गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

भारत या रत्न

सोचिए यदि अटल बिहारी वाजपेयी एक कांग्रेसी होते और महामना मालवीय संघ के एक कार्यकर्ता ! क्या इन दोनों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजे जाने का वक्त यही होता? क्या गोखले, तिलक , भगत सिंह और विवेकानन्द जैसे महापुरुषों को भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए? सर्वोच्च नागरिक सम्मान होने के नाते भारत रत्न तो देश का ब्रांड एंबेसडर है फिर मरणोपरांत क्यूँ? जब कभी भारत रत्न दिए जाने की घोषणा होती है इतना हो-हल्ला क्यूँ मचता है?  क्या अब तक के भारत के रत्न इस उपाधी से अलंकृत होने के हकदार नहीं थे? क्या इतना बड़ा सम्मान भी राजनीति, पूर्वाग्रह, झुकाव और महत्वकांक्षा से प्रेरित होकर दिए जाने चाहिए?

                                     1954 से लेकर अब तक कुल 45 लोग अलंकृत हुए हैं भारत रत्न से। सर्वपल्ली राधाकृष्णन से लेकर वाजपेयी तक के इस दौर में भारत ने ढ़ेर सारे बदलाव देखे। एक गरीब और उपेक्षित देश से आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने के इस सफर में इन 45 विभूतियों का कितना योगदान है यह विशद आकलन का विषय है। यह आकलन विवादित भी हो सकता है इसलिए इस पचड़े मे पड़ना फिलहाल जरुरी नहीं है। हां, यह जरुर है कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से देखा जाए तो सबने किसी ना किसी क्षेत्र और रुप में अपना अमुल्य योगदान दिया है। हम किसी के योगदान को नकार नहीं सकते हैं और ये अपना काम भी नहीं है। भारत रत्न राष्ट्रीय सेवाओं के लिए दिया जाता है। इन सेवाओ में कला, विज्ञान, साहित्य, सार्वजनिक सेवा और खेल के क्षेत्र में दी जाने वाली सेवाएं शामिल हैं। शुरुआत में यह सम्मान मरणोपरांत दिए जाने का प्रावधान नहीं था पर 1955 में इसमे सुधार कर मरणोपरांत भी यह सम्मान दिए जाने की व्यवस्था की गई। तब से लेकर अब तक 12 व्यक्तियों को यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया है। सेवा क्षेत्रों में खेल को शामिल किए जाने के समय भी काफी विवाद हुए जब यह सम्मान सचिन तेंदुलकर को दिया गया।

               अब बात करते हैं इस सम्मान से जुड़े विवादों और उन विभूतियों की जिन्हे यह सम्मान प्राप्त हो चुका है।सबसे पहला सवाल यह उठता है कि यह सम्मान मरणोपरांत क्यूँ दिया जाए? ऐसे में तो भारत का पूरा इतिहास ही महापुरुषों और विभुतियों से भरा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन और उसके पहले भी ऐसे बहुत से लोग हुए हैं जिनका योगदान अप्रतिम है। विवेकानन्द से लेकर भगत सिंह औऱ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर गणेश शंकर विद्दायार्थी तक कई ऐसी हस्तीयां हैं जो इस सम्मान के हकदार हैं। इनका योगदान भी अब तक के मरणोपरांत व्यक्तियों(भारत रत्न से अलंकृत) से कम नहीं है। विवाद के जड़ में यह बात भी शामिल है कि भारत रत्न देश का प्रतिनिधित्व करता है फिर वर्तमान समय में मरे हुए लोग देश का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगे। एक जीवंत प्रतिमान की छाप किसी मरे हुए व्यक्ति से हमेशा ज्यादा गाढ़ा होता है। इतिहास को सामने रखकर यदि हम अपनी पहचान स्थापित करना चाहते हैं तो ठीक है। पर इस बात का हमेशा भान रहना चाहिए कि वर्तमान ही भविष्य को संवारता है।

        विवाद का दुसरा पहलु यह है कि यह सर्वोच्च सम्मान किन्हें मिलना चाहिए। यदि गौर करें तो भारत रत्न से सम्मानित अधिकांश व्यक्ति किसी ना किसी रुप में राजनीति से जुड़े रहे हैं। हालांकि कुछ ऐसे भी लोग हैँ जिनका राजनीति से कोई वास्ता नहीं है। वो अपने क्षेत्र के महारथी रहे हैं। भारत रत्न का चुनाव तात्कालिक राजनीति  करती है। कहने का आशय यह है कि सरकार ही यह तय करती है कि भारत रत्न किन्हें मिलना चाहिए। जैसी सरकार वैसी पसंद। ऐसे में सरकार का झुकाव, राजनीति की दशा-दिशा, पूर्वाग्रह आदि का प्रभाव पड़ना ही है। कुछ राजनैतिक स्वार्थ भी इस चुनाव में महत्ती भूमिका निभाते हैं, मसलन किसी खास वर्ग, क्षेत्र या धर्म-संम्प्रदाय में अपनी सक्रिय प्रतीती देना।

        भारतीय जनता पार्टी की सरकार का वाजपेयी और महामना को भारत रत्न दिए जाने के फैसले का स्वागत होना चाहिए। दोनों ने भारत के विकास और इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।  विवाद उठने भी लाजिमी हैं क्यूंकि दोनों में कुछ खामियां भी हैं। विगत की सप्रंग सरकार के कार्यकाल में भी सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने पर कुछ इसी तरह का बवाल खड़ा हुआ था। बाद में तेंदुलकर कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा के सदस्य भी बनाए गए थे। तेदुलकर की काबिलियत पर किसी को कोई संदेह नहीं है। सचिन ने क्रिकेट के मारफत दुनिया में भारत को एक विशिष्ट पहचान दी है। वाजपेयी और महामना के साथ भी ऐसा ही है। वाजपेयी ने 21वी सदी के भारत को गढ़ने के लिए जो मजबूत आधार प्रदान किया उसी का नतीजा आज भारत की बढ़ती साख है।महामना ने भी स्वत्तंत्रता आंदोलन मे शिक्षा के क्षेत्र में महती भूमिका निभायी थी। बनारस हिन्दु विश्वविद्दयालय की स्थापना तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान असाधारण है। विवाद समय से है। इन दोनों को सम्मान तभी मिला है जब केंद्र में भाजपा की सरकार है। वाजपेयी भाजपा के पर्याय रहे हैं तो मालवीय हिन्दु महासभा के संस्थापक। महासभा की याद हमेशा नाथुराम गोडसे से जोड़ कर की जाती है।

         ऐसे और भी मुद्दे और सवाल हैं जो भारत रत्न जैसे सम्मान पर सवाल खड़े करते हैं। इसमे कोई दो राय नहीं है कि भारत रत्न मिलना चाहिए। यह देश के मुड और सोच को प्रदर्शित करता है। अभी तक के दिए गए पुरस्कार सही और उचित हो सकते हैं जब हम हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान का चुनाव बिना किसी पूर्वाग्रह, झुकाव, दबाव और स्वार्थ के अधार पर करें। सरकार को राजनीति से उपर उठकर अपनी तटस्थ छवि पेश करनी होगी। यही बात हंगामा करने वालों पर भी लागु होती है कि वे इस पुरस्कार की शुचिता का सम्मान करें। इसमे निहित स्वार्थ, राजनीति और महत्वाकांक्षा को परे रखकर आकलन करें। कोई भी व्यक्ति सम्पूर्णता में विशिष्ट नहीं हो सकता है। किसी ना किसी रुप में उसकी एक कमजोरी रहेगी ही। भारत रत्न पर ज्यादा जीरह करना इसके प्रासंगिकता को  चोट कर सकता है। हमें भारत पर ध्यान लगाना होगा यहां रत्नों की कमी नहीं है. यहां मूंगा भी एक रत्न है और गुंगा भी..

