बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

मेरी कलम चलेगी

मेरी कलम चलेगी,
कलम के बांझपन पर
बीहड़ों में, खेतों की मेड़ों पर
पंचायत में, दुखती रगों के लिए
मड़ई में जल रही चिमनी के लिए
बधार में, बोझा के साथ लदे मजदूरों के लिए
प्राथमिक विद्दयालय में बोरे पर बैठे नौनिहालों के लिए
अस्पताल में जिंदा लाशों के लिए
समाज की रीतियों मे कैद दुर्गा के लिए
सरकार से तंग मूक बनी आवाज के लिए
मेरी कलम चलेगी,जहां
झिंगुर की आवाज सपनों का संगीत है
खेतों की दशा कल की दिशा है
मुखिया का चौपाल है
हक एक सवाल है
लालटेन की मध्यम रौशनी है
बिजली का इंतजार है
पेट में सर्वसुलभ वायू है
रोटी एक ही समय की बात है
मेरी कलम चलेगी, जहां
रास्ते आगवानी के लिए तरसते है
फसलें पानी की आस में हैं
अधिकारों से अनभिज्ञ इन्सान हैं
लकड़ी चुनते अबोध हैं
मड़ई और खप्पर जीवनस्तर बताते हैं
चुल्हे कई दिनों तक बिना जले रह जाते हैं
रीत अपनी धौंस जमाए है
साधु अपना असली चेहरा बताए है
मेरी कलम चलेगी जहां
नालियों में गलियां हैं
विद्दालयों का खस्ताहाल है
खेतों में किसान बेहाल है
सड़के जैसी तरणताल हैं
सरकार की हवा नहीं पहूंची है
संसद अब तक अन्जान है
पंचायत का खाप है
पुलिस के इरादे नापाक हैं
मेरी कलम चलेगी जहां
बेटीयां कैद हैं
औरत मौन है
समाज का ताना-बाना है
पुरुष शक्तिमान है
स्त्री का केवल शील है
रिशतों का नहीं कोई भान है
परिवार का दबाव है
आजादी का अभाव है
मेरी कलम चलेगी, जहां
दलित मुखौटा हैं
राजनीति एक खेल है
मंडल और कमंडल है
भुरा बाल है
जाति एक अभिशाप है
प्रेम के लिए घृणा है
राजा दुखिया है
सेवक शासक है....

