब सवाल ये है कि आखिर ये भीषण आपदाएं हिमालय से सटे प्रदेशों में ही क्यूं होती हैं। हिमालय विवधताओं से भरा एक यूवा पर्वत श्रृंखला है जो अपने विकास के दौर में है। नित-प्रतिदिन हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं में नवीनतम परिवर्तन आते रहते हैं। शायद ये परिवर्तन ही इन आकस्मिक आपदाओं के जनक हों। दूसरी बात जो हिमालय के लिहाज से और भी महत्वपूर्ण है वह यह कि हम हिमालय को लेकर कितने सजग हैं। ये कहने में तो हम देरी नहीं करते हैं कि हिमालय अपनी गोद में हम प्रश्रय प्रदान करता है लेकिन दुखद ये है कि हम हिमालय की इस महिमा को भूलकर कंक्रीट के शहर बनाने को ज्यादा तवज्जो देने लगे हैं। पहाड़ों को काटकर जब हम हिमालय के अंग को क्षत-विक्षत करने लगेंगे तो उसके दुष्परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। इसी का नतीजा आज हमारे सामने है। हम पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करेंगे तो जाहिर तौर पर पर्यावरण भी अपना रंग दिखाएगा।

 बहरहाल, जरुरत है नेपाल को वापस ढर्रे पर लाने की। भूकंप के बाद की त्रासदी और भी खतरनाक होती है। पड़ोसी होने के नाते हमें नेपाल को सहारा देना होगा इस तबाही से उबरने के लिए। आर्थिक मदद के साथ-साथ भावनात्मक लगाव की आवश्यकता है। एक ऐसा देश जिसने आज तक किसी को क्षति नहीं पहुंचायी है, हमसे मदद के उम्मीद लगाए बैठा है। भारत की तरफ से अब तक के किए प्रयास सराहनीय रहे हैं। इसे आगे भी जारी रखना होगा। राजनीतिक ही नहीं अपितु सामाजिक और मानवीय लिहाज से भी हमें साथ देना होगा।किसी को क्षति नहीं पहुंचायी है, हमसे मदद के उम्मीद लगाए बैठा है। भारत की तरफ से अब तक के किए प्रयास सराहनीय रहे हैं। इसे आगे भी जारी रखना होगा। राजनीतिक ही नहीं अपितु सामाजिक और मानवीय लिहाज से भी हमें साथ देना होगा। नेपाल को पून:  उसके पुराना रुप देने के लिए सबको साथ आना पड़ेगा। मानवता की यही पूकार है।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