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

तुम्हारे लिए

आज तुम्हारे लिए लिख रहा हूँ, बस तुम्हारे लिए।
प्यार के लिए, तुम्हारे इकरार के लिए,
जगती रातों के लिए, मखमली बातों के लिए,
अनकहे सपनों के लिए, दिल की खनक के लिए,
तुम्हारे सहारे के लिए, दिखते किनारे के लिए,
जिंदगी की घुट्टी के लिए, अब तक हुई हर त्रुटि के लिए,
बस तुम्हारे लिए लिख रहा हूँ, बस तुम्हारे लिए।
मुझे याद है वो पहला दीदार,
झुकी नजरों और शोखी का वो हार,
चांद रह गया पीछे, जबकि
उसे देखा ता एक नहीं सैकड़ों बार,
टकटकी लगाकर ताकती मेरी वो आँखें,
डर की गिरहों मे बंधा मेरा करार,
फटकार सी लगने वाली तुम्हारी वो बातें,
पर इन कड़वी बातों में छिपा वों कशिश, वो खुमार,
जिन्हें सुन कर खुश हो जाता था हर बार, हर बार।
तुम्हारी गली की नुक्कड़ की उस बैठकी के लिए,
तुम्हारे छत के मुंडेरों पर टिकी उन नजरों को लिए,
दिल की बेचैनी के लिए,
ना हो सकने वाले इजहार के लिए,
घर से किए बहाने के लिए,
तुम्हारी एक झलक पा जाने लिए,
सड़कों पर धूल फांकती उन शामों के लिए,
याद कर तन्हाइ में गुनगुनाने के लिए,
आज तुम्हारे लिए लिख रहा हूँ, बस तुम्हारे लिए।
उस रात की बात बताता हूँ,
जिसे याद कर फिर से उन्हीं यादों मे खो जाता हूँ,
दिल के चितवन मे भौंरें गा रहे थे,
मचलते वो जज्बात सामने आ रहे थे,
नींद को गोली मार हम निशाचर हुए जा रहे थे,
तुम्हें बाहों मे भर लेने को आतुर हुए जा रहे थे,
तुम्हारा वो इजहार, ढ़ाई अक्षरों का वो करार,
पून: कहने को चाहता है दिल एक नहीं सौ बार, हर बार।
दौड़ जिंदगी की शुरु हो गई थी,
मैं कत्थक करने लगा था, तुम मेरी घुंघरु हो गई थी,
अब तो रोज बहाना था,
बेकरारी का नहीं कोई पैमाना था,
जगती रातों के वो अफसाने थे,
तुम्हारे नैन ही अब मयखाने थे,
मुझे नहीं किसी का भान था,
तुम्हारे लिए धड़कता जान था,
पर, तुम्हारे भाई का अभिमान था, बापू का मान-सम्मान था।
उन सवाली रातों के लिए,
विरह की वेदना के लिए,
अकेलेपन के उस दौर के लिए,
तुम्हारी खामोशी और मेरी चुप्पी के लिए,
तुम्हारे आहट के इंतजार के लिए,
आंखों से निकले अश्रु-धार के लिए,
कल्पना में बिखरे अंधियारे के लिए,
आज तुम्हारे लिए लिख रहा हूँ, बस तुम्हारे लिए।
गुड़िया,
तुम्हारे लौट कर आने लिए,
तुम्हारा प्यार नि:स्वार्थ पाने लिए,
तुम्हारे कसमों वादों के लिए,
तुम्हारे सहारे के लिए, जिंदगी के उजियारे के लिए,
तुम्हारे अप्रतिम चाहत के लिए,
अश्रु के उन धारों के लिए,
तुम्हारी नजरों की शोखी के लिए,
चांद के उस पार जाने के लिए,
तुम्हीं में डूब कर मर जाने के लिए,
आज तुम्हारे लिए लिख रहा हूँ, बस तुम्हारे लिए।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