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

धुंए का खेल

आजकल सिनेमा घरों में जाने पर फिल्म की शुरुआत होती है एक संदेश के साथ, जिसमें बताया जाता है कि सिगरेट, बीड़ी और अन्य ताम्बाकू पदार्थों का सेवन किस प्रकार से हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। उस विज्ञापन का निहितार्थ होता है ताम्बाकू पदार्थ( किसी भी रुप में) जानलेवा हैं। विज्ञापन के दौरान एक किशोर जो ताम्बाकू के अत्यधिक सेवन के कारण मुंह के कैंसर से ग्रस्त हो जाता है, वह कुछ कहता है, शायद अपनी उस लत और उससे जनीत परिणामों के बारे में  बता रहा होता है। लेकिन उसकी आवाज हमारे कानों तक सही से नहीं सुनाई पड़ती क्यूंकि सिनेमा देखने आए अन्य लोग बड़बडाते हैं। कुछ लोग तो गालियां भी देते हैं और हंसते है उस किशोर की दिखायी जाने वाली व्यथा पर। फिर बाद में विज्ञापन के दौरान सिगरेट पीने के नफे-नुकसान के बारे में बताया जाता है। फेपड़ों में बसे सिगरेट के तत्वों की तुलना टार से की जाती है। इस बात पर पीछे बैठे कुछ युवक खुब ठहाके लगाते हैं और अपना सीना तान कर दिखाने लगते हैं। कुछ लोग जो बहुत शिद्दत के साथ पैसे खर्च करके और अपना मुल्यवान समय लेकर आए होते हैं वो तो थियेटर स्टाफ के साथ-साथ इस नए चलन को कोसते हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि ये चलन अथवा प्रयोग कितना कारगर है, इस पर सोचने की जरुरत है। जिनको लक्ष्य मानकर विज्ञापन दिखाया जाता है वो कितनी गंभीरता से उन बातों को लेते हैं? जो संदेश  विज्ञापन में निहित है, क्या वो संदेश अपने सही रुप में लक्षितों तक पहुंच पाता है?  ये बात केवल सिनेमा घरों में दिखाए जाने वाले उस विज्ञापन की ही नहीं है बल्कि सिगरेट और अन्य ताम्बाकू उत्पाद अघिनियम 2003  के अन्य प्रावधानों की भी है। इस अधिनियम के तहत सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीने की मनाही, सिगरेट और अन्य ताम्बाकू उत्पादों के जहरीले परिणामों के प्रचार, 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के ताम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध एंव तांबाकू उत्पादों पर अनिवार्य रुप से स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी देने की बात कही गई है। सवाल यह है कि जिन उद्देश्यों के साथ इस अधिनियम को लाया गया था , क्या वे उद्देश्य सही मायनों में सार्थक हो रहे हैं?
 सिगरेट और अन्य ताम्बाकू पदार्थों के सेवन से होने वाले दुष्परिणामों के प्रचार का वास्तविक रुप तो हम सबके सामने आ ही गया है। अगर बात करे अन्य प्रावधानों की तो उनकी वास्तविकता भी धरातल पर आने में देर नहीं लगती है। जहां तक बात सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीने की मनाही की है तो यह कमोबेश केवल उस जागरुक समाज तक ही असरदार लगती है, जहां पीने वाले भी जागरुक हैं और वैसे लोग भी हैं जो इसके खिलाफ आवाज उठाने से हिचकिचाते नहीं है। अन्य जगहों की बात करें तो ये महज एक मजाक बन कर रह जाता है। आए दिन लोग मिल ही जाते हैं जो बड़े आराम से किसी बस स्टैंड पर, ट्रेनों में, रेलवे स्टेशनों पर और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट के धुएं का छल्ला बनाते दिख जाते हैं। वैसी ही हालत उस प्रावधान की भी है जिसमें 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति के तांबाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध की बात है। आप किसी रेलगाड़ी में , रेलवे स्टेशनों पर, छोटे शहरों या गावों की किसी गुमटी पर ऐसे बच्चों को तांबाकू उत्पाद बेचते पाएंगे जिनकी उम्र अभी स्कूल जाने की होती है। ताम्बाकू उत्पादों के पैकेटों पर स्वास्थ्य संबंधी अनिवार्य चेतावनी की बात तो बस कंपनियों की मजबूरी लगती है। खरीदारों और सेवन करने वालों से इसका सरोकार न के बराबर लगता है। इस प्रकार ये सारे प्रावधान जो सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम 2013तहत लाए गए हैं, अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल नजर आते हैं।
आखिर, ऐसे अधिनियम को लाने के बाद भी इसके उद्देश्य क्यूं अपनी प्रासंगिकता खो बैठे हैं?  अगर इस बात की तह में जाकर पड़ताल करें तो हम पाएंगे कि इस अधिनियम को लाना महज खानापूर्ति था। कुछ लोगों की मांग मान लेने, समाज को यह दिखाने की सरकार जागरुक है और तांबाकू उत्पाद कंपनियों का भरोसा जीतने के सिवा इसका बाकी कोई उद्देश्य प्रासंगिक नहीं नजर आता। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो भारत में दुनिया की 10 प्रतिशत सिगरेट और बीड़ी पीने वाली जनता रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक कम आय वाले लोग , ज्यादा आय वाले लोगों की अपेक्षा ज्यादा सिगरेट/बीड़ी पीते हैं। इस लिहाज से देखें तो सरकार को आबकारी शुल्क के रुप में मोटी रकम प्राप्त होती है। अगर ताम्बाकू उत्पाद पर लगने वाले करों की बात करें तो अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम है। भारत में सिगरेट पर लगने वाला कर खुदरा शुल्क का मात्र 38 प्रतिशत है। सिगरेट पर लगने वाला कर का यह दर विश्व बैंक द्वारा प्रस्तावित दर से काफी कम है। विश्व बैंक के अनुसार यह 65 से 80 प्रतिशत के बीच होना चाहिए। भारत में अधिकतर ताम्बाकू उत्पादक इकाइयां (99.8 प्रतिशत) जो कि सकल मुल्य का 30 प्रतिशत उत्पादन करती हैं, अनौपचारिक क्षेत्र में हैं। जिसमें कि बीड़ी उत्पादन करने वाली 99.8 प्रतिशत इकाइयां हैं जो कि सकल मुल्य मेँ 56 प्रतिशत की भागीदारी करती हैं। ये अनौपचारिक क्षेत्र करों के दायरे के बाहर आता है। भारत में बीड़ी पर लगने वाला कर का दर भी अपेक्षाकृत रुप से काफी कम है। औसतन बीड़ी का एक पैकेट 4 से 5 रुपये में मिल जाता है जिसपर कर का दर केवल 9 प्रतिशत ही है। सिगरेट और बीड़ी पर लगने वाला कर का दर काफी जटील है जो क्रमश: लम्बाइ और मशीनी उत्पादन  के आधार पर तय किया जाता है। भारत में सिगरेट और अन्य ताम्बाकू उत्पादों पर लगने वाला कर अथवा आबकारी शुल्क इतना कम क्यूं है, इस सवाल का जवाब सरकार ही बता पाएगी।

एक तरफ तो हम तांबाकू उत्पादों के बिक्री और सेवन से संबधित प्रावधान बनाते हैं ताकि इसके दुष्परिणामों की जानकारी प्रदान करते हुए सेवन करने वालों की संख्या कम करें अथवा लोगों को काल के ग्रास में जाने से बचाएं, वहीं दूसरी तरफ इन उत्पादों पर इतना कम कर लगाते हैं कि ये आम लोगों के लिए सस्ते हो जाते हैं। ज्यादा खपत से उत्पादन ज्यादा होगा और उत्पादन होने से सरकार के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी। एक अध्ययन के मुताबिक यह मानी हुई बात है कि ताम्बाकू का उपयोग कम करने का सबसे कारगर तरीका है , आबकारी शुल्क को इतना बढ़ा दिया जाए जिससे कि यह आम लोगों के लिए महंगा हो जाए। ऐसा करने से राजस्व भी उत्तरोतर रुप से बढ़ेगा। यदि सिगरेट और अन्य ताम्बाकू उत्पाद अधिनियम 2013 के प्रावधानों की बात करें तो वे तभी प्रासंगिक और सार्थक होंगे जब समाज उसके लिए समर्पित होकर उन्हें अपनाए। महज अधिनियम बना देने भर से ताम्बाकू और सिगरेट उत्पादों के सेवन में कमी नहीं आएगी। पुलिस, प्रशासन और आम जनता जब तक अपने कर्तव्यों की अहमियत नहीं समझेगी तब तक अधिनियम  सार्थक नहीं हो पाएगा। अन्यथा दूसरा उपाय ज्यादा कारगर है।

