एक अलग तरह की
राजनीति के उद्देश्य लिए देश की राजनीति में प्रवेश करने वाली आम आदमी पार्टी को
आखिरकार उसका वजूद हासिल हो गया। वजूद इसलिए क्यूंकि यदि आम आदमी पार्टी को इस बार
के दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस प्रकार की जीत नहीं मिलती तो शायद उसके आगे के
भविष्य पर सवालिया निशान लगने शुरु हो जाते। पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़
जाता। लेकिन आम आदमी पार्टी नें अपने वजूद के ढ़हने से बचा लिया। अपनी पिछली
गलतियों से सबक लेते हुए पार्टी ने अभुतपूर्व सफलता दर्ज की है। अब एक बात तो साफ
हो गया है कि भारत की राजनीति में एक अलग प्रयोग भी सफल हो सकता है। हलांकि ये एक
अलग प्रयोग है कि नहीं, इस बात पर बहस हो सकता है। पर भारतीय राजनीति की वर्षों
पुरानी व्यवस्था में एक ऐसे तत्व का समावेश हो गया है जो इसको बदलने का भी दंभ
भरता है। आम आदमी पार्टी की ये सफलता इसके उज्जवल भविष्य की परिचायक तो है पर साथ ही
साथ इसके वर्तमान पर भी शंकापूर्ण दृष्टिपात करती है।
दो वर्ष पहले जब आम
आदमी पार्टी की स्थापना हुई थी तब राजनीतिक चिंतक और विश्लेषक इसके बारे में बात
करना भी जरुरी नहीं समझते थे। हालांकि अन्ना हजारे का आंदोलन सफल था और उसने
तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था को हिला कर रख दिया था। राजनीतिक पंडित और
समाजशास्त्री इस बात पर जोर देने लगे थे कि भारत की राजनीति और भारत का समाज बदलाव
के दौर में है। अपने आखिरी दिनों में आंदोलन जब भरभराने लगा था तब एक एक करके इसके
सूत्रधार भी अलग होने लगे थे। ऐसे ही वक्त में अरविन्द केजरीवाल ने भी आंदोलन के
कुछ सहयोगियों को साथ लेकर एक राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान कर दिए। केजरीवाल के
इस ऐलान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मचनी तो शुरु हो गई थी पर सभी इसको हल्के
में ले रहे थे। इसकी सबसे खास वजह थी कि आंदोलन के मुखिया और एक खास सहयोगी ने
पार्टी में शामिल होने से इन्कार कर दिया था। बार-बार मनाने के बावजूद भी जब य
दोनो नहीं माने तो केजरीवाल ने इनकी परवाह किए बगैर पार्टी की नींव रख दी।
केजरीवाल के इस कदम पर आम जनता भी इन्हें मौकापरस्त, धोखेबाज और घमंडी मानने लगी।
अन्ना हजारे ने भी केजरीवाल के नियत पर सवाल खड़े करने शुरु कर दिए। पर केजरीवाल
के इरादों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अपने कुछ सहयोगियों के मदद से इन्होनें
पार्टी बनाई और राजनीति को बदलने के कथित उद्देश्य के साथ राजनीति में शामिल हो
गए। बकौल केजरीवाल ‘ बाहर रहते हुए हमने सारे प्रयास किए, अनशन से
लेकर धरने तक का एक लम्बा दौर चला पर आखिरकार हमें क्या हासिल हुआ। बार-बार हमारे
साथ धोखा हुआ। अब समय आ गया है कि व्यवस्था में परिवर्तन के लिए लिए खुद व्यवस्था
में शामिल होना पड़ेगा। अपने हक को पाने के लिए हम भीख नहीं मांग सकते‘।
यहीं से शुरु होता है आम आदमी पार्टी का सफर जो हिचकोले खाती आज इस मुकाम पर
है। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए पार्टी के नेता कुमार विश्वास कहते हैं, ‘ हम पर कोई ध्यान नहीं देता था, लोग
हमारा मखौल उड़ाते थे। लोगों ने हमें नाना प्रकार की संज्ञाएं भी दे रखी थी। हमारे
लिए सबसे कठिन चुनौती थी संगठन खड़ा करने की, और इस काम के लिए हमें वापस उन लोगो
से संबंध बनाना था जो अन्ना हजारे आंदोलन के साथ हमसे जुड़े थे। पार्टी के
प्रचार-प्रसार के लिए धन की भी आवश्यकता थी जिसके लिए हमें परंपरागत तरीका अपनाना
पड़ा और हमने लोगों से चंदे मांगे। एक बड़ा संगठन खड़ा करने और प्रचार प्रसार के
लिए हमने लोगों से अपील करनी शुरु की, और हमारा ये प्रयास सफल हुआ। अरविन्द
केजरीवाल के बारे में हो सकता है कि लोगो की तरह-तरह की अवधारणाएं हों पर किसी को
उनकी साफ छवि और नीयत पर संदेह नहीं था, और फिर लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया।
हमने सबसे पहले दिल्ली और फिर बाद में पूरे देश में अपना एक संगठन खड़ा कर लिया’। यदि अभी की स्थिति की बात करें
तो पार्टी सूत्रों के अनुसार हर राज्य में पार्टी की साखाएं हैं जो बुनायादी स्तर
पर काम भी कर रहीं हैं। संगठन विस्तार के बाद पार्टी ने 2013 के दिल्ली विधानसभा
चुनाव में पूरे दमखम के साथ लड़ी और 28 सीटें प्राप्त की। किसी ने भी ये विश्वास
नहीं किया था कि राजनीति के धुरंधरों के गढ़ में एक नया खिलाड़ी इस तरह से सबको
छकाते हुए गोल कर देगा। राजनैतिक गलियारों में हड़कंप मच गया और महारथियों के कान
खड़े हो गए। राजनीतिक पंडित और चिंतक जो अब तक इस पार्टी को नगण्य मानते थे, सोचने
पर विवश हो गए। अखबार और टीवी चैनल जो अपने सर्वे में अब तक इसके 7 से 8 सीटें
पाने की बात कर रहे थे, आम आदमी पार्टी की इस सफलता से अभिभूत होकर इसे जगह देने
लगे। याद कीजिए उस समय के अखबारों के संपादकीय पन्नों और टीवी चैनलों पर प्राइम
टाइम के बहसों को, हर तरफ आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल के ही चर्चे
थे। आश्चर्यजनक रुप से एक पार्टी जो एक
साल के दरम्यान ऐसी उपलब्धि हासिल कर लेती है जिसकी अभिलाषा में कितने दिग्गजों के
पसीनें छुट गए थे। कितने तो इसके चाह में आए और आकर चले भी गए। आम आदमी पार्टी की
ये जीत ऐतिसासिक तो थी ही लेकिन इसके साथ एक नए राजनैतिक दौर की शुरुआत भी थी।
सच में कहें तो आम आदमी पार्टी के राजनैतिक सफर में 2013 के दिल्ली विधानसभा
चुनाव मील का पत्थर साबित हुए थे। भारत के राजनीतिक पटल पर एक नए चेहरे का
अप्रत्याशित उभार हुआ था। लोकतंत्र को एक नई पहचान मिली थी। अब बारी थी आम आदमी
पार्टी को अपने किए वादों और इरादों को आजमाने की। हालांकि पार्टी को बहुमत हासिल
नहीं हुआ था और वो भाजपा के बाद दुसरे नम्बर की पार्टी थी। जनता की अपेक्षाओं और
मजबूरीयों को गिनाते हुए पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली। आलोचकों
को एक मौका मिला कि जो पार्टी एक नए राजनीति की बात करती है, वही परंपरागत तरीके