सबक लेने की जरुरत

पिछले एक दशक के दरम्यान बिहार के सारण जिले में चार दारोगा अपराधियों के शिकार हुए हैं. बिहार में सड़कें बदली, शिक्षा व्यवस्था मे सुधार हुए, बिजली पानी की समस्या से भी कुछ हद तक निजात मिला है. बस एक चीज नहीं बदली इन बीते दिनों में तो वो है राज्य का पुलिस प्रशासन और राज्य की पुलिस को मिलने वाली सुविधाएं. ताजा मामले में कुछ सशस्त्र अपराधियों ने छपरा जिले के इसुआपुर थाने के प्रभारी की हत्या कर दी है. 2009 बैच के दारोगा संजय कुमार तिवारी उस वक्त मौत के शिकार बने जब वे पूरी इमानदारी के साथ ड्यूटी कर रहे थे. एक नागरिक के पैसों की हिफाजत और बैंक को लूटने से बचाने के क्रम में उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी.
              सवाल है कि एक इमानदार और कर्तव्यनिष्ठ दारोगा को किस गलती की ऐसी निर्मम सजा मिली? क्या उसकी गलती थी जो वह पूरी निष्ठा और जंबाजी के साथ अपना काम कर रहा था? आखिर क्यूं जब एक अफसर अदम्य साहस और काम के प्रति अप्रतिम निष्ठा का परिचय देता है तब उसके पर कुचल दिए जाते हैं? कभी कृष्णा सिंह के रुप में तो कभी तिवारी के रुप में जब कभ किसी दारोगा ने हिम्मत दिखायी है उसकी हत्या कर दी गई है. क्या इससे बाकी अफसरों के हिम्मत और बहादूरी पर फर्क नहीं पड़ता? ऐसे कृत्यों का एक ही मकसद मालूम पड़ता है कुछ गिने चूने बहादूर अफसरों को हतोत्साहित कर उनके फौलादी इरादों को गिराना. अखबारी रपटों एवम् साथी अफसरों की मानें तो तिवारी आधूनिक ढंग से अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए जाने जाते थे. वो व्हाट्सएप्प के जरिए साथियों से संपर्क बनाकर सूत्रबद्ध तरीके से कार्रवायी करते थे. तब क्या ज्यादा आधूनिक बनना ही तिवारी के हत्या का कारण है?
             राज्य की पुलिस व्यवस्था की बात करें तो वह जर्जर रुप में दिखायी पड़ती है. बेहतर प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरणों/शस्त्रों के अभाव में खोखली क्षमता की परिचायक हैं. जर्जर पड़ी गाडियां, पूराने हथियारों से लैस होकर छापेमारी करने का वर्षों पूराना ढ़ंग कैसे किसी अभियान को सफल बना सकता हैं. पुलिस की गाड़ियों की बात करें तो कब उनका इंजन सीज हो जाए कहा नहीं जा सकता. ऐसे में तो किसी निजी वाहन का सहारा लेना पड़ता है या फिर दबे पांव वापस आना पड़ता है. हथियार नमूने मालूम पड़ते हैं . रिवाल्वर और राइफल से कब गोलियां निकलेंगी ये गोली चलाने वाला भी नहीं बता सकता. कभी किस्मत अच्छी रही तो गोली चल जाएगी अन्यथा अटक जाने का खतरा है. ऐसे हाथियारों के बल पर अपराधी को मारना तो दूर खुद की सुरक्षा संदिग्ध है. छापेमारी की वही पूरानी तकनीक अब भी कायम है जिसे अपराधी भी बखूबी जानता है. अपराधी को यह पहले ही पता रहता है कि पुलिस किस ओर से आएगी, किन किन साजो सामानों के साथ आएगी और और तरीका क्या होगा.  इस तरह या तो अपराधी पहले ही फरार हो जाएगा या फिर अपना ठिकाना बदल लेगा.
             विगत दशकों में पूलिस व्यवस्था मे सुधार से संबंधित कई आयोगों और समितियों का गठन किया गया. दर्जनों रिपोर्टें आयीं . पर असली मे क्या हुआ? आज वो रिपोर्टें न जाने कहां दफन हो गईं. अब कोई सूध लेने वाला नहीं है.  यदि कुछ वाकयी में हुआ है तो वह है मलाइदार पदों पर बैठे साहबों के शोहदों का ईजाफा और मन्त्रियों की सम्पति मे बढोतरी. कागजी कार्यवाहीयों और धूल फांकती रिपोर्टों की आड़ मे इन्होनें अपने रसूख का भरपूर ईस्तेमाल किया है. सारी योजनाएं कागजों में पूरी बतायी जाती हैं. धरातल पर उनका प्रतीक मात्र दिखायी देता है. कहीं पर नया वाहन तो है पर बाकी सामान नदारद है. किन्हीं अफसर को उन्नत प्रशिक्षण तो प्राप्त हे पर करने को कूछ नही है. वो ऐसी जगह तैनात हैं जहां बस किसी बड़े अधिकारी या मंत्री की तिमारदारी कर सकते हैं.
            इस पूरे तमाशे में सरकार की क्या भूमिका है ये सरकार भी कहने से कतराती है. इतना तो स्पष्ट है कि राज्य पुलिस व्यवस्था का प्रबंधन सरकार के पास ही है. पर हरेक मामले मे वह अपना पल्ला झाड़ते हुए क्यूं नजर आती है? जिम्मेदारी से क्यूं भागती है? क्या वह यह दिखाना चाहती है कि किसी भी कुप्रबंधन मे उसकी कोई भूमिका नहीं है? सरकार चाहे लाख छुपाने की कोशिश करे पर सभी जानते हैं कि वो कितनी जिम्मेदार है. कैसे किसी अच्छे अफसर का तबादला या तो किसी विरान जगह पर कर दिया जाता है या फिर किसी मंत्री की सूरक्षा मे. कई बार तो ऐसा भी होती है कि अफसर  की निष्ठा पर सवाल खड़े कर उसे लाईन हाजिर कर दिया जाता है. भ्रष्ट और चापलूसों को मनमर्जी तबादला मिलता है. योजनाओं की खानापूर्ती के लिए मनपसंद ठेके दिए जाते हैं. ज्यादा दाम देकर खराब माल की खरीदारी होती है. ऐसे उपकरण और साजो सामान पुलिस की सूरक्षा पर भारी पड़ते हैं. कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सरकार की भूमिका पुलिस की हतोत्साहित होने पर मजबूर करती हैं.
              समय रहते अगर सरकार और प्रशासन नहीं चेते तो निकट भविष्य में इससे भी भीषण परिणाम सामने आएंगे. तिवारी की तरह और जांबाज अफसर शहीद होंगे. किसी और सुहागन का सुहाग छीनेगा और फिर कोई मासूम के सर से पिता का साया हट जाएगा. प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो दूबारा कोई वीर अफसर हमारी और आपकी रक्षा करने नहीं आएगा. कुछ मिशालें डर बनकर मिट जाएंगी. इस शहादत से सीखने की जरुरत है. सरकार को अब जिम्मेदार होना होगा वरना ये पुलिस है . ये सरकार की भी सूरक्षा करती है.