चेहरे

हर मोड़ पर मिलते हैं कुछ चेहरे,
कुछ मुरझाए से तो कुछ उमजाए हुए
कुछ लाजवंती से तो कुछ बेहया
कुछ अनमने से तो कुछ गमजदे से
कुछ तेज लिए तो कुछ खर खाए

हर मोड़ पर मिलते है कुछ चेहरे
एक चेहरे के पीछे दो चेहरे
उन चेहरे मे घुले सूुख-दुख
असमान भावों मे सजे हुए
एक-दुसरे को निहारते चेहरे

मुक बने चेहरे भी सवाल उठाते हैं,
खीज से भरे एक दूसरे को गलियाते हैं
सबकों आगे निकलने की जद होती है
इस कवायद की कोई नहीं हद होती है
फिर भी चेहरे गले लगाते हैं
कभी पास , तो कभी दिल में बसाने की कसम खाते हैं।

ऐसे भी चेहरे आते हैं
जो दिल मे बस जाते हैं
जो आंखों मे चुभ जाते हैं
कोई ताउम्र अपना रहता है
कोई पल भर में ठग लेता है

मुझे हर रोज मिलते हैं ये चेहरे
कभी अपने से लगते हैं तो कभी प्यार के काबिल
कभी दिल में उतर जाते हैं तो कभी अधरों का गुस्सा
हर चेहरा अपना रंगत दिखाता है
कभी संगत पर तरस आता है
कभी सौभाग्यवान होने का सुख दे जाता है।

                 ----नीरज प्रियदर्शी-----

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

वजूद की जीत

                     एक अलग तरह की राजनीति के उद्देश्य लिए देश की राजनीति में प्रवेश करने वाली आम आदमी पार्टी को आखिरकार उसका वजूद हासिल हो गया। वजूद इसलिए क्यूंकि यदि आम आदमी पार्टी को इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस प्रकार की जीत नहीं मिलती तो शायद उसके आगे के भविष्य पर सवालिया निशान लगने शुरु हो जाते। पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता। लेकिन आम आदमी पार्टी नें अपने वजूद के ढ़हने से बचा लिया। अपनी पिछली गलतियों से सबक लेते हुए पार्टी ने अभुतपूर्व सफलता दर्ज की है। अब एक बात तो साफ हो गया है कि भारत की राजनीति में एक अलग प्रयोग भी सफल हो सकता है। हलांकि ये एक अलग प्रयोग है कि नहीं, इस बात पर बहस हो सकता है। पर भारतीय राजनीति की वर्षों पुरानी व्यवस्था में एक ऐसे तत्व का समावेश हो गया है जो इसको बदलने का भी दंभ भरता है। आम आदमी पार्टी की ये सफलता इसके उज्जवल भविष्य की परिचायक तो है पर साथ ही साथ इसके वर्तमान पर भी शंकापूर्ण दृष्टिपात करती है।

                     दो वर्ष पहले जब आम आदमी पार्टी की स्थापना हुई थी तब राजनीतिक चिंतक और विश्लेषक इसके बारे में बात करना भी जरुरी नहीं समझते थे। हालांकि अन्ना हजारे का आंदोलन सफल था और उसने तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था को हिला कर रख दिया था। राजनीतिक पंडित और समाजशास्त्री इस बात पर जोर देने लगे थे कि भारत की राजनीति और भारत का समाज बदलाव के दौर में है। अपने आखिरी दिनों में आंदोलन जब भरभराने लगा था तब एक एक करके इसके सूत्रधार भी अलग होने लगे थे। ऐसे ही वक्त में अरविन्द केजरीवाल ने भी आंदोलन के कुछ सहयोगियों को साथ लेकर एक राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान कर दिए। केजरीवाल के इस ऐलान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मचनी तो शुरु हो गई थी पर सभी इसको हल्के में ले रहे थे। इसकी सबसे खास वजह थी कि आंदोलन के मुखिया और एक खास सहयोगी ने पार्टी में शामिल होने से इन्कार कर दिया था। बार-बार मनाने के बावजूद भी जब य दोनो नहीं माने तो केजरीवाल ने इनकी परवाह किए बगैर पार्टी की नींव रख दी। केजरीवाल के इस कदम पर आम जनता भी इन्हें मौकापरस्त, धोखेबाज और घमंडी मानने लगी। अन्ना हजारे ने भी केजरीवाल के नियत पर सवाल खड़े करने शुरु कर दिए। पर केजरीवाल के इरादों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अपने कुछ सहयोगियों के मदद से इन्होनें पार्टी बनाई और राजनीति को बदलने के कथित उद्देश्य के साथ राजनीति में शामिल हो गए। बकौल केजरीवाल  बाहर रहते हुए हमने सारे प्रयास किए, अनशन से लेकर धरने तक का एक लम्बा दौर चला पर आखिरकार हमें क्या हासिल हुआ। बार-बार हमारे साथ धोखा हुआ। अब समय आ गया है कि व्यवस्था में परिवर्तन के लिए लिए खुद व्यवस्था में शामिल होना पड़ेगा। अपने हक को पाने के लिए हम भीख नहीं मांग सकते
      
