शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

भरता खजाना और गिरता चरित्र

खजाने की कीमत
  बिहार में बढती पियक्कड़ों की फौज और सरकार का रवैया
हंगामा है क्यूँ बरपा ,
थोडी सी जो पी ली है!
मधुशाला , मधुशाला, मधुशाला,........।
कुछ इसी तरह बडबडाते हुए नकुल अपनी डेहरी की तरफ चला जा रहा था। मानसिक चेतना को भूलकर तथा सामाजिक मूल्यों को ताक पर रखकर रास्ते में जो मिलता उसे गालियाँ बक रहा था। लोग उसकी गालियों की परवाह किये बगैर खुद को बचाकर निकल जाते। चौराहे पर खुली शराब की दुकान से शराब पीकर लौटते नकुल मानों भूल सा गया था कि उसका एक भरापूरा परिवार भी है। वह बेसुध होकर शराब के नशे मे धूत बस चला जा रहा था। इस बात से बेखबर की उसकी पत्नी और बच्चे शाम को उसकी बाट जोह रहे होंगे।  
अब तो आदत सी हो गई है। आप कभी भी हमारे घर आओ ये इसी हाल में मिलेंगे। बच्चों के साथ भी इनका रवैया ऐसा ही रहता है। आज पाँच दिन से राशन वाला पैसे के लिए टोक रहा है। आटा-दाल नहीं है पर किस मुँह से लेने जाऊँ। बच्चों की स्कूल फीस भी देनी है। स्कूल से दो बार नोटीस आ चुका है। ये इसी तरह पड़े रहते है। जब नशा उतरता है फिर से पैसों के लिए गालियाँ बकने लगते हैं। मना करने पर मारपीट करने लगते हैं। अपने माथे की पल्लु संभालती व्यथा और शर्म का भाव लिए नकुल की पत्नी अपने घर का हाल का सुना रही थी। मैं तो बस उनके घर का हाल चाल जानने गया था। मुझे क्या मालुम कि बचपन में मेरे सबसे प्रिय मित्र रहे नकुल के घर का यह हाल होगा।
यह हाल केवल नकुल के घर का नहीं है। उस पूरे टोले की कहानी ऐसी ही है। कोई ऐसा परिवार अछुता नहीं है जिसमें कि एक शराबी नहीं हो। इस कस्बे की औरतें मजदूरी और नौकरानी का काम कर किसी तरह परिवार का पेट पालती हैँ। मर्दों ने अपने जिम्मे बस घर मे पड़े रह कर शराब पीने का काम ले रखा है। शायद यह उसी मनुवादी सोच का नतीजा है। जिसमे आज भी औरतों को पुरुषों से सवाल करने मे भी मुश्किल का सामना करना पडता है।
श्रमशक्ति में गिरावट और शराबखोरी का बढता दायरा
"काम के लिए कोई मिलता कहाँ हैं, जितने मजदूर थे अब शराब और जुए के लत के इस कदर शिकार हुए हैं कि या तो कोई कम करने नहीं आता यी फिर उनसे काम नहीं हो पाता." बिहार के भोजपूर जिले के हार्डवेयर पार्ट्स के व्यवसायी रामनारायण जी ये कहते हुए रुक जाते हैं. माथे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही थीं. खुद ही ग्राहकों को संभालते और मेरे सवालों का जवाब देते हुए कहते हैं " आने वाले दिनों मे कोई नहीं मिलेगा काम करने के लिए, राम जाने कैसे चलेगा हमारा धंधा". उनकी शिकायत है कि पिछले कुछ साल में इस इलाके में मेहनत-मजूरी करने वाले नहीं मिलते. लेकिन ऐसा क्यों हुआ? वे इसके लिए राज्य सरकार को दोषी मानते हैं और कहते हैं, “लोग बहुत ज्यादा पीने लगे हैं. 2006 तक इस इलाके की 16 पंचायतों में शराब की सिर्फ एक दुकान थी, अब पांच दुकानें हैं. राज्य सरकार ने शराब की खरीदारी आसान कर दी है.” 