रविवार, 21 दिसंबर 2014

पालने का सांप

           अपने घर को बर्बाद करने वाले को फाँसी! पड़ोसी के घर में तबाही मचाने वाले को संरक्षण! हत्यारा और  दहशतगर्द किसी भी सूरत में नापाक हरकत करेगा। ऐसा भी हो सकता है कि पड़ोसी के घर को लहुलूहान करने वाला  कल आपके भी घर को क्षत्-विक्षत् कर देगा। उसका कोई दोस्त नहीं होता और वो किसी का हमदर्द नहीं बन सकता। वो जब तक खुद को महफूज महसूस करेगा, जब तक आप उसे घर में पनाह देंगे तब तक ही  आपके साथ है, अन्यथा वो कभी भी आपका हितैषी नहीं है। जब कभी आपने उसकी ओर आँख तरेर कर देखा, उसने आपके  घर मे भी कत्लेआम मचाया। एक  बार नहीं हजारों बार। फिर भी ऐसा दोहरा रवैया  क्यूँ? एक जरा सी चाहत की खातीर आप कब तक अपने परिवार के साथ-साथ पड़ोसी का भी चैन छीनते रहेंगे।
        जिहाद और कोरे चाहत की आग में झुलस रहा पाकिस्तान स्वयं के पैरों पर कुल्हाड़ी मारता नजर आ रहा है।अवाम और सरकार के बीच एक खेल चल रहा है। एक ऐसा खेल जिसका परिणाम घर के सदस्यों के साथ-साथ पड़ोसी को भी भुगतना पड़ रहा है। सरकारें तो आती जाती रहीं हैं, पर भोग तो अवाम रहा है। मानवता चीत्कार रही है। सरकारों का रवैया हमेशा से ऐसा ही रहा है। कभी पेशावर तो कभी मुम्बई दहल उठता है। ऐसा कहा जाता है कि डाइन(चुड़ैल) भी सात घर छोड़ कर वार करती है, पर पाकिस्तान के दहशतगर्द तो उसी थाली मे छेद कर रहे हैं जिसमे उन्हें खाना परोसा जा रहा है। सवाल ये है कि सरकार इसके बावजूद भी हाथ पर हाथ धरे क्यूँ बैठी है? आखिर मजबूरी क्या है? 
            उन बच्चों का क्या दोष था जिनकी छाती छलनी कर दी गई? क्या स्कूल में पढ़ने गए मासूमों से इतना डर था कि भविष्य में वे गले की काट बन सकते हैं? या फिर क्या किसी सैन्यकर्मी के परिवार में जन्म लेने की सजा दी गई है उन्हें? 16 दिसम्बर को पाकिस्तान के एक आर्मी स्कूल में तालिबानी हमले में मारे गए 138 बच्चें पढ़-लिख कर पाकिस्तान की नई ईबारत गढने का सपना संजोए थे। शिक्षा की अलख जगा रहे थे। ठीक वैसे ही जैसे मलाला ने कर दिखाया है। वे सब मलाला बनना चाहते थे। सपना देखा था उन्होनें कि पाकिस्तान में एक नहीं सैकड़ों नोबेल पुरस्कार आए।  वो जानते थे कि एक नोबेल पाकिस्तान की साख में कितना ईजाफा कर सकता है। मलाला ने भी ये नहीं सोचा होगा कि उसकी प्रेरणा उन बच्चों के लिए नासूर बन जाएगी।
           अब बात करते हैं हुकूमत की। पाकिस्तान की नवाज शरीफ सरकार मजबूर नजर आ रही है। एक तरफ उसकी चाहत है तो दूसरी ओर अपना ही अवाम। इसे अवाम की बदकिस्मती ही कहेंगे कि वह सरकार के मंसूबों के आगे बेबस नजर आता है। पाकिस्तान में कहने को तो लोकतंत्र है पर शासन प्रक्रिया में लोक नदारद दिखता  है। सरकार की मंशा से यह साफ  जाहिर होता है कि उसकी चिंता किसके लिए कितनी है। पड़ोसी पर हमला  करने के लिए अपने ही घर में सांप पालने की प्रथा पाकिस्तान में हमेशा से ही चली आ रही है। सरकार भूल जाती है कि वही सांप उसके घर की तरफ भी फुफकारेगा जब कभी उस पर अंकुश लगाने की कोशिश की जाएगी।
          पाकिस्तान में शिक्षा, सुरक्षा तथा शासन के बीच ये जो भयावह पहेली बूनी गई है  उसमे मानवता पीस रही है। पाकिस्तान की अवाम को हमेशा एक डर को साथ जीना पड़ता है। मासूम बच्चों के साथ जब इतना घिनौना व्यवहार हो रहा है तब मानवाधिकारों की बात ही करना बेमानी है। जिहाद के नाम पर बोए गये नफरत के बीज अब लहलहाती फसल के रुप ले लिए हैं। रेडक्लिफ की मेड़ के आगे कब्जा जमाने की सरकार की नापाक हसरत अब अपने ही खेत को बंजर बना रही है। 

रविवार, 7 दिसंबर 2014

हम ऐसे हैं..

Attention के लिए आभार. खुशी हो रही है कि हमारी भी बातों को so called elite class वाले लोगseriously लेते हैं.
क्या है न कि हमलोग दिखावे में भरोसा नहीं करते है. हमारा एक संस्कार भी है जो हमे अलग करता है आपसे भी और इनसे भी. हमजहाँ का खाते हैं उसका कर्ज चुकाते हैं. हम जिसकी गोद मे खुशी महसूस करते हैं उसे पुजते हैं. हम घड़ियाली आँसू नहीं बहाते हैं हम दर्द को जीते हैं. अपनी पैदाइश को गलियाते नही हैं उसकी अराधना करते हैं.हम गुरु को अराध्य मानते हैं. विवेकानन्द और रामकृष्ण को तो जानते ही होगे.
पहले अपनी संस्कृति का मान करते हैं बाद में सबकी खबर लेते हैं. हम फिर से सिरमौर बनने का सपना देखते हैं. अपनी गिरेबान को चमका कर चलने का मजा ही कुछ और है.दुसरों की नकल क्यूं करें जबकि अपनी विरासत इतनी शानदार है.आधुनिकता हमे भी पसंद है पर अपने मुल्यों की कीमत पर नहीं. हम आधुनिकता का भौंडा प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं.गुरु हमारे लिए सर्वोच्च संस्था है. हमारी परंपरा है. मार्क्स औऱ गांधी से भी बढकर. लेनीन और नेहरु से भी आगे.
अब आप नाचिए या गाइए , हम रोकने नहीं जाएंगे. बस आपको अहसास कराना हमारा काम है. लगता है हो गया. लहर तो अब चल पड़ी है.
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
                   साभार - रामधारी सिंह दिनकर.
ऐसे होते हैं पत्रकार जो कि गलत बयानी के बाद विवादित होने पर पर भाग खडे होते हैं. हम तो नहीं डरने वाले हैं. हम माल्वे सर की बातों को चरितार्थ करने का सपना संजोए हैं. आइए बातों से जवाब दीजिए. आपकी बात सुनी जाएगी. पर इस तरह पत्रकारिता कैसे कीजिएगा. सोचिए सोचिए...