गुमनामी का मुकाबला जुझारुपन से- बिहार के किसान

अब तक बहसों और परिचर्चाओं में ये अक्सर सुना करता था कि बिहार के किसान अंदर से बहुत मजबूत होते हैं। उनके पास अदम्य साहस और सहनशीलता होती है। ये एक धड़ा कहा करता था। एक दुसरा भी धड़ा था जो यह पक्ष रखता था कि बिहार के किसान अपेक्षाकृत रुप से कम खेती करते हैं। उनके कहने का अभिप्राय यह था कि दूसरे प्रदेशों के किसानों की तुलना में बिहार में नगदी या जिविकोपार्जन आधारित खेती कम की जाती है। इस प्रकार यहां के किसानों पर कम बोझ एंव जिम्मेदारी होती है।
ये दोनो पक्ष अपनी समझ और नजरिए के लिहाज से बहुत हद तक स्थिति का बयान भी अपने-अपने ढ़ंग से करते हैं। दरअसल एक पक्ष वो है जो बिहार के किसानों  और खेती से भावनात्मक लगाव रखता है। शायद किसी ना किसी रुप से वह इनसे जुड़ा भी होता है। शायद वह इसी जुड़ाव के कारण अपनी मनोदशा को ही किसानों की मनोदशा समझ लेता है। स्पष्ट है कि वह अपना पक्ष और स्थिति का आकलन अपने नजरिए और समझ के हिसाब से करता है। जो दूसरा पक्ष है वह रिपोर्टें तैयार करता है। पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखता है। टीवी की बहसों में भाग लेता है और कृषि एवं अर्थशास्त्र के संदर्भ ग्रन्थों को अपनी समझ में व्यापक तौर पर इस्तेमाल करता है। फसल उत्पादन और विकास दर को अपने हर एक वक्तव्य में उद्धृत करता है। इस धड़े के संदर्भ में इतना ही कह सकते हैं कि ये पक्ष भी आंकड़ो और उत्पादन पर अपनी समझ और नजरिए को व्यक्त करता है।
हां, हम एक काम जरुर कर सकते हैं कि इन दोनो धड़ों के विचारो के समन्वित और समेकित नजरिए पर अपनी नजर डाल सकते हैं। संयुक्त रुप से दोनो तरह के विचार बहुत हद तक स्थिति का वर्णन करने में सक्षम हैं। लेकिन, पूरी स्थिति तब स्पष्ट होगी जब हम वास्तव में सबसे निचले और बुनियादी स्तर पर इसकी पड़ताल करते हैं। ग्राउंड जीरो की स्थिति एक अलग तस्वीर पेश करती है। यहां आपको मनेर के किसान गजेंद्र के परिवार से मुलाकात होगी। ये वो गजेंद्र नहीं है जो किसी हाई वोल्टेज और आयोजित रैली के दौरान पेड़ से लटक कर आत्महत्या करता है। ये वो किसान नहीं है जिसके हक के लिए समाजसेवी और सिविल सोसाईटी के लोग धरने देते हैं, अदालतों में याचिकाएं दायर की जाती है। यह वह किसान भी नहीं है जिसके प्रतिनिधि संसद में बेबाक होकर उसके हक की मांग करते हैं। यह उस प्रदेश से भी नहीं आता जिसके कवरेज के लिए पत्रकारों और केमरामैनों का जत्था जाता है।
दरअसल,  गजेंद्र और उसके जैसे किसान गुमनामी और अनदेखी का शिकार होकर अपनी सहनशीलता का परिचय देते हैं। वह उत्पादन और पैदवार के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय पटल पर रिकार्ड विकास दर दर्ज कराता है। यह वह किसान है जो खेती के नए तरीकों को ढूंढता है और संमूची दुनिया उसे अपनाती है। राष्ट्रीय पटल पर इसकी गुंज दूसरे प्रदेशों के किसानों की आत्महत्याओं और अपने प्रदेश की राजनीति के मकड़जाल में दब कर चूुप हो जाती है। कर्ज अदायगी के मामले में भी सूबे के किसानों ने सबको आईना दिखाया है। इन सब के बावजूद वह आज भी प्रेमचंद के उपन्यासों का नायक बना हुआ है। उसकी माली हालत आज भी वैसी ही है जो औपनिवेशिक काल के दौरान थी। अंतत: वह अपने जीवन की इहलीला समाप्त करता है। अधिकतर मामलों मे तो जीवन प्राकृतिक  आपदाओं की भेंट चढ़ जाता है। वह इतने कर्ज में डूब जाता है कि उससे उबरने के लिए आत्महत्या की बजाय शहर पलायन को तवज्जो देता है। हालांकि, गजेंद्र शहर नहीं जा पाया क्यूंकि उसे परिवार की फिक्र थी। वह, टीवी कैमरों के सामने नहीं बल्कि बंद कोठरी के अंधेरों में दम तोड़ता है। वह गुमनाम है। उसकी खबर अखबारों को मौत के 5 दिन बाद मिलती है। वह केवल स्थानीय पन्नों और क्षेत्रीय टीवी चैनलों पर स्थान बना पाता है।
यदि वास्तव में बिहार के किसानों और खेती को जानना है तो पहले गजेंद्र जैसे किसान की व्यथा को जानना होगा। वह सरकार को नहीं कोसता है बल्कि जीवनदाता को कोसता है। यदि वास्तव में बिहार के किसानों और खेती में प्रगती के अभिलाषी हैं तो सबसे पहले इन्हें मुख्यधारा में लाना होगा। बिहार के किसान लाईमलाईट में नहीं रहना चाहते हैं बल्कि उन्हें जागरुक करने की आवश्यकता है। सहनशीलता, परिश्रम और जुझारुपन से लबरेज किसानी ही नहीं बल्कि गुमनामी और बेरुखी की दंश झेल रही किसानी के रुप में भी वर्णित कीजिए बिहार के किसान को।

बुधवार, 11 मार्च 2015

विरोध किससे है?


दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र भारत में इन दिनों लोकतंत्र के मान्य आदर्शों को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चल रही इस बहस को बीबीसी द्वारा बनाई डाक्यूमेंट्री भारत की बेटीने एक नया आयाम दे दिया है। नई बहस इस बात को लेकर है कि क्या बीबीसी को निर्भया कांड के मुख्य आरोपियों में से एक मुकेश के साक्षात्कार को दिखाया जाना चाहिए या नहीं? दूसरी बहस इस बात को लेकर है कि बलात्कार के आरोपियों के वकील द्वारा कही गई बातें जायज हैं या नहीं?    

यदि हम लोकतंत्र के पैरोकार हो सकते हैं तो फिर किसी बलात्कारी को क्यूं नहीं सुन सकते हैं? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उसे भी है। यदि लोकतंत्र में भरोसा करते हैं तो फिर उस संस्थान बीबीसी को क्यूं भला- बूरा कह रहे हैं जिसने लोकतंत्र को उसके शिखर पर पहुंचाया। बीबीसी ने लोकतंत्र को किशोर से जवान बनते देखा है। दुनिया मानती है कि बीबसी ने लोकतंत्र के प्रसार और मजबूती के लिए एक स्तंभ की भूमिका निभाई है। बलात्कारी क्या सोचता है ये जानना उतना ही जरुरी है जितना कि उसका विरोध करना। असली बलात्कारी तो उसकी सोच ही है। जड़ तो अभी भी सांसे ले रहा है। सोच को मारना होगा। बलात्कारी तो खुद ही मर जाएगा। बीबीसी ने इसी सोच को दिखाया है जो अब तक जिंदा है।

इस बात को लेकर भी चर्चा हो रही है कि जब ये मामला अदालत के विचाराधीन है तब क्या इस डाक्यूमेंट्री को सार्वजनिक रुप से प्रसारित किया जाना चाहिए? डाक्यूमेंट्री में आरोपी पक्ष के वकील ने बलात्कार के कारणों और महिलाओं के संदर्भ में जो बाते कहीं हैं उसकी घोर निंदा की जानी चाहिए। भारतीय समाज की सोच वैसी नहीं है जो उस वकील ने साक्षात्कार में दर्शायी है।  वकील की दलील के मायने समझना जरुरी है। उसने ये बात आदालत के सामने कही होती तो समझा सकता था कि वह अपने पक्ष को बचाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे ये बात समझनी चाहिए थी कि वो एक प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय समाचार चैनल को साक्षात्कार दे रहा था। यदि एक भारतीय कानूनची जब इस प्रकार की बातें कर रहा हो तब पूरी दुनिया में भारत की छवि धूमिल होती है।

बलात्कार के एक आरोपी मुकेश की सोच को दुनिया के सामने लाया जाना जरुरी था। एक बलात्कारी क्या सोच कर इस तरह का घिनौना काम करता है, ये जानना जरुरी इसलिए है क्यूंकि हम बलात्कार के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। इसी सोच को तो खत्म करना है। साक्षात्कार के दौरान आरोपी को तनिक भी अपराधबोध नहीं होना हमारी अब तक की लड़ाई पर सवाल खड़े करता है। इसका सीधा मतलब है कि अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। हमे और भी मजबूती से लड़ने की जरुरत है।

