विश्व के इतिहास में ' शासन की नीति ' की गूढ परिभाषाएँ शासनाधीन व्यक्तियों के लिए बहुत हद तक या फिर कहें कि अभी तक एक अबूझ पहेली बनी हुई है. कैसे ओर किस प्रकार शासन होना चाहिए ये किस पर निर्भर करता है? शासन करने वालों पर या शासित होने वालों पर? लोकतंत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि शासित ही अपने शासक का चुनाव कर उसे यह अधिकार प्रदान करता है कि वो शासन की ऐसी प्रक्रिया लागु करे जो कि शासित के हितों की पुर्ती करता हो. अब शासक की अपनी जिम्मेदारी होती है और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वो अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन सही ढंग से करे. लोकतंत्र से इतर शासन की ये परिभाषा कोई मायने नहीं रखती. फिर तो आप बस शासन किजिए , लेकिन कैसे और किसके लिए ये शासक के व्यक्तित्व पर उसके कर्मों पर निर्भर करता है.
परिभाषाएँ और सिद्धान्त प्राय: किताबों , भाषणों और शासक बनने की गुहार लगाने की कडी़ के रुप में ज्यादा सार्थक प्रतीत होती हैं. व्यवहार से इनका कितना नाता है इतिहास इस बात का साक्षात् गवाह है. अब तो हम परिभाषाओं को भुलने लगे हैं. अब परिभाषाएँ महज इतिहास को इंगित करने के लिए प्रयोग में लायी जाती हैं. क्या शासन की परिभाषा इतिहास को इंगित करती है क्या? आपको जवाब शायद नहीं मे ही मिलेगा. ऐसा कोई शासक हुआ है क्या जिसने इन परिभाषाओं को अपने शासन व्यवहार में उतारा हो? अभी तक ऐसा शासन इतिहास में वर्णित है क्या जिसने शासन सिद्धान्तों का पालन किया हो? राम राज्य को मत गिनाइएगा. हम २१वीं शताब्दी में जी रहे हैं. कुछ बातें पुराणों व धर्मग्रंथों में ज्यादा सटीक बैठती हैं. नहीं मिलेगा कोई ऐसा शासक या शासन जो इन परिभाषाओं और सिद्धांतों के अनुरुप हों.
यक्ष प्रश्न यह है कि कौन और कैसे शासन की नीति का निर्धारण करेगा? क्या आम जनता (शासित) या फिर शासक? शासितों से क्या यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे शासन की नीति का निर्धारण कर स्वयं उस नीति का अनुसरण करे? ये मुश्किल प्रतीत होता है. दैनंदिन कार्यों व आदतों से यह साफ झलकता है कि ऐसा बिरले ही कर पाते हैं। तो क्या अब शासक के उपर छोड देना चाहिए कि शासन की नीतियों का निर्माण कर स्वयं शासन करे? ऐसा करना शासित के लिए आत्मघाती हो सकता है। फिर तो शासक की मनमर्जियाँ और शासित की सिसकियाँ ही देखने को मिलेंगी।
हाल के दिनों में पूरे विश्व मे शासक और शासित के मध्य ठन सी गई है। मुद्दा केवल यही एक है कि 'शासन की नीति' क्या हो? इतिहास का जिक्र करें तो रुस,चीन, फ्रांस और भारत भी इस मुद्दे पर आंदोलन, क्रान्ति और रक्तपात झेल चुके हैं। गांधी के स्वराज की संकल्पना से लेकर मार्क्स के सर्वहारा वर्ग तथा रुस की बोल्शेविक क्रांति इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। इससे यह साफ जाहिर होता है कि शासक और शासित के बीच ये लडाई प्रासंगिक तो है ही साथ ही हमें यह भी सोचने को विवश करती है कि हम किसका पक्ष लें? हम शासक बनना चाहते हैं या शासित?