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

खजाने की कीमत

अब तो आदत सी हो गई है। आप कभी भी हमारे घर आओ ये इसी हाल में मिलेंगे। बच्चों के साथ भी इनका रवैया ऐसा ही रहता है। आज पाँच दिन से राशन वाला पैसे के लिए टोक रहा है। आटा-दाल नहीं है पर किस मुँह से लेने जाऊँ। बच्चों की स्कूल फीस भी देनी है। स्कूल से दो बार नोटीस आ चुका है। ये इसी तरह पड़े रहते है। जब नशा उतरता है फिर से पैसों के लिए गालियाँ बकने लगते हैं। मना करने पर मारपीट करने लगते हैं। अपने माथे की पल्लु संभालती व्यथा और शर्म का भाव लिए नकुल की पत्नी अपने घर का हाल का सुना रही थी। मैं तो बस उनके घर का हाल चाल जानने गया था। मुझे क्या मालुम कि बचपन में मेरे सबसे प्रिय मित्र रहे नकुल के घर का यह हाल होगा। 
यह हाल केवल नकुल के घर का नहीं है। उस पूरे टोले की कहानी ऐसी ही है। कोई ऐसा परिवार अछुता नहीं है जिसमें कि एक शराबी नहीं हो। इस कस्बे की औरतें मजदूरी और नौकरानी का काम कर किसी तरह परिवार का पेट पालती हैँ। मर्दों ने अपने जिम्मे बस घर मे पड़े रह कर शराब पीने का काम ले रखा है। शायद यह उसी मनुवादी सोच का नतीजा है। जिसमे आज भी औरतों को पुरुषों से सवाल करने मे भी मुश्किल का सामना करना पडता है। 
"
काम के लिए कोई मिलता कहाँ हैं, जितने मजदूर थे अब शराब और जुए के लत के इस कदर शिकार हुए हैं कि या तो कोई कम करने नहीं आता यी फिर उनसे काम नहीं हो पाता।" बिहार के भोजपूर जिले के हार्डवेयर पार्ट्स के व्यवसायी रामनारायण जी ये कहते हुए रुक जाते हैं। माथे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही थीं। खुद ही ग्राहकों को संभालते और मेरे सवालों का जवाब देते हुए कहते हैं " आने वाले दिनों मे कोई नहीं मिलेगा काम करने के लिए, राम जाने कैसे चलेगा हमारा धंधा। उनकी शिकायत है कि पिछले कुछ साल में इस इलाके में मेहनत-मजूरी करने वाले नहीं मिलते। लेकिन ऐसा क्यों हुआ? वे इसके लिए राज्य सरकार को दोषी मानते हैं और कहते हैं, “लोग बहुत ज्यादा पीने लगे हैं. 2006 तक इस इलाके की 16 पंचायतों में शराब की सिर्फ एक दुकान थी, अब पांच दुकानें हैं. राज्य सरकार ने शराब की खरीदारी आसान कर दी है.”  
शराब की दुकानें सिर्फ भोजपूर जिले में ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य में बहुतायत में खुल गई हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2002-03 में बिहार में शराब की दुकानों की संख्या 3,095 थी जो 2013-14 तक बढ़कर 5,467 तक पहुंच गई. यानी पिछले 10 वित्त वर्ष में 2,372 नई दुकानें खुली हैं जो चौंकाने वाला औसत दिखाता हैबिहार में हर दूसरे दिन शराब की एक नई दुकान खुली है. सबसे ज्यादा शराब की दुकानें ग्रामीण इलाकों में बढ़ी हैं. वहां 2006-07 में इनकी संख्या 779 से तीन गुनी बढ़कर 2,360 हो गई है. शराब की बिक्री तो इससे भी तेजी से बढ़ी है. देसी शराब की खपत चार गुना बढ़ गई है जबकि देश में निर्मित विदेशी शराब (आइएमएफएल) की बिक्री पांच गुना और बियर की खपत 11 गुना से अधिक बढ़ गई है.   
राज्य सरकार की आबकारी नीति तब बदली जब नीतीश कुमार ने जेडी (यू) और बीजेपी गठबंधन के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. सरकार ने राजस्व में इजाफे के लिए शराब की दुकानों के लिए लाइसेंस फीस बढ़ाकर अतिरिक्त दुकानें खोलने की इजाजत दी. बिहार में औद्योगीकरण काफी कम है, उसके लिए एक्साइज ड्यूटी का महत्व हरियाणा जैसे भारी औद्योगीकरण वाले राज्य से अलग है. 
बात शराब पीकर मरने की हो या फिर अनाज के बगैर हो, दोनों ही सूरत में मरते तो समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति ही है। इन गरीबों के लिए जरूरत सामाजिक व आर्थिक विकास की है। शराबखोरी से किसी भी व्यक्ति का सामाजिक व आर्थिक विकास  नहीं होता है, हां राज्य के खजाने जरूर भर जाते है। शराबखोरी के प्रचलन से सबसे अधिक महिलाओं को ही जूझना पडता है। जाहिर है शराबियों का कहर सबसे पहले अपनी पत्नियों के उपर ही तो टूटता है। शराब के नशे में पति, पत्नी को पीटता है। उसे होश ही नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है। कई बार नशे की हालत में ही दुर्घटना हो जाती है और परिवार बिखर जाता है। इस तरह तो सरकार समाज के सबसे पिछडे समुदाय की सामाजिक-आर्थिक रूप से सर्वाधिक पिछडी समझी जाने वाली महिलाओं का ही आर्थिक नुकसान कर रही है जिसने अमन चैन और खुशहाली के लिए प्रचंड बहुमत से नीतिश कुमार की सरकार को दुबारा सत्ता में लाया। शराबखोरी का सबसे अधिक दुष्प्रभाव भी उन्हीं लोगों पर पड़ रहा है जो किसी तरह मनरेगा से सौ-पचास रूपये कमाकर घर लौटता है, लेकिन घर पहुंचने के पहले  वह देशी शराब से अपने गले को तर कर लेता है। बीबी-बच्चों के लिए रोजमर्रे की चीजों के प्रबंध करने के बजाय वह खाली हाथ घर मदहोश होकर लौटता है। 
भारत के रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय और जनसंख्या आयुक्त के जनगणना कार्यक्रम के तहत किए गए नवीनतम सालाना स्वास्थ्य सर्वे (एएचएस) में कहा गया है कि बिहार में 9.5 फीसदी वयस्क (15 वर्ष से ऊपर) शराब का सेवन करते हैं. इनमें से 9.8 फीसदी ग्रामीण आबादी और 8 फीसदी शहरी हैं. इसके और वर्गीकरण में बताया गया है कि राज्य के सभी पुरुषों में से 18.1 फीसदी लोग शराब का सेवन करते हैं, जबकि महिलाओं का केवल 0.7 फीसदी हिस्सा ही शराब का सेवन करता है. इन आंकड़ों के अनुसार देखें तो बिहार में करीब एक करोड़ लोग शराब पीते हैं. वैसे तो, नीतीश अपने राजनैतिक गुरु कर्पूरी ठाकुर की बराबरी नहीं कर सकते, जिन्होंने 1977 में मुख्यमंत्री रहने के दौरान शराब पर रोक लगा दी थी, लेकिन बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री ने उन स्व-सहायता समूहों को एक लाख रु. का इनाम देने की घोषणा की है जो किसी गांव को शराब मुक्त करने में सफल होंगे. 
यह विरोधाभास ही है कि एक ओर जहां महिलाओं के सशक्तिकरण के नए-नए उपायों से संबंधित गतिविधियों को तेज करने पर बल दिया जा रहा है वहीं दूसरी ओर महिला घरेलू हिंसा एवं अपराध को बढावा देने में मददगार नयी आबकारी नीति को भी प्राथमिकता दी जा रही है। एक तरफ बाहुबलियों के अपराध पर नकेल डालने की कोशिश हुइ तो दूसरी तरफ प्रदेश के गांवो में शराब पीने बालों की नयी फौज तैयार हो रही है । शराब के दुकानों से होकर महिलाओं या स्कूल की छात्राओं का गुजरना दूभर हो गया है। अब तो प्रदेश के कई इलाकों के बस अड्डों, सडक मार्ग, तथा अन्य भीड भाड वाले इलाकों में दिन ढलते ही सरेआम शराब की बिक्री की जाती है। चलते-फिरते विक्रेता हॉकर की तरह शराब के पाउच, थैला आदि लिये रहते है। फेरी वाले शराब के पाउच से भरे बोरे अपने साईकिल पर टांगकर खेतों तक पहुंच जाते है। खेतों में काम कर रहे खेत मजदूर काम छोडकर खेतों के मेड पर ही सो जाते हैं। बिहार के कई ग्रामीण इलाकों का यही हाल है। 
अब ग्रामीणों को निकट के बाजार में जाने के बजाय गांव में पर्याप्त शराब मिल जाया करती है। शराब के अड्डों या शराब निर्माण वाले गांवों की महिलाएं अपने खेत, खलिहान एवं टोले में खुद को असुरक्षित समझती है। गांवों में पिछले तीन वर्षों में मदिरा पीने को लेकर अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। ग्रामीणों के अनुसार गांवों में शराब बेचे जाने से गांव का माहौल खराब हो रहा है। गांव में अशांति फैल रही है। बेवजह तनाव बढ रहा है। नयी नीति के अनुसार 13 हजार 5 सौ की आबादी पर एक शराब की दुकान खोले जाने की संभावना है। 
जिस प्रदेश के गांवों में भुखमरी की पदचाप सुनाई पड रही हो वहां शराब आवाम के जीवन शैली का हिस्सा कैसे हो सकता है।  यह अलग बात है कि भुखमरी की खबरें अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री बार-बार केन्द्र से विशेष राज्य का दर्जा हासिल करते हुए एक करोड पैंतालिस लाख परिवारों के लिए खाद्यान्न की मांग करते रहे है । इस तरह प्रदेश में कुल गरीब लोंगों की संख्या सात करोड पचीस लाख हो जाती है । बिहार की तकरीबन ग्यारह करोड लोगों में लगभग छियासठ प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे रहने बाले लोगों के लिए शराब के बजाय रोजी-रोटी का प्रबंध समीचीन होता, लेकिन इन बातों से मानो सरकार को कोई सरोकार  नहीं रह गया हैं । 
बिहार में जब अनेक सामाजिक व राजनैतिक संगठनों ने एक स्वर से बेतहाशा बढ रहे शराब की दुकानों के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया तो मजबूरन बिहार सरकार को शिक्षण संस्थानों एवं मंदिर मस्जिद आदि के आसपास शराब की दुकानों को हटाने का निर्णय लेना पडा, लेकिन सरकार के इस नकली प्रयास से लोगों की  नाराजगी दूर नहीं हुई है, क्योंकि सरकार की इस घोषणा से आबकारी नीति की सेहत पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पडने बाला है, इससे न तो अवैध शराब के निर्माण पर रोक लगने वाली है और न ही ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की दुकानों की संख्या में कमी। जनहित के प्रतिकूल होने के बावजूद यदि इस नीति को तवज्जो दी जा रही है तो इसके पीछे  मुख्यतः भारी राजस्व की प्राप्ति होना  है। इस संदर्भ में तेजी से विकास के लिए चर्चित बिहार अन्य राज्यों से अलग नहीं है। सवाल यह  है कि महज राजस्व में वृद्धि लिए समाज पर पडने बाले बुरे परिणामों की अनदेखी कैसे की जा सकती है।  
सूबे की प्रगती में जमकर शराबखोरी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। शराब से राजस्व उगाही कर कथित विकास कार्यक्रमों को अंजाम दिया जा रहा है। विकास यूँ हो रहा है कि बिहार सड़क पर धूत नजर आता है। चाहे कुछ हो ना हो सरकारी झोली भरती रहेगी। चिंता तो बस इसी बात की है- बिहार की श्रमशक्ति, बिहारी अस्मिता और बिहार के चरित्र का क्या होगा।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