             यहीं से शुरु होता है आम आदमी पार्टी का सफर जो हिचकोले खाती आज इस मुकाम पर है। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए पार्टी के नेता कुमार विश्वास कहते हैं, हम पर कोई ध्यान नहीं देता था, लोग हमारा मखौल उड़ाते थे। लोगों ने हमें नाना प्रकार की संज्ञाएं भी दे रखी थी। हमारे लिए सबसे कठिन चुनौती थी संगठन खड़ा करने की, और इस काम के लिए हमें वापस उन लोगो से संबंध बनाना था जो अन्ना हजारे आंदोलन के साथ हमसे जुड़े थे। पार्टी के प्रचार-प्रसार के लिए धन की भी आवश्यकता थी जिसके लिए हमें परंपरागत तरीका अपनाना पड़ा और हमने लोगों से चंदे मांगे। एक बड़ा संगठन खड़ा करने और प्रचार प्रसार के लिए हमने लोगों से अपील करनी शुरु की, और हमारा ये प्रयास सफल हुआ। अरविन्द केजरीवाल के बारे में हो सकता है कि लोगो की तरह-तरह की अवधारणाएं हों पर किसी को उनकी साफ छवि और नीयत पर संदेह नहीं था, और फिर लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया। हमने सबसे पहले दिल्ली और फिर बाद में पूरे देश में अपना एक संगठन खड़ा कर लिया। यदि अभी की स्थिति की बात करें तो पार्टी सूत्रों के अनुसार हर राज्य में पार्टी की साखाएं हैं जो बुनायादी स्तर पर काम भी कर रहीं हैं। संगठन विस्तार के बाद पार्टी ने 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पूरे दमखम के साथ लड़ी और 28 सीटें प्राप्त की। किसी ने भी ये विश्वास नहीं किया था कि राजनीति के धुरंधरों के गढ़ में एक नया खिलाड़ी इस तरह से सबको छकाते हुए गोल कर देगा। राजनैतिक गलियारों में हड़कंप मच गया और महारथियों के कान खड़े हो गए। राजनीतिक पंडित और चिंतक जो अब तक इस पार्टी को नगण्य मानते थे, सोचने पर विवश हो गए। अखबार और टीवी चैनल जो अपने सर्वे में अब तक इसके 7 से 8 सीटें पाने की बात कर रहे थे, आम आदमी पार्टी की इस सफलता से अभिभूत होकर इसे जगह देने लगे। याद कीजिए उस समय के अखबारों के संपादकीय पन्नों और टीवी चैनलों पर प्राइम टाइम के बहसों को, हर तरफ आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल के ही चर्चे थे।  आश्चर्यजनक रुप से एक पार्टी जो एक साल के दरम्यान ऐसी उपलब्धि हासिल कर लेती है जिसकी अभिलाषा में कितने दिग्गजों के पसीनें छुट गए थे। कितने तो इसके चाह में आए और आकर चले भी गए। आम आदमी पार्टी की ये जीत ऐतिसासिक तो थी ही लेकिन इसके साथ एक नए राजनैतिक दौर की शुरुआत भी थी।
              
