रविवार, 7 दिसंबर 2014

हम ऐसे हैं..

Attention के लिए आभार. खुशी हो रही है कि हमारी भी बातों को so called elite class वाले लोगseriously लेते हैं.
क्या है न कि हमलोग दिखावे में भरोसा नहीं करते है. हमारा एक संस्कार भी है जो हमे अलग करता है आपसे भी और इनसे भी. हमजहाँ का खाते हैं उसका कर्ज चुकाते हैं. हम जिसकी गोद मे खुशी महसूस करते हैं उसे पुजते हैं. हम घड़ियाली आँसू नहीं बहाते हैं हम दर्द को जीते हैं. अपनी पैदाइश को गलियाते नही हैं उसकी अराधना करते हैं.हम गुरु को अराध्य मानते हैं. विवेकानन्द और रामकृष्ण को तो जानते ही होगे.
पहले अपनी संस्कृति का मान करते हैं बाद में सबकी खबर लेते हैं. हम फिर से सिरमौर बनने का सपना देखते हैं. अपनी गिरेबान को चमका कर चलने का मजा ही कुछ और है.दुसरों की नकल क्यूं करें जबकि अपनी विरासत इतनी शानदार है.आधुनिकता हमे भी पसंद है पर अपने मुल्यों की कीमत पर नहीं. हम आधुनिकता का भौंडा प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं.गुरु हमारे लिए सर्वोच्च संस्था है. हमारी परंपरा है. मार्क्स औऱ गांधी से भी बढकर. लेनीन और नेहरु से भी आगे.
अब आप नाचिए या गाइए , हम रोकने नहीं जाएंगे. बस आपको अहसास कराना हमारा काम है. लगता है हो गया. लहर तो अब चल पड़ी है.
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
                   साभार - रामधारी सिंह दिनकर.
ऐसे होते हैं पत्रकार जो कि गलत बयानी के बाद विवादित होने पर पर भाग खडे होते हैं. हम तो नहीं डरने वाले हैं. हम माल्वे सर की बातों को चरितार्थ करने का सपना संजोए हैं. आइए बातों से जवाब दीजिए. आपकी बात सुनी जाएगी. पर इस तरह पत्रकारिता कैसे कीजिएगा. सोचिए सोचिए...

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