भरता खजाना और गिरता चरित्र

खजाने की कीमत
  बिहार में बढती पियक्कड़ों की फौज और सरकार का रवैया
हंगामा है क्यूँ बरपा ,
थोडी सी जो पी ली है!
मधुशाला , मधुशाला, मधुशाला,........।
कुछ इसी तरह बडबडाते हुए नकुल अपनी डेहरी की तरफ चला जा रहा था। मानसिक चेतना को भूलकर तथा सामाजिक मूल्यों को ताक पर रखकर रास्ते में जो मिलता उसे गालियाँ बक रहा था। लोग उसकी गालियों की परवाह किये बगैर खुद को बचाकर निकल जाते। चौराहे पर खुली शराब की दुकान से शराब पीकर लौटते नकुल मानों भूल सा गया था कि उसका एक भरापूरा परिवार भी है। वह बेसुध होकर शराब के नशे मे धूत बस चला जा रहा था। इस बात से बेखबर की उसकी पत्नी और बच्चे शाम को उसकी बाट जोह रहे होंगे।  
अब तो आदत सी हो गई है। आप कभी भी हमारे घर आओ ये इसी हाल में मिलेंगे। बच्चों के साथ भी इनका रवैया ऐसा ही रहता है। आज पाँच दिन से राशन वाला पैसे के लिए टोक रहा है। आटा-दाल नहीं है पर किस मुँह से लेने जाऊँ। बच्चों की स्कूल फीस भी देनी है। स्कूल से दो बार नोटीस आ चुका है। ये इसी तरह पड़े रहते है। जब नशा उतरता है फिर से पैसों के लिए गालियाँ बकने लगते हैं। मना करने पर मारपीट करने लगते हैं। अपने माथे की पल्लु संभालती व्यथा और शर्म का भाव लिए नकुल की पत्नी अपने घर का हाल का सुना रही थी। मैं तो बस उनके घर का हाल चाल जानने गया था। मुझे क्या मालुम कि बचपन में मेरे सबसे प्रिय मित्र रहे नकुल के घर का यह हाल होगा।
यह हाल केवल नकुल के घर का नहीं है। उस पूरे टोले की कहानी ऐसी ही है। कोई ऐसा परिवार अछुता नहीं है जिसमें कि एक शराबी नहीं हो। इस कस्बे की औरतें मजदूरी और नौकरानी का काम कर किसी तरह परिवार का पेट पालती हैँ। मर्दों ने अपने जिम्मे बस घर मे पड़े रह कर शराब पीने का काम ले रखा है। शायद यह उसी मनुवादी सोच का नतीजा है। जिसमे आज भी औरतों को पुरुषों से सवाल करने मे भी मुश्किल का सामना करना पडता है।
श्रमशक्ति में गिरावट और शराबखोरी का बढता दायरा
"काम के लिए कोई मिलता कहाँ हैं, जितने मजदूर थे अब शराब और जुए के लत के इस कदर शिकार हुए हैं कि या तो कोई कम करने नहीं आता यी फिर उनसे काम नहीं हो पाता." बिहार के भोजपूर जिले के हार्डवेयर पार्ट्स के व्यवसायी रामनारायण जी ये कहते हुए रुक जाते हैं. माथे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही थीं. खुद ही ग्राहकों को संभालते और मेरे सवालों का जवाब देते हुए कहते हैं " आने वाले दिनों मे कोई नहीं मिलेगा काम करने के लिए, राम जाने कैसे चलेगा हमारा धंधा". उनकी शिकायत है कि पिछले कुछ साल में इस इलाके में मेहनत-मजूरी करने वाले नहीं मिलते. लेकिन ऐसा क्यों हुआ? वे इसके लिए राज्य सरकार को दोषी मानते हैं और कहते हैं, “लोग बहुत ज्यादा पीने लगे हैं. 2006 तक इस इलाके की 16 पंचायतों में शराब की सिर्फ एक दुकान थी, अब पांच दुकानें हैं. राज्य सरकार ने शराब की खरीदारी आसान कर दी है.” 
शराब की दुकानें सिर्फ भोजपूर जिले में ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य में बहुतायत में खुल गई हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2002-03 में बिहार में शराब की दुकानों की संख्या 3,095 थी जो 2013-14 तक बढ़कर 5,467 तक पहुंच गई. यानी पिछले 10 वित्त वर्ष में 2,372 नई दुकानें खुली हैं जो चौंकाने वाला औसत दिखाता है—बिहार में हर दूसरे दिन शराब की एक नई दुकान खुली है. सबसे ज्यादा शराब की दुकानें ग्रामीण इलाकों में बढ़ी हैं. वहां 2006-07 में इनकी संख्या 779 से तीन गुनी बढ़कर 2,360 हो गई है. शराब की बिक्री तो इससे भी तेजी से बढ़ी है. देसी शराब की खपत चार गुना बढ़ गई है जबकि देश में निर्मित विदेशी शराब (आइएमएफएल) की बिक्री पांच गुना और बियर की खपत 11 गुना से अधिक बढ़ गई है.
नई आबकारी नीति के बाद की तस्वीर 
राज्य सरकार की आबकारी नीति तब बदली जब नीतीश कुमार ने जेडी (यू) और बीजेपी गठबंधन के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. सरकार ने राजस्व में इजाफे के लिए शराब की दुकानों के लिए लाइसेंस फीस बढ़ाकर अतिरिक्त दुकानें खोलने की इजाजत दी. बिहार में औद्योगीकरण काफी कम है, उसके लिए एक्साइज ड्यूटी का महत्व हरियाणा जैसे भारी औद्योगीकरण वाले राज्य से अलग है.
बात शराब पीकर मरने की हो या फिर अनाज के बगैर हो, दोनों ही सूरत में मरते तो समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति ही है। इन गरीबों के लिए जरूरत सामाजिक व आर्थिक विकास की है। शराबखोरी से किसी भी व्यक्ति का सामाजिक व आर्थिक विकास  नहीं होता है, हां राज्य के खजाने जरूर भर जाते है। महिला संगठनों के अनुसार महिला एवं बच्चों के उपर चौतरफा दुष्प्रभाव पड रहा है। शराबखोरी के प्रचलन से सबसे अधिक महिलाओं को ही जूझना पडता है। जाहिर है शराबियों का कहर सबसे पहले अपनी पत्नियों के उपर ही तो टूटता है। शराब के नशे में पति, पत्नी को पीटता है। उसे होश ही नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है। कई बार नशे की हालत में ही दुर्घटना हो जाती है और परिवार बिखर जाता है। इस तरह तो सरकार समाज के सबसे पिछडे समुदाय की सामाजिक-आर्थिक रूप से सर्वाधिक पिछडी समझी जाने वाली महिलाओं का ही आर्थिक नुकसान कर रही है जिसने अमन चैन और खुशहाली के लिए प्रचंड बहुमत से नीतिश कुमार की सरकार को दुबारा सत्ता में लाया। शराबखोरी का सबसे अधिक दुष्प्रभाव भी उन्हीं लोगों पर पड रहा है जो किसी तरह मनरेगा से सौ-पचास रूपये कमाकर घर लौटता है, लेकिन घर पहुंचने के पहले  वह देशी शराब से अपने गले को तर कर लेता है। बीबी-बच्चों के लिए रोजमर्रे की चीजों के प्रबंध करने के बजाय वह खाली हाथ घर मदहोश होकर लौटता है।