को अपनाते हुए सत्ता पर काबिज हो गई। केजरीवाल के लिए ये परीक्षा की घड़ी थी। आलोचकों
का मुंह बन्द करने के लिए उनहें शासन प्रक्रिया मे वैसे ही बदलावों को लाना था
जैसे वादे करके सत्ता पर काबिज हुए थे। केजरावाल ने इसकी अहमियत समझते हुए एक नई
व्यवस्था की शुरुआत की। बिजली, पानी, स्वास्थ्य और वितरण प्रणाली को सस्ता एंव
सुलभ करते हुए अपने चुनावी वादों को पूरा करने की दिशा में पहल करनी शुरु कर दी।
जनता दरबार का असफल आयोजन भी उन्हीं वादों का हिस्सा था। हालांकि बिजली-पानी के
सस्ता करने के मुद्दे पर अभी तक विपक्षी दलों और जानकार उनके प्रयासों पर सवाल
खड़े करते हैं। पर जो भी हो केजरीवाल की सरकार जनता को खुश करनें में कामयाब रही।
वैसे देखा जाए तो राम-राज्य में जनता की खुशी ही सर्वोपरी होती है। इस लिहाज से
केजरीवाल सफल हुए। सरकार में रहते हुए केजरीवाल और उनके मंत्रीमंडल की वीआईपी
सुरक्षा, मंहगी गाड़ीयां और सरकारी बंग्ला विवादों की सुर्खिया बने। वैसे ये बाते
अच्छे शासन के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं परंतु अपने वादों और अपनी बनी बनाई छवि
से उलट कोई भी चीज सवाल तो खड़ी करती ही है। ये विवाद ज्यादा दिनों तक तो नहीं चले
पर केजरीवाल के विरोधियों को एक मौका जरुर मिल गया। पहली बार ऐसा देखने को मिला कि
सड़क पर धरना करते हुए शासन चलाया जा रहा था। सड़क से शासन करने का केजरीवाल का
नारा चरितार्थ हो रहा था। हालांकि विवाद इस बात पर भी खड़ा हुआ, पर वाकयी में यह
एक नई राजनीति की दस्तक थी। अभी तक हमने देखा था कि बंद कमरों में न जाने किन
प्रक्रियाओं से गुजरते हुए फाइलें साइन होती थी, पर अब सब सड़क से हो रहा था। पहली
बार ऐसा अहसास हुआ था कि सुचारु शासन करना इतना पेचीदा नहीं है, बस इसके लिए
इच्छा-शक्ति की आवश्यकता होती है। ये सब तब हो रहा था जब आम आदमी के पार्टी के
कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर कानून ने ही शिकंजा कसना शुरु कर दिया था। दिल्ली
पुलिस की दर्ज एफआईआर को वापस लेने और कथित बदसलूकी के लिए माफी की मांग पर केजरी
सरकार राजभवन से निकलकर सड़क पर धरने के लिए बैठी थी।
अन्ना हजारे का आंदोलन हो या फिर आंदोलन से अलगाव का बहाना, केजरीवाल का मुख्य
चुनावी मुद्दा हो या फिर जनादेश की अपेक्षा, इस सबके जड़ में था जनलोकपाल।
केजरीवाल का सबसे बड़ा लक्ष्य भी जनलोकपाल ही था, लेकिन जनलोकपाल लाना इतना आसान
नहीं था। तत्कालीक व्यवस्था के अनुसार जनलोकपाल पास कराना असंभव था। इधर लोकसभा
चुनाव का बिगुल भी बज उठा था। केजरीवाल और आम आदमी पार्टी चर्चा से दूर होती जा
रही थी। हर तरफ मोदी और भारतीय जनता पार्टी के चुनावी प्रचार का शोर था। जाहिर है
मीड़िया के लिए मोदी और लोकसभा चुनाव ज्यादा महत्वपूर्ण थे। मोदी की प्रचार शैली
सब पर भारी पड़ रही थी। केजरीवाल और उनकी पार्टी के लिए ये कहीं ना कहीं घातक
साबित हो रहे थे । आखिरकार केजरीवाल हों या आम आदमी पार्टी का उभार ये सब तो