ऐसा क्यूं होता है कि हम किसी को बस प्रतीक मानकर रह जाते हैं? उस पीड़िता को भारत की बेटी बनाकर हमने उसके लिए क्या किया है। उसे एक नया नाम दिया है, उसके नाम पर सरकारी फंड बनाया है और आने वाले दिनों में सरकारी योजनाएं चलाई जाएंगी। ये भी हो सकता है कि राष्ट्रपिता और राष्ट्रकवि के जैसे उसको भी इतिहास मानकर जयंती और पुण्यतिथि मनाने की प्रथा शुरु कर दें। हम लड़ किससे रहे हैं? नाम से या प्रतीकों से? यदि हमारी लड़ाई इनसे है तो फिर बलात्कार और बलात्कारी से लड़ने की बात महज ढोंग है।

लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार मिला है। बीबीसी सभी के लिए वो मंच मुहैया कराती है। दरअसल, बात केवल बीबीसी की ही नहीं है। हाल ही में मुम्बई के उर्दु दैनिक अवधनामा की संपादक शिरीन दलवी के खिलाफ फतवा जारी होना किस प्रकार की स्वतंत्रता को दर्शाता है? बीबीसी ने शिथिल और जड़ हो चूके आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की है। बहस, आरोपी बलात्कारी की सोच और उसके वकील की दलील पर होनी चाहिए। लोकतंत्र में विरोध करने की आजादी सभी के पास है।

 

रविवार, 8 मार्च 2015

"ना" के असर ...लप्रेक

हम दोनों के ना कहने में बड़ा फर्क है। कहने के भावों में, कारण में, आवाज की तीव्रता में, परिस्थितियों में और उसके बाद पड़ने वाले प्रभाव में बहुत अंतर है।
नहीं ऐसा नहीं है बाबू!! तुम्हें ऐसा क्यूं लगता है?? तुम क्या सोचते हो कि मैं बहाना करती हूं या तुमसे झूठ बोलती हूं। तुम्हारी कसम!!! मैं कभी तुमसे झूठ नहीं बोली।
अरे पागल!!!  मैनें कब कहा कि तुम मुझसे झूठ बोलती हो?? यदि ऐसा है तो फिर मैं भी तो कभी-कभी ना कहता हूं। तो क्या मैं तुमसे झूठ बोलता हूं?? मेरे कहने का मतलब ये नहीं था।
तो क्या मतलब है तुम्हारा??  यही कि मैं जानबूझ कर नाबोलती हूं?? तुम्हे मुझपर इतना सा भी भरोसा नहीं है!! तुम मुझे कभी समझ नहीं पाओगे। चाहे मैं कुछ भी कर लुं तुम्हारे लिए, तुम्हे हर बात में मेरी ही गलती नजर आएगी। तुम मुझे ही दोष दोगे।
चूप करो तुम अब। पूरी बात सुनती ही नहीं हो और बोलने लगती हो। साला, प्यार को फील करने में भी बड़ी मुसीबत है। जब भी थोड़े दार्शनिक खयाल आते हैं, तुम बिना मिमांसा किए कारण-प्रभाव तक पहुंच जाती हो। लगता है कि मिल, लॉक”  और अरस्तु से बहुल ज्यादा ही प्रभावित हो। अच्छा होता यदि प्लेटोऔऱ कांट”  द्वारा प्रतिपादित तत्वमिमांसा को भी जान लेती।
देखो!!! मुझे फिलॉस्फी मत पढ़ाओ। बहुत बोझिल विषय है। जो कहना है साफ-साफ कहो..सीधी बात..वैसे भी तुम्हे पता है ना कि आजकल दर्शन पढ़ना ही कौन चाहता है, सब शॉर्टकट के फेर में हैं। आजकल सब चीजों का शॉर्टकट भी हो गया है। मुझे भी यही पसंद है।
सही कह रही हो तुम। तुम अब शॉर्टकट में प्यार भी करने लगी हो। लेकिन एक बात याद रखना ये शॉर्टकट होता तो बड़ा सरल है पर इसकी कोई गारंटी नहीं है।