शराब की दुकानें सिर्फ भोजपूर जिले में ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य में बहुतायत में खुल गई हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2002-03 में बिहार में शराब की दुकानों की संख्या 3,095 थी जो 2013-14 तक बढ़कर 5,467 तक पहुंच गई. यानी पिछले 10 वित्त वर्ष में 2,372 नई दुकानें खुली हैं जो चौंकाने वाला औसत दिखाता है—बिहार में हर दूसरे दिन शराब की एक नई दुकान खुली है. सबसे ज्यादा शराब की दुकानें ग्रामीण इलाकों में बढ़ी हैं. वहां 2006-07 में इनकी संख्या 779 से तीन गुनी बढ़कर 2,360 हो गई है. शराब की बिक्री तो इससे भी तेजी से बढ़ी है. देसी शराब की खपत चार गुना बढ़ गई है जबकि देश में निर्मित विदेशी शराब (आइएमएफएल) की बिक्री पांच गुना और बियर की खपत 11 गुना से अधिक बढ़ गई है.
नई आबकारी नीति के बाद की तस्वीर 
राज्य सरकार की आबकारी नीति तब बदली जब नीतीश कुमार ने जेडी (यू) और बीजेपी गठबंधन के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. सरकार ने राजस्व में इजाफे के लिए शराब की दुकानों के लिए लाइसेंस फीस बढ़ाकर अतिरिक्त दुकानें खोलने की इजाजत दी. बिहार में औद्योगीकरण काफी कम है, उसके लिए एक्साइज ड्यूटी का महत्व हरियाणा जैसे भारी औद्योगीकरण वाले राज्य से अलग है.
बात शराब पीकर मरने की हो या फिर अनाज के बगैर हो, दोनों ही सूरत में मरते तो समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति ही है। इन गरीबों के लिए जरूरत सामाजिक व आर्थिक विकास की है। शराबखोरी से किसी भी व्यक्ति का सामाजिक व आर्थिक विकास  नहीं होता है, हां राज्य के खजाने जरूर भर जाते है। महिला संगठनों के अनुसार महिला एवं बच्चों के उपर चौतरफा दुष्प्रभाव पड रहा है। शराबखोरी के प्रचलन से सबसे अधिक महिलाओं को ही जूझना पडता है। जाहिर है शराबियों का कहर सबसे पहले अपनी पत्नियों के उपर ही तो टूटता है। शराब के नशे में पति, पत्नी को पीटता है। उसे होश ही नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है। कई बार नशे की हालत में ही दुर्घटना हो जाती है और परिवार बिखर जाता है। इस तरह तो सरकार समाज के सबसे पिछडे समुदाय की सामाजिक-आर्थिक रूप से सर्वाधिक पिछडी समझी जाने वाली महिलाओं का ही आर्थिक नुकसान कर रही है जिसने अमन चैन और खुशहाली के लिए प्रचंड बहुमत से नीतिश कुमार की सरकार को दुबारा सत्ता में लाया। शराबखोरी का सबसे अधिक दुष्प्रभाव भी उन्हीं लोगों पर पड रहा है जो किसी तरह मनरेगा से सौ-पचास रूपये कमाकर घर लौटता है, लेकिन घर पहुंचने के पहले  वह देशी शराब से अपने गले को तर कर लेता है। बीबी-बच्चों के लिए रोजमर्रे की चीजों के प्रबंध करने के बजाय वह खाली हाथ घर मदहोश होकर लौटता है।
अब राज्य सरकार शराब की दुकानें लॉटरी के जरिए आवंटित करती है. लॉटरी के बिना कोई लाइसेंस नहीं दिया जाता है. किसी इलाके में दो-तीन दुकानों के लिए समूह में लाइसेंस दिया जाता है जिसमें विदेशी और देसी दोनों तरह की शराब की बिक्री जरूरी है. लाइसेंस फीस भी काफी है. बक्सर के शराब दुकानदार कहते हैं कि वे अपनी दो देसी शराब और एक विदेशी शराब की दुकान के लिए हर महीने 8.45 लाख रु. लाइसेंस फीस देते हैं. नाम न छापने की शर्त पर पटना के रेस्तरां मालिक कहते हैं कि अप्रैल, 2013 में सरकार ने बार के लिए वार्षिक लाइसेंस फीस 5 लाख रु. से बढ़ाकर 17 लाख रु. कर दी तो मैंने बार खोलने की योजना टाल दी. वे कहते हैं, “रेस्तरां के लिए कई तरह के टैक्स अदा करने के अलावा मैं इतनी बिक्री नहीं बढ़ा पाऊंगा कि इतनी रकम और अदा कर पाऊं.”