मीडिया की ही उपज थी। पर अब मीडिया मोदी और भारतीय जनता पार्टी को हवा दे रही थी।
केजरीवाल को ये सब नागवार गुजरा। उन्हें चर्चा में रहने की जो आदत पड़ी थी ये सब
उसके विपरीत हो रहा था। वैसे चर्चा में बने रहना कोई गलत बात नहीं है क्यूंकि
वर्तमान समय की ये मांग है। जहां तक बात जनलोकपाल की है, इसमे कोई संदेह नहीं है
कि इस विधेयक का लक्ष्य भ्रष्टाचार मुक्त शासन था। पर तत्कालीक व्यवस्था के
अंतर्गत विधेयक को पास कराना मुमकिन नहीं था। इसके लिए व्यवस्था और नियमावली में
बदलाव लाना पड़ता। यदि आप किसी व्यवस्था या नियमावली को बदलने की बात करते हैं तब
उसके लिए आपको उस व्यवस्था में शामिल रहते हुए प्रयास करना पड़ता है। ये प्रयास
लम्बा भी चल सकता है, सो इसके लिए धैर्य रखने की भी जरुरत होती है। आम आदमी पार्टी
की स्थापना भी इसी सिद्धान्त के साथ हुई थी। पर इस बार पार्टी ऐसा कर पाने में
असफल रही। लोकसभा चुनाव में उतरने की अति महत्वाकांक्षा से लबरेज होकर जनलोकपाल के
मुद्दे पर केजरीवाल की सरकार ने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देते समय सरकार का कहना
था कि उनका ये इस्तीफा जनलोकपाल बिल पास कराने में नाकाम रहने के कारण है। लेकिन
तत्कालिक परिस्थितियों का आकलन करने और केजरीवाल की महत्वाकांक्षा से वाकिफ होने
पर ये स्पष्ट हो जाता है कि जनलोकपाल ही केवल एक कारण नहीं था। दरअसल आम आदमी
पार्टी और केजरीवाल सरकार को केन्द्रीय सत्ता का मोह घेरे था। ये मोह था, लालच था
या फिर महत्वाकंक्षा था, पर इस्तीफे के पीछे सबसे बड़ा कारण था। बाद में ये बातें
जगजाहिर भी हो गईं जब आम आदमी पार्टी ने पूरे दमखम के साथ सबसे ज्यादा लोकसभा
सीटों पर चुनाव लड़ा।
लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की विफलता ने पार्टी को आत्ममंथन के लिए
मजबूर कर दिया। बाद में केजरीवाल ने इस्तीफे के संदर्भ में दिल्ली की जनता से माफी
भी मांगी। पार्टी के अन्य नेताओं ने भी लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटों पर लड़ने
की गलती को स्वीकार किया। पर माफी मांगने और गलती स्वीकार कर लेने भर से जनता के
मन में बैठी नकरात्मक छवि खत्म नहीं हो सकती थी। विरोधी भगोड़ा कहते तो पहले के
समर्थक धोखाधड़ी की बात करते। केजरीवाल का तिलिस्म अब धीरे- धीरे समाप्त होने लगा
था। आम आदमी पार्टी ने अब अपना आधार समर्थन खो दिया था। जो पार्टी पूरानी राजनीतिक
व्यवस्था के जगह नई राजनीति की बात करती थी, स्वयं पतन के दौर में आ गई थी। आम
जनता का विश्वास खो चुकी पार्टी के लिए वापस खड़ा होना बहुत मुश्किल प्रतीत हो रहा
था। मीड़िया ने किनारा कर लिया, विरोधी एकजुट होकर टूट पड़े और अपनों ने ही बगावत
कर दिया। मोदी लहर में केजरीवाल न जाने कहां गुम होने लगे थे। पार्टी एक बार फिर
से खड़ा होने की जुगत में लग गई। अपनी पिछली गलतियों से सबक लेते हुए पार्टी ने
स्थानीय स्तर पर काम करना शुरु किया। पून: संगठन को खड़ा करने के उद्देश्य से नए चेहरों को