       देखो, तुम फिर से मुझे गलत ठहराने लगे। अरे मैनें तो बस यूं ही कह दिया था। मुझे प्यार में शॉर्टकट  नहीं  पसंद  है। मैं अपने प्यार को जीना चाहती हूं, महसूस करना चाहती हूं लम्बे वक्त तक। अब मुझे बताओ कि तुम क्या कहने वाले थे। वही नावाली बात। कब से फिजूल में लड़ रहे हैं हमलोग।
             
        जब मैं रात में फोन पर बात करते वक्त मैं तुमसे पूछता हूं कि , तुम्हे नींद लग रही है?  तब तुम कैसे  ना बोलते हो। जैसे लगता है कि अभी-अभी कोई परीक्षार्थी नींद से जगा है और पिता के पूछने पर तपाक से कहता हैं कि नहीं , मैं सोया ही कब था। जब मैं तुमसे किसी छूट्टी वाले दिन मिलने के लिए बाहर आने को कहता हूं तब तुम किस भाव से कहते हो कि नहीं बाबू, आज घर पर सभी लोग हैं, मैं कोई बहाना भी नहीं कर सकती। तुम मेरे घर की तरफ आ जाओं मैं तुम्हें कम से कम एक नजर  देख लूंगी। ऐसा लगता है जैसे खेल में हार जाने के बाद विरोधी खिलाड़ी को बधाई दे रही हो, क्यूंकि तुम्हारी आने की उतनी ही चाहत होती है जितनी की खेल में किसी भी तरह जीत जाने की। पर यहां विरोधी खिलाड़ी यानी तुम्हारे घर वालों की उपस्थिति बहुत बढ़िया खेल दिखा रही होती है। मैं इसी तरह कीना कहने की बात कर रहा था। मेरे पर इन दोनों नाअसर भी अलग-अलग होता है।
                

   हाहाहाहा, बाबू तुम भी ना!!!!  और अपनी बात नहीं करोगे , जब मैं तुमसे कहती हूं कि तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, खांसी भी है इसलिए तुम आराम करो कल मिल लेंगे और बात करेंगे। तब तुम फोन को तकिए से दबा के खांस लेते हो और फिर सांस को अंदर भर कर कहते हो किनहीं बाबू, मैं ठीक हूं और मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है। I am fit and ok.” तो ऐसा लगता है जैसे मरीज अपने परिजनों को ढ़ाढ़स बंधा रहा है और चिंता नहीं करने की सलाह देता है। मेरी स्थिति वैसी होती है जैसे परिजन सबकुछ जानते हुए भी थोड़ी देर के लिए खुश हो जाते हैं और फिर उपचार के बाकी इंतजामों का जुगाड़ उत्साह और जोश के साथ करने लगते हैं। लगता है कि मुझे कल तुमसे मिल कर खुद तुम्हे डॉक्टर के पास लेकर जाना चाहिए। और मैं कल की तैयारियों में लग जाती हूं।

      
    देख लिए, याद है ना तुम्हे। इसी इसी तरह ना, ना करते करते मुझे तुमसे प्यार भी हो गया था। मैं भी इसी ना के चक्कर में पता नहीं कितनी सिगरेट कि डिब्बियां फूंक डाली हैं। 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