शराब की बिक्री से राज्य के खजाने में पैसा जरूर आ रहा है लेकिन सरकार को सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों की आलोचना का भी शिकार होना पड़ा है. आलोचकों का कहना है कि शराब की बिक्री बढ़ाने वाले राजस्व जुटाने के मॉडल से लोगों की सेहत और महिलाओं की स्थिति पर असर पड़ता है क्योंकि ज्यादातर समाज अब भी सामंती प्रवृति का है. आरा के डेयरी ओमप्रकाश कहते हैं कि कुशल और अर्द्धकुशल नौजवानों के लिए रोजगार का अभाव है क्योंकि राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी, अफसरशाही की जकडऩ और भ्रष्टाचार की वजह से बड़े या लघु उद्योग लग ही नहीं पाए हैं. वे कहते हैं, “इससे खासकर ग्रामीण युवकों में निराशा पैदा हो रही है. वे खेती या मेहनत का काम नहीं करना चाहते. ऐसे अनेक लोग गांव के प्रशासन से मिलकर कल्याणकारी योजनाओं का पैसा उठा लेते हैं और उसे शराब पर लुटा देते हैं.”
भारत के रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय और जनसंख्या आयुक्त के जनगणना कार्यक्रम के तहत किए गए नवीनतम सालाना स्वास्थ्य सर्वे (एएचएस) में कहा गया है कि बिहार में 9.5 फीसदी वयस्क (15 वर्ष से ऊपर) शराब का सेवन करते हैं. इनमें से 9.8 फीसदी ग्रामीण आबादी और 8 फीसदी शहरी हैं. इसके और वर्गीकरण में बताया गया है कि राज्य के सभी पुरुषों में से 18.1 फीसदी लोग शराब का सेवन करते हैं, जबकि महिलाओं का केवल 0.7 फीसदी हिस्सा ही शराब का सेवन करता है. इन आंकड़ों के अनुसार देखें तो बिहार में करीब एक करोड़ लोग शराब पीते हैं. वैसे तो, नीतीश अपने राजनैतिक गुरु कर्पूरी ठाकुर की बराबरी नहीं कर सकते, जिन्होंने 1977 में मुख्यमंत्री रहने के दौरान शराब पर रोक लगा दी थी, लेकिन बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री ने उन स्व-सहायता समूहों को एक लाख रु. का इनाम देने की घोषणा की है जो किसी गांव को शराब मुक्त करने में सफल होंगे.
हर तबका परेशान
यह विरोधाभास ही है कि एक ओर जहां महिलाओं के सशक्तिकरण के नए-नए उपायों से संबंधित गतिविधियों को तेज करने पर बल दिया जा रहा है वहीं दूसरी ओर महिला घरेलू हिंसा एवं अपराध को बढावा देने में मददगार नयी आबकारी नीति को भी प्राथमिकता दी जा रही है। एक तरफ बाहुबलियों के अपराध पर नकेल डालने की कोशिश हुइ तो दूसरी तरफ प्रदेश के गांवो में शराब पीने बालों की नयी फौज तैयार हो रही है । शराब के दुकानों से होकर महिलाओं या स्कूल की छात्राओं का गुजरना दूभर हो गया है। अब तो प्रदेश के कई इलाकों के बस अड्डों, सडक मार्ग, तथा अन्य भीड भाड वाले इलाकों में दिन ढलते ही सरेआम शराब की बिक्री की जाती है। चलते-फिरते विक्रेता हॉकर की तरह शराब के पाउच, थैला आदि लिये रहते है। फेरी वाले शराब के पाउच से भरे बोरे अपने साईकिल पर टांगकर खेतों तक पहुंच जाते है। खेतों में काम कर रहे खेत मजदूर काम छोडकर खेतों के मेड पर ही सो जाते हैं। बिहार के कई ग्रामीण इलाकों का यही हाल है।
अब ग्रामीणों को निकट के बाजार में जाने के बजाय गांव में पर्याप्त शराब मिल जाया करती है। शराब के अड्डों या शराब निर्माण वाले गांवों की महिलाएं अपने खेत, खलिहान एवं टोले में खुद को असुरक्षित समझती है। गांवों में पिछले तीन वर्षों में मदिरा पीने को लेकर अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। ग्रामीणों के अनुसार गांवों में शराब बेचे जाने से गांव का माहौल खराब हो रहा है। गांव में अशांति फैल रही है। बेवजह तनाव बढ रहा है। नयी नीति के अनुसार 13 हजार 5 सौ की आबादी पर एक शराब की दुकान खोले जाने है।