               सच में कहें तो आम आदमी पार्टी के राजनैतिक सफर में 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव मील का पत्थर साबित हुए थे। भारत के राजनीतिक पटल पर एक नए चेहरे का अप्रत्याशित उभार हुआ था। लोकतंत्र को एक नई पहचान मिली थी। अब बारी थी आम आदमी पार्टी को अपने किए वादों और इरादों को आजमाने की। हालांकि पार्टी को बहुमत हासिल नहीं हुआ था और वो भाजपा के बाद दुसरे नम्बर की पार्टी थी। जनता की अपेक्षाओं और मजबूरीयों को गिनाते हुए पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली। आलोचकों को एक मौका मिला कि जो पार्टी एक नए राजनीति की बात करती है, वही परंपरागत तरीके को अपनाते हुए सत्ता पर काबिज हो गई। केजरीवाल के लिए ये परीक्षा की घड़ी थी। आलोचकों का मुंह बन्द करने के लिए उनहें शासन प्रक्रिया मे वैसे ही बदलावों को लाना था जैसे वादे करके सत्ता पर काबिज हुए थे। केजरावाल ने इसकी अहमियत समझते हुए एक नई व्यवस्था की शुरुआत की। बिजली, पानी, स्वास्थ्य और वितरण प्रणाली को सस्ता एंव सुलभ करते हुए अपने चुनावी वादों को पूरा करने की दिशा में पहल करनी शुरु कर दी। जनता दरबार का असफल आयोजन भी उन्हीं वादों का हिस्सा था। हालांकि बिजली-पानी के सस्ता करने के मुद्दे पर अभी तक विपक्षी दलों और जानकार उनके प्रयासों पर सवाल खड़े करते हैं। पर जो भी हो केजरीवाल की सरकार जनता को खुश करनें में कामयाब रही। वैसे देखा जाए तो राम-राज्य में जनता की खुशी ही सर्वोपरी होती है। इस लिहाज से केजरीवाल सफल हुए। सरकार में रहते हुए केजरीवाल और उनके मंत्रीमंडल की वीआईपी सुरक्षा, मंहगी गाड़ीयां और सरकारी बंग्ला विवादों की सुर्खिया बने। वैसे ये बाते अच्छे शासन के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं परंतु अपने वादों और अपनी बनी बनाई छवि से उलट कोई भी चीज सवाल तो खड़ी करती ही है। ये विवाद ज्यादा दिनों तक तो नहीं चले पर केजरीवाल के विरोधियों को एक मौका जरुर मिल गया। पहली बार ऐसा देखने को मिला कि सड़क पर धरना करते हुए शासन चलाया जा रहा था। सड़क से शासन करने का केजरीवाल का नारा चरितार्थ हो रहा था। हालांकि विवाद इस बात पर भी खड़ा हुआ, पर वाकयी में यह एक नई राजनीति की दस्तक थी। अभी तक हमने देखा था कि बंद कमरों में न जाने किन प्रक्रियाओं से गुजरते हुए फाइलें साइन होती थी, पर अब सब सड़क से हो रहा था। पहली बार ऐसा अहसास हुआ था कि सुचारु शासन करना इतना पेचीदा नहीं है, बस इसके लिए इच्छा-शक्ति की आवश्यकता होती है। ये सब तब हो रहा था जब आम आदमी के पार्टी के कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर कानून ने ही शिकंजा कसना शुरु कर दिया था। दिल्ली पुलिस की दर्ज एफआईआर को वापस लेने और कथित बदसलूकी के लिए माफी की मांग पर केजरी सरकार राजभवन से निकलकर सड़क पर धरने के लिए बैठी थी।

                  अन्ना हजारे का आंदोलन हो या फिर आंदोलन से अलगाव का बहाना, केजरीवाल का मुख्य चुनावी मुद्दा हो या फिर जनादेश की अपेक्षा, इस सबके जड़ में था जनलोकपाल। केजरीवाल का सबसे बड़ा लक्ष्य भी जनलोकपाल ही था, लेकिन जनलोकपाल लाना इतना आसान नहीं था। तत्कालीक व्यवस्था के अनुसार जनलोकपाल पास कराना असंभव था। इधर लोकसभा चुनाव का बिगुल भी बज उठा था। केजरीवाल और आम आदमी पार्टी चर्चा से दूर होती जा रही थी। हर तरफ मोदी और भारतीय जनता पार्टी के चुनावी प्रचार का शोर था। जाहिर है मीड़िया के लिए मोदी और लोकसभा चुनाव ज्यादा महत्वपूर्ण थे। मोदी की प्रचार शैली सब पर भारी पड़ रही थी। केजरीवाल और उनकी पार्टी के लिए ये कहीं ना कहीं घातक साबित हो रहे थे । आखिरकार केजरीवाल हों या आम आदमी पार्टी का उभार ये सब तो मीडिया की ही उपज थी। पर अब मीडिया मोदी और भारतीय जनता पार्टी को हवा दे रही थी। केजरीवाल को ये सब नागवार गुजरा। उन्हें चर्चा में रहने की जो आदत पड़ी थी ये सब उसके विपरीत हो रहा था। वैसे चर्चा में बने रहना कोई गलत बात नहीं है क्यूंकि वर्तमान समय की ये मांग है। जहां तक बात जनलोकपाल की है, इसमे कोई संदेह नहीं है कि इस विधेयक का लक्ष्य भ्रष्टाचार मुक्त शासन था। पर तत्कालीक व्यवस्था के अंतर्गत विधेयक को पास कराना मुमकिन नहीं था। इसके लिए व्यवस्था और नियमावली में बदलाव लाना पड़ता। यदि आप किसी व्यवस्था या नियमावली को बदलने की बात करते हैं तब उसके लिए आपको उस व्यवस्था में शामिल रहते हुए प्रयास करना पड़ता है। ये प्रयास लम्बा भी चल सकता है, सो इसके लिए धैर्य रखने की भी जरुरत होती है। आम आदमी पार्टी की स्थापना भी इसी सिद्धान्त के साथ हुई थी। पर इस बार पार्टी ऐसा कर पाने में असफल रही। लोकसभा चुनाव में उतरने की अति महत्वाकांक्षा से लबरेज होकर जनलोकपाल के मुद्दे पर केजरीवाल की सरकार ने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देते समय सरकार का कहना था कि उनका ये इस्तीफा जनलोकपाल बिल पास कराने में नाकाम रहने के कारण है। लेकिन तत्कालिक परिस्थितियों का आकलन करने और केजरीवाल की महत्वाकांक्षा से वाकिफ होने पर ये स्पष्ट हो जाता है कि जनलोकपाल ही केवल एक कारण नहीं था। दरअसल आम आदमी पार्टी और केजरीवाल सरकार को केन्द्रीय सत्ता का मोह घेरे था। ये मोह था, लालच था या फिर महत्वाकंक्षा था, पर इस्तीफे के पीछे सबसे बड़ा कारण था। बाद में ये बातें जगजाहिर भी हो गईं जब आम आदमी पार्टी ने पूरे दमखम के साथ सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा।