मेरी कलम चलेगी

मेरी कलम चलेगी,
कलम के बांझपन पर
बीहड़ों में, खेतों की मेड़ों पर
पंचायत में, दुखती रगों के लिए
मड़ई में जल रही चिमनी के लिए
बधार में, बोझा के साथ लदे मजदूरों के लिए
प्राथमिक विद्दयालय में बोरे पर बैठे नौनिहालों के लिए
अस्पताल में जिंदा लाशों के लिए
समाज की रीतियों मे कैद दुर्गा के लिए
सरकार से तंग मूक बनी आवाज के लिए
मेरी कलम चलेगी,जहां
झिंगुर की आवाज सपनों का संगीत है
खेतों की दशा कल की दिशा है
मुखिया का चौपाल है
हक एक सवाल है
लालटेन की मध्यम रौशनी है
बिजली का इंतजार है
पेट में सर्वसुलभ वायू है
रोटी एक ही समय की बात है
मेरी कलम चलेगी, जहां
रास्ते आगवानी के लिए तरसते है
फसलें पानी की आस में हैं
अधिकारों से अनभिज्ञ इन्सान हैं
लकड़ी चुनते अबोध हैं
मड़ई और खप्पर जीवनस्तर बताते हैं
चुल्हे कई दिनों तक बिना जले रह जाते हैं
रीत अपनी धौंस जमाए है
साधु अपना असली चेहरा बताए है
मेरी कलम चलेगी जहां
नालियों में गलियां हैं
विद्दालयों का खस्ताहाल है
खेतों में किसान बेहाल है
सड़के जैसी तरणताल हैं
सरकार की हवा नहीं पहूंची है
संसद अब तक अन्जान है
पंचायत का खाप है
पुलिस के इरादे नापाक हैं
मेरी कलम चलेगी जहां
बेटीयां कैद हैं
औरत मौन है
समाज का ताना-बाना है
पुरुष शक्तिमान है
स्त्री का केवल शील है
रिशतों का नहीं कोई भान है
परिवार का दबाव है
आजादी का अभाव है
मेरी कलम चलेगी, जहां
दलित मुखौटा हैं
राजनीति एक खेल है
मंडल और कमंडल है
भुरा बाल है
जाति एक अभिशाप है
प्रेम के लिए घृणा है
राजा दुखिया है
सेवक शासक है....