अब राज्य सरकार शराब की दुकानें लॉटरी के जरिए आवंटित करती है. लॉटरी के बिना कोई लाइसेंस नहीं दिया जाता है. किसी इलाके में दो-तीन दुकानों के लिए समूह में लाइसेंस दिया जाता है जिसमें विदेशी और देसी दोनों तरह की शराब की बिक्री जरूरी है. लाइसेंस फीस भी काफी है. बक्सर के शराब दुकानदार कहते हैं कि वे अपनी दो देसी शराब और एक विदेशी शराब की दुकान के लिए हर महीने 8.45 लाख रु. लाइसेंस फीस देते हैं. नाम न छापने की शर्त पर पटना के रेस्तरां मालिक कहते हैं कि अप्रैल, 2013 में सरकार ने बार के लिए वार्षिक लाइसेंस फीस 5 लाख रु. से बढ़ाकर 17 लाख रु. कर दी तो मैंने बार खोलने की योजना टाल दी. वे कहते हैं, “रेस्तरां के लिए कई तरह के टैक्स अदा करने के अलावा मैं इतनी बिक्री नहीं बढ़ा पाऊंगा कि इतनी रकम और अदा कर पाऊं.”
शराब की बिक्री से राज्य के खजाने में पैसा जरूर आ रहा है लेकिन सरकार को सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों की आलोचना का भी शिकार होना पड़ा है. आलोचकों का कहना है कि शराब की बिक्री बढ़ाने वाले राजस्व जुटाने के मॉडल से लोगों की सेहत और महिलाओं की स्थिति पर असर पड़ता है क्योंकि ज्यादातर समाज अब भी सामंती प्रवृति का है. आरा के डेयरी ओमप्रकाश कहते हैं कि कुशल और अर्द्धकुशल नौजवानों के लिए रोजगार का अभाव है क्योंकि राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी, अफसरशाही की जकडऩ और भ्रष्टाचार की वजह से बड़े या लघु उद्योग लग ही नहीं पाए हैं. वे कहते हैं, “इससे खासकर ग्रामीण युवकों में निराशा पैदा हो रही है. वे खेती या मेहनत का काम नहीं करना चाहते. ऐसे अनेक लोग गांव के प्रशासन से मिलकर कल्याणकारी योजनाओं का पैसा उठा लेते हैं और उसे शराब पर लुटा देते हैं.”
भारत के रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय और जनसंख्या आयुक्त के जनगणना कार्यक्रम के तहत किए गए नवीनतम सालाना स्वास्थ्य सर्वे (एएचएस) में कहा गया है कि बिहार में 9.5 फीसदी वयस्क (15 वर्ष से ऊपर) शराब का सेवन करते हैं. इनमें से 9.8 फीसदी ग्रामीण आबादी और 8 फीसदी शहरी हैं. इसके और वर्गीकरण में बताया गया है कि राज्य के सभी पुरुषों में से 18.1 फीसदी लोग शराब का सेवन करते हैं, जबकि महिलाओं का केवल 0.7 फीसदी हिस्सा ही शराब का सेवन करता है. इन आंकड़ों के अनुसार देखें तो बिहार में करीब एक करोड़ लोग शराब पीते हैं. वैसे तो, नीतीश अपने राजनैतिक गुरु कर्पूरी ठाकुर की बराबरी नहीं कर सकते, जिन्होंने 1977 में मुख्यमंत्री रहने के दौरान शराब पर रोक लगा दी थी, लेकिन बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री ने उन स्व-सहायता समूहों को एक लाख रु. का इनाम देने की घोषणा की है जो किसी गांव को शराब मुक्त करने में सफल होंगे.
हर तबका परेशान
यह विरोधाभास ही है कि एक ओर जहां महिलाओं के सशक्तिकरण के नए-नए उपायों से संबंधित गतिविधियों को तेज करने पर बल दिया जा रहा है वहीं दूसरी ओर महिला घरेलू हिंसा एवं अपराध को बढावा देने में मददगार नयी आबकारी नीति को भी प्राथमिकता दी जा रही है। एक तरफ बाहुबलियों के अपराध पर नकेल डालने की कोशिश हुइ तो दूसरी तरफ प्रदेश के गांवो में शराब पीने बालों की नयी फौज तैयार हो रही है । शराब के दुकानों से होकर महिलाओं या स्कूल की छात्राओं का गुजरना दूभर हो गया है। अब तो प्रदेश के कई इलाकों के बस अड्डों, सडक मार्ग, तथा अन्य भीड भाड वाले इलाकों में दिन ढलते ही सरेआम शराब की बिक्री की जाती है। चलते-फिरते विक्रेता हॉकर की तरह शराब के पाउच, थैला आदि लिये रहते है। फेरी वाले शराब के पाउच से भरे बोरे अपने साईकिल पर टांगकर खेतों तक पहुंच जाते है। खेतों में काम कर रहे खेत मजदूर काम छोडकर खेतों के मेड पर ही सो जाते हैं। बिहार के कई ग्रामीण इलाकों का यही हाल है।
अब ग्रामीणों को निकट के बाजार में जाने के बजाय गांव में पर्याप्त शराब मिल जाया करती है। शराब के अड्डों या शराब निर्माण वाले गांवों की महिलाएं अपने खेत, खलिहान एवं टोले में खुद को असुरक्षित समझती है। गांवों में पिछले तीन वर्षों में मदिरा पीने को लेकर अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। ग्रामीणों के अनुसार गांवों में शराब बेचे जाने से गांव का माहौल खराब हो रहा है। गांव में अशांति फैल रही है। बेवजह तनाव बढ रहा है। नयी नीति के अनुसार 13 हजार 5 सौ की आबादी पर एक शराब की दुकान खोले जाने है।
जिस प्रदेश के गांवों में भुखमरी की पदचाप सुनाई पड रही हो वहां शराब आवाम के जीवन शैली का हिस्सा कैसे हो सकता है।  यह अलग बात है कि भुखमरी की खबरें अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री बार-बार केन्द्र से विषेश राज्य का दर्जा हासिल करते हुए एक करोड पैंतालिस लाख परिवारों के लिए खाद्यान्न की मांग करते रहे है । इस तरह प्रदेश में कुल गरीब लोंगों की संख्या सात करोड पचीस लाख हो जाती है । बिहार की तकरीबन ग्यारह करोड लोगों में लगभग छियासठ प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे रहने बाले लोगों के लिए शराब के बजाय रोजी-रोटी का प्रबंध समीचीन होता, लेकिन इन बातों से मानो सरकार को कोई सरोकार  नहीं रह गया हैं ।
बिहार में जब अनेक सामाजिक व राजनैतिक संगठनों ने एक स्वर से बेतहाशा बढ रहे शराब की दुकानों के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया तो मजबूरन बिहार सरकार को शिक्षण संस्थानों एवं मंदिर मस्जिद आदि के आसपास शराब की दुकानों को हटाने का निर्णय लेना पडा, लेकिन सरकार के इस नकली प्रयास से लोगों की  नाराजगी दूर नहीं हुई है, क्योंकि सरकार की इस घोषणा से आबकारी नीति की सेहत पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पडने बाला है, इससे न तो अवैध शराब के निर्माण पर रोक लगने वाली है और न ही ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की दुकानों की संख्या में कमी। जनहित के प्रतिकूल होने के बावजूद यदि इस नीति को तवज्जो दी जा रही है तो इसके पीछे  मुख्यतः भारी राजस्व की प्राप्ति होना  है। इस संदर्भ में तेजी से विकास के लिए चर्चित बिहार अन्य राज्यों से अलग नहीं है। सवाल यह  है कि महज राजस्व में वृद्धि लिए समाज पर पडने बाले बुरे परिणामों की अनदेखी कैसे की जा सकती है।