जरुरी यह है कि एक सामंजस्य स्थापित किया जाए। एक ऐसी व्यवस्था जिसमे शासन की नीति के मायने शासक और शासित दोनों के लिए समान हों। शासक बनने की तमन्ना शासित के लिए तो होनी ही चाहिए साथ-साथ शासित बनने का कलेजा शासक को भी जुटाना पडेगा। नागार्जुन की की कविता ' शासन की बंदूक ' की ये पंक्तियाँ शासक और शासित को बीच के टकराव को स्पष्ट करती हैं-
' खडी हो गई चाँपकर कंकालों की हुक
नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ तहाँ दगने लगी शासन की बंदुक '
ऐसा लगता नहीं है कि ये टकराव आने वाले दिनों में खत्म होने वाला है। इतिहास स्वयं को दुहराता है ये सार्वभौम है। हमें बस इतिहास से सबक लेने की जरुरत है। ये मानकर चलिए यदि आप काबिल हैं तो शासक की गद्दी आपका इंतजार कर रही है और या फिर ऐ शासक शासित होने के लिए तैयार हो जाओ। बस ' शासन की नीति ' का खयाल रखा जाए ताकि कोई शोषित नहीं हो।
नीरज प्रियदर्शी
परिभाषाएँ और सिद्धान्त प्राय: किताबों , भाषणों और शासक बनने की गुहार लगाने की कडी़ के रुप में ज्यादा सार्थक प्रतीत होती हैं. व्यवहार से इनका कितना नाता है इतिहास इस बात का साक्षात् गवाह है. अब तो हम परिभाषाओं को भुलने लगे हैं. अब परिभाषाएँ महज इतिहास को इंगित करने के लिए प्रयोग में लायी जाती हैं. क्या शासन की परिभाषा इतिहास को इंगित करती है क्या? आपको जवाब शायद नहीं मे ही मिलेगा. ऐसा कोई शासक हुआ है क्या जिसने इन परिभाषाओं को अपने शासन व्यवहार में उतारा हो? अभी तक ऐसा शासन इतिहास में वर्णित है क्या जिसने शासन सिद्धान्तों का पालन किया हो? राम राज्य को मत गिनाइएगा. हम २१वीं शताब्दी में जी रहे हैं. कुछ बातें पुराणों व धर्मग्रंथों में ज्यादा सटीक बैठती हैं. नहीं मिलेगा कोई ऐसा शासक या शासन जो इन परिभाषाओं और सिद्धांतों के अनुरुप हों.
यक्ष प्रश्न यह है कि कौन और कैसे शासन की नीति का निर्धारण करेगा? क्या आम जनता (शासित) या फिर शासक? शासितों से क्या यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे शासन की नीति का निर्धारण कर स्वयं उस नीति का अनुसरण करे? ये मुश्किल प्रतीत होता है. दैनंदिन कार्यों व आदतों से यह साफ झलकता है कि ऐसा बिरले ही कर पाते हैं। तो क्या अब शासक के उपर छोड देना चाहिए कि शासन की नीतियों का निर्माण कर स्वयं शासन करे? ऐसा करना शासित के लिए आत्मघाती हो सकता है। फिर तो शासक की मनमर्जियाँ और शासित की सिसकियाँ ही देखने को मिलेंगी।
हाल के दिनों में पूरे विश्व मे शासक और शासित के मध्य ठन सी गई है। मुद्दा केवल यही एक है कि 'शासन की नीति' क्या हो? इतिहास का जिक्र करें तो रुस,चीन, फ्रांस और भारत भी इस मुद्दे पर आंदोलन, क्रान्ति और रक्तपात झेल चुके हैं। गांधी के स्वराज की संकल्पना से लेकर मार्क्स के सर्वहारा वर्ग तथा रुस की बोल्शेविक क्रांति इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। इससे यह साफ जाहिर होता है कि शासक और शासित के बीच ये लडाई प्रासंगिक तो है ही साथ ही हमें यह भी सोचने को विवश करती है कि हम किसका पक्ष लें? हम शासक बनना चाहते हैं या शासित?
जरुरी यह है कि एक सामंजस्य स्थापित किया जाए। एक ऐसी व्यवस्था जिसमे शासन की नीति के मायने शासक और शासित दोनों के लिए समान हों। शासक बनने की तमन्ना शासित के लिए तो होनी ही चाहिए साथ-साथ शासित बनने का कलेजा शासक को भी जुटाना पडेगा। नागार्जुन की की कविता ' शासन की बंदूक ' की ये पंक्तियाँ शासक और शासित को बीच के टकराव को स्पष्ट करती हैं-
' खडी हो गई चाँपकर कंकालों की हुक
नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ तहाँ दगने लगी शासन की बंदुक '
ऐसा लगता नहीं है कि ये टकराव आने वाले दिनों में खत्म होने वाला है। इतिहास स्वयं को दुहराता है ये सार्वभौम है। हमें बस इतिहास से सबक लेने की जरुरत है। ये मानकर चलिए यदि आप काबिल हैं तो शासक की गद्दी आपका इंतजार कर रही है और या फिर ऐ शासक शासित होने के लिए तैयार हो जाओ। बस ' शासन की नीति ' का खयाल रखा जाए ताकि कोई शोषित नहीं हो।
नीरज प्रियदर्शी
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