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

धुंए का खेल

आजकल सिनेमा घरों में जाने पर फिल्म की शुरुआत होती है एक संदेश के साथ, जिसमें बताया जाता है कि सिगरेट, बीड़ी और अन्य ताम्बाकू पदार्थों का सेवन किस प्रकार से हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। उस विज्ञापन का निहितार्थ होता है ताम्बाकू पदार्थ( किसी भी रुप में) जानलेवा हैं। विज्ञापन के दौरान एक किशोर जो ताम्बाकू के अत्यधिक सेवन के कारण मुंह के कैंसर से ग्रस्त हो जाता है, वह कुछ कहता है, शायद अपनी उस लत और उससे जनीत परिणामों के बारे में  बता रहा होता है। लेकिन उसकी आवाज हमारे कानों तक सही से नहीं सुनाई पड़ती क्यूंकि सिनेमा देखने आए अन्य लोग बड़बडाते हैं। कुछ लोग तो गालियां भी देते हैं और हंसते है उस किशोर की दिखायी जाने वाली व्यथा पर। फिर बाद में विज्ञापन के दौरान सिगरेट पीने के नफे-नुकसान के बारे में बताया जाता है। फेपड़ों में बसे सिगरेट के तत्वों की तुलना टार से की जाती है। इस बात पर पीछे बैठे कुछ युवक खुब ठहाके लगाते हैं और अपना सीना तान कर दिखाने लगते हैं। कुछ लोग जो बहुत शिद्दत के साथ पैसे खर्च करके और अपना मुल्यवान समय लेकर आए होते हैं वो तो थियेटर स्टाफ के साथ-साथ इस नए चलन को कोसते हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि ये चलन अथवा प्रयोग कितना कारगर है, इस पर सोचने की जरुरत है। जिनको लक्ष्य मानकर विज्ञापन दिखाया जाता है वो कितनी गंभीरता से उन बातों को लेते हैं? जो संदेश  विज्ञापन में निहित है, क्या वो संदेश अपने सही रुप में लक्षितों तक पहुंच पाता है?  ये बात केवल सिनेमा घरों में दिखाए जाने वाले उस विज्ञापन की ही नहीं है बल्कि सिगरेट और अन्य ताम्बाकू उत्पाद अघिनियम 2003  के अन्य प्रावधानों की भी है। इस अधिनियम के तहत सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीने की मनाही, सिगरेट और अन्य ताम्बाकू उत्पादों के जहरीले परिणामों के प्रचार, 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के ताम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध एंव तांबाकू उत्पादों पर अनिवार्य रुप से स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी देने की बात कही गई है। सवाल यह है कि जिन उद्देश्यों के साथ इस अधिनियम को लाया गया था , क्या वे उद्देश्य सही मायनों में सार्थक हो रहे हैं?
 सिगरेट और अन्य ताम्बाकू पदार्थों के सेवन से होने वाले दुष्परिणामों के प्रचार का वास्तविक रुप तो हम सबके सामने आ ही गया है। अगर बात करे अन्य प्रावधानों की तो उनकी वास्तविकता भी धरातल पर आने में देर नहीं लगती है। जहां तक बात सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीने की मनाही की है तो यह कमोबेश केवल उस जागरुक समाज तक ही असरदार लगती है, जहां पीने वाले भी जागरुक हैं और वैसे लोग भी हैं जो इसके खिलाफ आवाज उठाने से हिचकिचाते नहीं है। अन्य जगहों की बात करें तो ये महज एक मजाक बन कर रह जाता है। आए दिन लोग मिल ही जाते हैं जो बड़े आराम से किसी बस स्टैंड पर, ट्रेनों में, रेलवे स्टेशनों पर और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट के धुएं का छल्ला बनाते दिख जाते हैं। वैसी ही हालत उस प्रावधान की भी है जिसमें 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति के तांबाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध की बात है। आप किसी रेलगाड़ी में , रेलवे स्टेशनों पर, छोटे शहरों या गावों की किसी गुमटी पर ऐसे बच्चों को तांबाकू उत्पाद बेचते पाएंगे जिनकी उम्र अभी स्कूल जाने की होती है। ताम्बाकू उत्पादों के पैकेटों पर स्वास्थ्य संबंधी अनिवार्य चेतावनी की बात तो बस कंपनियों की मजबूरी लगती है। खरीदारों और सेवन करने वालों से इसका सरोकार न के बराबर लगता है। इस प्रकार ये सारे प्रावधान जो सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम 2013तहत लाए गए हैं, अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल नजर आते हैं।
आखिर, ऐसे अधिनियम को लाने के बाद भी इसके उद्देश्य क्यूं अपनी प्रासंगिकता खो बैठे हैं?  अगर इस बात की तह में जाकर पड़ताल करें तो हम पाएंगे कि इस अधिनियम को लाना महज खानापूर्ति था। कुछ लोगों की मांग मान लेने, समाज को यह दिखाने की सरकार जागरुक है और तांबाकू उत्पाद कंपनियों का भरोसा जीतने के सिवा इसका बाकी कोई उद्देश्य प्रासंगिक नहीं नजर आता। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो भारत में दुनिया की 10 प्रतिशत सिगरेट और बीड़ी पीने वाली जनता रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक कम आय वाले लोग , ज्यादा आय वाले लोगों की अपेक्षा ज्यादा सिगरेट/बीड़ी पीते हैं। इस लिहाज से देखें तो सरकार को आबकारी शुल्क के रुप में मोटी रकम प्राप्त होती है। अगर ताम्बाकू उत्पाद पर लगने वाले करों की बात करें तो अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम है। भारत में सिगरेट पर लगने वाला कर खुदरा शुल्क का मात्र 38 प्रतिशत है। सिगरेट पर लगने वाला कर का यह दर विश्व बैंक द्वारा प्रस्तावित दर से काफी कम है। विश्व बैंक के अनुसार यह 65 से 80 प्रतिशत के बीच होना चाहिए। भारत में अधिकतर ताम्बाकू उत्पादक इकाइयां (99.8 प्रतिशत) जो कि सकल मुल्य का 30 प्रतिशत उत्पादन करती हैं, अनौपचारिक क्षेत्र में हैं। जिसमें कि बीड़ी उत्पादन करने वाली 99.8 प्रतिशत इकाइयां हैं जो कि सकल मुल्य मेँ 56 प्रतिशत की भागीदारी करती हैं। ये अनौपचारिक क्षेत्र करों के दायरे के बाहर आता है। भारत में बीड़ी पर लगने वाला कर का दर भी अपेक्षाकृत रुप से काफी कम है। औसतन बीड़ी का एक पैकेट 4 से 5 रुपये में मिल जाता है जिसपर कर का दर केवल 9 प्रतिशत ही है। सिगरेट और बीड़ी पर लगने वाला कर का दर काफी जटील है जो क्रमश: लम्बाइ और मशीनी उत्पादन  के आधार पर तय किया जाता है। भारत में सिगरेट और अन्य ताम्बाकू उत्पादों पर लगने वाला कर अथवा आबकारी शुल्क इतना कम क्यूं है, इस सवाल का जवाब सरकार ही बता पाएगी।