पार्टी में स्थान दिया गया। अति महत्वाकांक्षा को तज कर पार्टी नें दिल्ली और उसकी
समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित किया। अपने पुराने तरीकों (पोल-खोल)
को अपनाते हुए पार्टी फिर से जनता का आकर्षण
पाने की कोशिश में लग गई। छोटी जनसभाओं के माध्यम से बेहतर तरीके से जनता से जुड़ी।
दिल्ली डायलॉग के माध्यम से जनता की समस्याओं और आकांक्षाओं को करीब से जानने में
सफल हुई। अपने नए लुभावने वादों के साथ पार्टी ने फिर से जनता के मन में जगह बनाने
में कामयाब हो गई। अरविन्द केजरीवाल की इमानदार छवि को एक बार फिर से पेश किया
गया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि केजरीवाल ने पतन के दौर में भी अपनी छवि को खराब
नहीं किया। चाहे लोग आम आदमी पार्टी से कितनी भी नफरत क्यूं न करें, केजरीवाल को
लेकर अभी तक कोई गलत धारणा नहीं बन पायी है। वैसे तो उनके विरोधियों ने उनपर ढेर सारे
सारे लांछन लगाएं, लेकिन केजरीवाल की इमानदार छवि प्रभावित नहीं हो पायी।
यदि आम आदमी पार्टी की कमियों और खुबियों पर बात करने बैठें तों बातों का कोई
अंत नहीं होगा। केजरीवाल के साथ-साथ आम आदमी पार्टी की कार्यप्रणाली पर ढेर सारे
सवाल खड़े होते हैं, मसलन, सरकार चलाते हुए धरने की राजनीति करना, बिजली-पानी
सस्ता करने के लिए सब्सिडी, नया करने के चक्कर में व्यवस्था के साथ खिलवाड़,
इत्यादि। राजनीति में वोटों के तुष्टीकरण से लेकर दलबदलू नेताओं को पार्टी में जगह
देना किसी भी प्रकार से नई प्रकार की राजनीति नहीं लगती है। अमर्यादित आचरण और असंसदीय
व्यवहार पर सवाल उठने लाजमी हैं। यदि आप राजनीति में स्वच्छता का दंभ भरते हैं तो
आपके हर एक आचरण और कार्य पर पैनी नजर रखी जाएगी। आपको सवालों से दो चार तो होना
ही पड़ेगा। बहरहाल, आम आदमी पार्टी ने एक करिश्मा कर दिखाया है। ऐसी जीत की उम्मीद
तो किसी ने नहीं की थी, खुद पार्टी के नेता भी ऐसी जीत पर अचंभित हैं। इसका मतलब
साफ है कि जनता का भरोसा अभी उनपर से डिगा नहीं है। ऐसे जनादेश को ध्यान में रखते
हुए केजरीवाल से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे पिछली गलतियों को दुहराएंगे नहीं।
प्रचंड मोदी लहर, बिहार की राजनीतिक उठापटक और जनता परिवार के साथ-साथ वामपंथी
पार्टी और तृणमुल के समर्थन देने की बात के बाद आम आदमी पार्टी की जीत ने भारत की राजनीति
में एक नयी बहस छेड़ दी है। इस जीत को देख कर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आने
वाले दिनों में भारत की राजनीति में आम आदमी पार्टी एक दमदार भूमिका निभाएगी।
राजनीतिक पंडित और चिंतक पहली बार आम आदमी पार्टी को ‘गेम चेंजर’ रुप
में देखने नगे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत की राजनीतिक व्यवस्था में
जमे जमाएं दिग्गजों के बीच दो साल पूरानी आम आदमी पार्टी अपना खूंटा गाड़ने में
सफल हो पाएगी? बहरहाल,
दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद एक बात तो तय है कि आम आदमी पार्टी को अपना खोया वजूद वापस
मिल गया है।