नई दिल्ली के थिंक टैंक नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) के वरिष्ठ फेलो कन्हैया सिंह कहते हैं कि ऊंचे आबकारी शुल्क और लाइसेंस फीस से खासकर देसी शराब के मामले में मिलावट और कालाबाजारी बढ़ सकती है.आरा के सामाजिक कार्यकर्ता बी के मिश्रा कहते हैं कि लाइसेंस फीस और शराब की कीमत बढ़ाकर सरकार यह धारणा बनाने की कोशिश कर रही है कि इससे शराब की खपत कम होगी लेकिन वह दुकानों के अतिरिक्त लाइसेंस भी तो जारी कर रही है. वे कहते हैं, “हमें इस पेंच को समझना होगा.” कुछ जानकारों का मानना है कि आबकारी से मिलने वाले राजस्व को बुराई का धन मानना चाहिए इसलिए शराब पर टैक्स बढ़ाना कोई गलत नहीं है.”
सूबे की प्रगती में जमकर शराबखोरी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। शराब से राजस्व उगाही कर विकास में लगाये जा रहे हैं। विकास यूँ हो रहा है कि बिहार सड़क पर धूत नजर आता है। चाहे कुछ हो ना हो सरकारी झोली भरती रहेगी। चिंता तो बस इसी बात की है- “ बिहार की श्रमशक्ति, बिहारी अस्मिता और बिहार के चरित्र का क्या होगा।“