एक तरफ तो हम तांबाकू उत्पादों के बिक्री और सेवन से संबधित प्रावधान बनाते हैं ताकि इसके दुष्परिणामों की जानकारी प्रदान करते हुए सेवन करने वालों की संख्या कम करें अथवा लोगों को काल के ग्रास में जाने से बचाएं, वहीं दूसरी तरफ इन उत्पादों पर इतना कम कर लगाते हैं कि ये आम लोगों के लिए सस्ते हो जाते हैं। ज्यादा खपत से उत्पादन ज्यादा होगा और उत्पादन होने से सरकार के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी। एक अध्ययन के मुताबिक यह मानी हुई बात है कि ताम्बाकू का उपयोग कम करने का सबसे कारगर तरीका है , आबकारी शुल्क को इतना बढ़ा दिया जाए जिससे कि यह आम लोगों के लिए महंगा हो जाए। ऐसा करने से राजस्व भी उत्तरोतर रुप से बढ़ेगा। यदि सिगरेट और अन्य ताम्बाकू उत्पाद अधिनियम 2013 के प्रावधानों की बात करें तो वे तभी प्रासंगिक और सार्थक होंगे जब समाज उसके लिए समर्पित होकर उन्हें अपनाए। महज अधिनियम बना देने भर से ताम्बाकू और सिगरेट उत्पादों के सेवन में कमी नहीं आएगी। पुलिस, प्रशासन और आम जनता जब तक अपने कर्तव्यों की अहमियत नहीं समझेगी तब तक अधिनियम  सार्थक नहीं हो पाएगा। अन्यथा दूसरा उपाय ज्यादा कारगर है।

चेहरे

हर मोड़ पर मिलते हैं कुछ चेहरे,
कुछ मुरझाए से तो कुछ उमजाए हुए
कुछ लाजवंती से तो कुछ बेहया
कुछ अनमने से तो कुछ गमजदे से
कुछ तेज लिए तो कुछ खर खाए

हर मोड़ पर मिलते है कुछ चेहरे
एक चेहरे के पीछे दो चेहरे
उन चेहरे मे घुले सूुख-दुख
असमान भावों मे सजे हुए
एक-दुसरे को निहारते चेहरे

मुक बने चेहरे भी सवाल उठाते हैं,
खीज से भरे एक दूसरे को गलियाते हैं
सबकों आगे निकलने की जद होती है
इस कवायद की कोई नहीं हद होती है
फिर भी चेहरे गले लगाते हैं
कभी पास , तो कभी दिल में बसाने की कसम खाते हैं।

ऐसे भी चेहरे आते हैं
जो दिल मे बस जाते हैं
जो आंखों मे चुभ जाते हैं
कोई ताउम्र अपना रहता है
कोई पल भर में ठग लेता है

मुझे हर रोज मिलते हैं ये चेहरे
कभी अपने से लगते हैं तो कभी प्यार के काबिल
कभी दिल में उतर जाते हैं तो कभी अधरों का गुस्सा
हर चेहरा अपना रंगत दिखाता है
कभी संगत पर तरस आता है
कभी सौभाग्यवान होने का सुख दे जाता है।

                 ----नीरज प्रियदर्शी-----