                     लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की विफलता ने पार्टी को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया। बाद में केजरीवाल ने इस्तीफे के संदर्भ में दिल्ली की जनता से माफी भी मांगी। पार्टी के अन्य नेताओं ने भी लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटों पर लड़ने की गलती को स्वीकार किया। पर माफी मांगने और गलती स्वीकार कर लेने भर से जनता के मन में बैठी नकरात्मक छवि खत्म नहीं हो सकती थी। विरोधी भगोड़ा कहते तो पहले के समर्थक धोखाधड़ी की बात करते। केजरीवाल का तिलिस्म अब धीरे- धीरे समाप्त होने लगा था। आम आदमी पार्टी ने अब अपना आधार समर्थन खो दिया था। जो पार्टी पूरानी राजनीतिक व्यवस्था के जगह नई राजनीति की बात करती थी, स्वयं पतन के दौर में आ गई थी। आम जनता का विश्वास खो चुकी पार्टी के लिए वापस खड़ा होना बहुत मुश्किल प्रतीत हो रहा था। मीड़िया ने किनारा कर लिया, विरोधी एकजुट होकर टूट पड़े और अपनों ने ही बगावत कर दिया। मोदी लहर में केजरीवाल न जाने कहां गुम होने लगे थे। पार्टी एक बार फिर से खड़ा होने की जुगत में लग गई। अपनी पिछली गलतियों से सबक लेते हुए पार्टी ने स्थानीय स्तर पर काम करना शुरु किया। पून: संगठन को खड़ा करने के उद्देश्य से नए चेहरों को पार्टी में स्थान दिया गया। अति महत्वाकांक्षा को तज कर पार्टी नें दिल्ली और उसकी समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित किया। अपने पुराने तरीकों (पोल-खोल) को अपनाते हुए पार्टी  फिर से जनता का आकर्षण पाने की कोशिश में लग गई। छोटी जनसभाओं के माध्यम से बेहतर तरीके से जनता से जुड़ी। दिल्ली डायलॉग के माध्यम से जनता की समस्याओं और आकांक्षाओं को करीब से जानने में सफल हुई। अपने नए लुभावने वादों के साथ पार्टी ने फिर से जनता के मन में जगह बनाने में कामयाब हो गई। अरविन्द केजरीवाल की इमानदार छवि को एक बार फिर से पेश किया गया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि केजरीवाल ने पतन के दौर में भी अपनी छवि को खराब नहीं किया। चाहे लोग आम आदमी पार्टी से कितनी भी नफरत क्यूं न करें, केजरीवाल को लेकर अभी तक कोई गलत धारणा नहीं बन पायी है। वैसे तो उनके विरोधियों ने उनपर ढेर सारे सारे लांछन लगाएं, लेकिन केजरीवाल की इमानदार छवि प्रभावित नहीं हो पायी।       

                यदि आम आदमी पार्टी की कमियों और खुबियों पर बात करने बैठें तों बातों का कोई अंत नहीं होगा। केजरीवाल के साथ-साथ आम आदमी पार्टी की कार्यप्रणाली पर ढेर सारे सवाल खड़े होते हैं, मसलन, सरकार चलाते हुए धरने की राजनीति करना, बिजली-पानी सस्ता करने के लिए सब्सिडी, नया करने के चक्कर में व्यवस्था के साथ खिलवाड़, इत्यादि। राजनीति में वोटों के तुष्टीकरण से लेकर दलबदलू नेताओं को पार्टी में जगह देना किसी भी प्रकार से नई प्रकार की राजनीति नहीं लगती है। अमर्यादित आचरण और असंसदीय व्यवहार पर सवाल उठने लाजमी हैं। यदि आप राजनीति में स्वच्छता का दंभ भरते हैं तो आपके हर एक आचरण और कार्य पर पैनी नजर रखी जाएगी। आपको सवालों से दो चार तो होना ही पड़ेगा। बहरहाल, आम आदमी पार्टी ने एक करिश्मा कर दिखाया है। ऐसी जीत की उम्मीद तो किसी ने नहीं की थी, खुद पार्टी के नेता भी ऐसी जीत पर अचंभित हैं। इसका मतलब साफ है कि जनता का भरोसा अभी उनपर से डिगा नहीं है। ऐसे जनादेश को ध्यान में रखते हुए केजरीवाल से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे पिछली गलतियों को दुहराएंगे नहीं। प्रचंड मोदी लहर, बिहार की राजनीतिक उठापटक और जनता परिवार के साथ-साथ वामपंथी पार्टी और तृणमुल के समर्थन देने की बात के बाद आम आदमी पार्टी की जीत ने भारत की राजनीति में एक नयी बहस छेड़ दी है। इस जीत को देख कर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले दिनों में भारत की राजनीति में आम आदमी पार्टी एक दमदार भूमिका निभाएगी। राजनीतिक पंडित और चिंतक पहली बार आम आदमी पार्टी को गेम चेंजररुप में देखने नगे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत की राजनीतिक व्यवस्था में जमे जमाएं दिग्गजों के बीच दो साल पूरानी आम आदमी पार्टी अपना खूंटा गाड़ने में सफल हो पाएगी?  बहरहाल, दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद एक बात तो तय है कि आम आदमी पार्टी को अपना खोया वजूद वापस मिल गया है।



बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

मर्यादा का खयाल

चुनाव प्रचार में राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग और एक दूसरे के उपर कीचड़ उछालने की बात नई नहीं है। प्रचार के दौरान रैलियों और सभाओं में मतदाताओं को लुभाने के लिए एक दुसरे के उपर आक्षेप लगाए जाते हैं। दलबदल राजनीतिक व्यवस्था के इस दौर में भी चुनाव के समय नेताओं को इस बात का भान नहीं रहता है कि वे जिस दल या नेता के उपर जुबानी हमले कर रहे हैं, चुनाव परिणाम के बाद उन्हें उनकी जरुरत भी पड़ सकती है। ऐसा अक्सर होता है कि चुनाव परिणाम के बाद दो धूर विरोधी भी गठबंधन के माध्यम से एक हो जाते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान भी नेताओं के बीच जुबानी जंग देखने को मिल रही है।
       वैसे तो चुनाव प्रचार में नेताओं के बीच बातों का तकरार आम बात  है पर जब ऐसे जुबानी हमले किसी खास वर्ग, जाती, नस्ल को ध्यान में रखकर किए जाते हैं तब सवाल उठने लाजिमी हैं। हालिया चुनावों में या फिर दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में सियासी मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भी कसौटी पर है। यह चुनाव घोर आपत्तिजनक, अमर्यादित और गाली-गलौच के स्तर तक उतर आई टिप्पणियों के लिए भी याद रखा जाएगा। सत्ता की जंग में कूदे नेताओं की जुबान जानबूझकर फिसल रही है और दिल्ली में सरकार चलाने का ख्वाब देख रही पार्टियों के नेता ऐसी भाषा बोल रहे हैं जिसे सुनकर अनपढ़-गंवार भी शरमा जाए
      चुनाव प्रचार के शुरुआती दिनों में जब भाजपा सांसद साध्वी निरंजना ज्योति दिल्ली की सड़कों पर उतरीं तो उन्होंने 'रामजादों की सरकार और हरामजादों की सरकार' वाली ऐसी टिप्पणी की जिसकी धमक संसद भवन तक सुनाई पड़ी। भाजपा के ही सांसद साक्षी महाराज के बयानों को लेकर भी खूब हंगामा हुआ। भाजपा के कई अन्य नेताओं के बयान भी कतई अमर्यादित थे। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस मामले में केवल भाजपा के ही नेता शामिल हों, आम आदमी पार्टी की ओर से भी अभद्र टिप्पणियां कम नहीं की गईं। हद तो तब हुई जब भाजपा ने गोत्रका मामला प्रचार में उछाल दिया।
      सवाल ये है कि आखिर जिन अमर्यादित बयानों से आम जनता को लुभाने की इच्छा रखने वाले राजनेता इस तरह की बयानबाजी क्यूं करते हैं? क्या इस प्रकार के जुबानी हमले स्वीकार्य होंगे? राजनातिक दलों और नेताओं को इस बात का ख्याल रखना होगा कि जिस अमर्यादित ढ़ंग से वे  जनता को ठगने का प्रयास कर रहे हैं वो इतनी नासमझ नहीं है। नेताओं को यह भी समझना होगा कि ऐसे बयानों से आपसी सौहार्द भी प्रभावित हो सकता है। लोकतंत्र की असली ताकत वोट में है, इसका ये मतलब नहीं है कि इस प्रकार के बयानों से लोक को ठगा जाए।



मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

सशक्तीकरण की असली नजीर

इस बार के गणतंत्र दिवस परेड में सेना के तीनो अंगो में महिलाओं की भागीदारी देखकर अच्छा लगा। सेना के तीनों अंगों का नेतृत्व महिलाओं ने किया। वो पल बहुत ही गौरवपूर्ण रहा जब विंग कमांडर पूजा ठाकुर ने परेड के मुख्य अतिथि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया, और महिला दस्ते की अगुवाई में परेड की शुरुआत हुई। अपने शक्ति प्रदर्शन के दौरान हम पूरी दुनिया को यह बताने में कामयाब रहे कि नारी शक्ति भी हमारी सेना की एक खास विशेषता है।


        पहली बार भारतीय सेना की तीनों अंगो की टुकड़ियों का नेतृत्व महिला अधिकारियों ने किया। नारी शक्ति का ऐसा प्रदर्शन हमें गौरवान्वित करता है। भारत की महिलाओं ने आज हर क्षेत्र में मेहनत, संघर्ष और काबिलियत के बल पर अभुतपूर्व प्रगति की है। सेना में भी महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी है तब जाकर उन्हें ये अवसर प्राप्त हुआ है। वैसे तो सेना में महिलाओं की भर्ती 1927 से हो रही है पर 1992 में पहली बार उन्हें शॉर्ट सर्विस कमीशन प्रदान किया गया। वायू सेना और नौ सेना में 2008 में ही उन्हें  स्थायी  सर्विस कमीशन दिया गया पर थल सेना में अभी तक उन्हें ये कमीशन नहीं मिला है। जिन सेनाओं में उन्हें स्थायी सर्विस कमीशन दिया गया है उनमें भी उनकी भूमिका केवल सहायक स्टाफ तक ही सीमित है, युद्ध क्षेत्र में उनकी कोई भूमिका नहीं है।