जिस प्रदेश के गांवों में भुखमरी की पदचाप सुनाई पड रही हो वहां शराब आवाम के जीवन शैली का हिस्सा कैसे हो सकता है।  यह अलग बात है कि भुखमरी की खबरें अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री बार-बार केन्द्र से विषेश राज्य का दर्जा हासिल करते हुए एक करोड पैंतालिस लाख परिवारों के लिए खाद्यान्न की मांग करते रहे है । इस तरह प्रदेश में कुल गरीब लोंगों की संख्या सात करोड पचीस लाख हो जाती है । बिहार की तकरीबन ग्यारह करोड लोगों में लगभग छियासठ प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे रहने बाले लोगों के लिए शराब के बजाय रोजी-रोटी का प्रबंध समीचीन होता, लेकिन इन बातों से मानो सरकार को कोई सरोकार  नहीं रह गया हैं ।
बिहार में जब अनेक सामाजिक व राजनैतिक संगठनों ने एक स्वर से बेतहाशा बढ रहे शराब की दुकानों के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया तो मजबूरन बिहार सरकार को शिक्षण संस्थानों एवं मंदिर मस्जिद आदि के आसपास शराब की दुकानों को हटाने का निर्णय लेना पडा, लेकिन सरकार के इस नकली प्रयास से लोगों की  नाराजगी दूर नहीं हुई है, क्योंकि सरकार की इस घोषणा से आबकारी नीति की सेहत पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पडने बाला है, इससे न तो अवैध शराब के निर्माण पर रोक लगने वाली है और न ही ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की दुकानों की संख्या में कमी। जनहित के प्रतिकूल होने के बावजूद यदि इस नीति को तवज्जो दी जा रही है तो इसके पीछे  मुख्यतः भारी राजस्व की प्राप्ति होना  है। इस संदर्भ में तेजी से विकास के लिए चर्चित बिहार अन्य राज्यों से अलग नहीं है। सवाल यह  है कि महज राजस्व में वृद्धि लिए समाज पर पडने बाले बुरे परिणामों की अनदेखी कैसे की जा सकती है।

नई दिल्ली के थिंक टैंक नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) के वरिष्ठ फेलो कन्हैया सिंह कहते हैं कि ऊंचे आबकारी शुल्क और लाइसेंस फीस से खासकर देसी शराब के मामले में मिलावट और कालाबाजारी बढ़ सकती है.आरा के सामाजिक कार्यकर्ता बी के मिश्रा कहते हैं कि लाइसेंस फीस और शराब की कीमत बढ़ाकर सरकार यह धारणा बनाने की कोशिश कर रही है कि इससे शराब की खपत कम होगी लेकिन वह दुकानों के अतिरिक्त लाइसेंस भी तो जारी कर रही है. वे कहते हैं, “हमें इस पेंच को समझना होगा.” कुछ जानकारों का मानना है कि आबकारी से मिलने वाले राजस्व को बुराई का धन मानना चाहिए इसलिए शराब पर टैक्स बढ़ाना कोई गलत नहीं है.”
सूबे की प्रगती में जमकर शराबखोरी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। शराब से राजस्व उगाही कर विकास में लगाये जा रहे हैं। विकास यूँ हो रहा है कि बिहार सड़क पर धूत नजर आता है। चाहे कुछ हो ना हो सरकारी झोली भरती रहेगी। चिंता तो बस इसी बात की है- “ बिहार की श्रमशक्ति, बिहारी अस्मिता और बिहार के चरित्र का क्या होगा।“

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