        एक तरफ जहां हम 26 जनवरी के परेड समारोह में नारी सशक्तिकरण प्रदर्शित करनें के उद्देश्य से सेना के तीनों अंगों का नेतृत्व नारीयों से करवाते हैं वहीं सेना के उच्च पदों पर उन्हें स्थायी कमीशन देने से कतराते हैं। आखिर क्या कारण है कि अपने यहां की महिलाओं को युद्ध क्षेत्र में जाने पर रोक लगाते हैं जबकि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान की महिला फायटर पायलट आएशा फारुक ने न सिर्फ फायटर विमान उड़ाया बल्कि किसी इलाके में बम भी गिराया है। क्या हमारी यहां कि महिलाएं ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं जबकि उन्होनें इसके लिए मांग भी की है। क्या महिलाएं युद्ध क्षेत्र में समान दमखम से पुरुषों का मुकाबला नहीं कर सकतीं? जबकि इस बाबत सर्वोच्च न्यायलय ने भी महिला अधिकारियों के संबंध में ये टिप्पणी किया है कि वे इसकी हकदार हैं।

              
           यदि भारतीय सेना की बात करें तो 12 लाख की थल सेना में महज 2250 महिलाएं हैं । वायू सेना के कुल 1 लाख 40 हजार की संख्या में 1100 और 99 हजार की नौसेना में केवल 465 महिलाएं हैं।  यदि संख्या और अनुपात के लिहाज से देखें तो देश की आधी आबादी के सेना में इतना मामूली प्रतिनिधत्व हमारी व्यवस्था की सोच को दर्शाता है। महिलाओं की भागीदारी के मुद्दे पर थल सेना का यह मानना है कि उन्हें पहले उस ग्रामीण पृष्ठभूमि का ख्याल रखना होगा जहां से सेना में पुरुष सैनिक आते हैं। युद्ध में वे सभी लोग एक महिला अधिकारी के निर्देषों का कैसे पालन कर सकेंगे। इतना ही नहीं सेना ने ते सर्वोच्च न्यायालय में दायर अपने शपथ पत्र में ये भी कहा है कि सिद्धान्तों मे थल सेना में महिलाओं की भागीदारी अच्छी दिख सकती है मगर व्यवहार में भारतीय सेना में वह काम  नहीं कर सकी है और एक अवधारणा के तौर पर भी हमारा समाज युद्धक भूमिकाओं में महिलाओं को देखने के लिए तैयार नहीं है


            महिला अधिकारियों ने सेना में भर्ती और स्थायी सर्विस कमीशन पाने के लिए अदालत का दरवाजा भी खटखटाया है। हालांकि अदालत ने महिलाओं को बराबर मानते हुए उन्हें समुचित भागीदारी देने की बात भी कही है। महिला अधिकारियों द्वारा सन् 2003 में डाली गई याचिका पर  दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि ऐसा कोई कारण नहीं है कि काबिल और समर्थ महिलाओं को पुरुषों के बराबर स्थायी हकदार नहीं माना जाए। सेना में महिलाओं के साथ इस प्रकार का भेदभाव यह दर्शाता है कि आज भी किस प्रकार हम महिलाओं की क्षमता पर शक करते हैं। जहां एक तरफ तो हम उन्हें दुर्गा के रुप में पूजते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी शारीरीक क्षमता पर सवाल खड़े करते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि ये भारतवर्ष की ही महिलाएं है जो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के रुप में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देती है और रजिया बेगम के रुप में न केवल अपने सम्राज्य की रक्षा करती हैं बल्कि शासन करने में भी सफल होती है।



              ये हमारे समाज और व्यवस्था की सोच औऱ मान्यता का ही नतीजा है कि हम दुर्गा को शक्ति का प्रतीक और किताबों में ऐतिहासिक विरांगनाओं के उदाहरण देने के बावजूद आज भी उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम करके आंकते हैं। यह कोई खैरात नहीं है बल्कि महिला अधिकारियों द्वारा मांगे गए सांवैधानिक अधिकारों को लागु करना है। हम महिला अधिकारियों की इन मांगों को माने बगैर नारी सशक्तीकरण की मिशाल पेश नहीं कर सकते। इससे न केवल महिलाओं को उनका अधिकार मिलेगा बल्कि समाज में भी उनको एक सशक्त पहचान मिलेगी। पुरुषवादी समाजिक ढ़ांचे के लिए तो यह एक दर्पण के समान होगा जिसमें रहते हुए नारी को कमजोर, भोग्या और नाकाबिल माना जाता है। हमें महिलाओं के सुरक्षा के लिए इतनी हो हल्ला मचाने की जरुरत नहीं पड़ेगी क्यूंकि तब महिलाएं स्वयं हमारी और साथ-साथ देश की रक्षा करते नजर आएंगी।