मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

सबक लेने की जरुरत

पिछले एक दशक के दरम्यान बिहार के सारण जिले में चार दारोगा अपराधियों के शिकार हुए हैं. बिहार में सड़कें बदली, शिक्षा व्यवस्था मे सुधार हुए, बिजली पानी की समस्या से भी कुछ हद तक निजात मिला है. बस एक चीज नहीं बदली इन बीते दिनों में तो वो है राज्य का पुलिस प्रशासन और राज्य की पुलिस को मिलने वाली सुविधाएं. ताजा मामले में कुछ सशस्त्र अपराधियों ने छपरा जिले के इसुआपुर थाने के प्रभारी की हत्या कर दी है. 2009 बैच के दारोगा संजय कुमार तिवारी उस वक्त मौत के शिकार बने जब वे पूरी इमानदारी के साथ ड्यूटी कर रहे थे. एक नागरिक के पैसों की हिफाजत और बैंक को लूटने से बचाने के क्रम में उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी.
              सवाल है कि एक इमानदार और कर्तव्यनिष्ठ दारोगा को किस गलती की ऐसी निर्मम सजा मिली? क्या उसकी गलती थी जो वह पूरी निष्ठा और जंबाजी के साथ अपना काम कर रहा था? आखिर क्यूं जब एक अफसर अदम्य साहस और काम के प्रति अप्रतिम निष्ठा का परिचय देता है तब उसके पर कुचल दिए जाते हैं? कभी कृष्णा सिंह के रुप में तो कभी तिवारी के रुप में जब कभ किसी दारोगा ने हिम्मत दिखायी है उसकी हत्या कर दी गई है. क्या इससे बाकी अफसरों के हिम्मत और बहादूरी पर फर्क नहीं पड़ता? ऐसे कृत्यों का एक ही मकसद मालूम पड़ता है कुछ गिने चूने बहादूर अफसरों को हतोत्साहित कर उनके फौलादी इरादों को गिराना. अखबारी रपटों एवम् साथी अफसरों की मानें तो तिवारी आधूनिक ढंग से अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए जाने जाते थे. वो व्हाट्सएप्प के जरिए साथियों से संपर्क बनाकर सूत्रबद्ध तरीके से कार्रवायी करते थे. तब क्या ज्यादा आधूनिक बनना ही तिवारी के हत्या का कारण है?
             राज्य की पुलिस व्यवस्था की बात करें तो वह जर्जर रुप में दिखायी पड़ती है. बेहतर प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरणों/शस्त्रों के अभाव में खोखली क्षमता की परिचायक हैं. जर्जर पड़ी गाडियां, पूराने हथियारों से लैस होकर छापेमारी करने का वर्षों पूराना ढ़ंग कैसे किसी अभियान को सफल बना सकता हैं. पुलिस की गाड़ियों की बात करें तो कब उनका इंजन सीज हो जाए कहा नहीं जा सकता. ऐसे में तो किसी निजी वाहन का सहारा लेना पड़ता है या फिर दबे पांव वापस आना पड़ता है. हथियार नमूने मालूम पड़ते हैं . रिवाल्वर और राइफल से कब गोलियां निकलेंगी ये गोली चलाने वाला भी नहीं बता सकता. कभी किस्मत अच्छी रही तो गोली चल जाएगी अन्यथा अटक जाने का खतरा है. ऐसे हाथियारों के बल पर अपराधी को मारना तो दूर खुद की सुरक्षा संदिग्ध है. छापेमारी की वही पूरानी तकनीक अब भी कायम है जिसे अपराधी भी बखूबी जानता है. अपराधी को यह पहले ही पता रहता है कि पुलिस किस ओर से आएगी, किन किन साजो सामानों के साथ आएगी और और तरीका क्या होगा.  इस तरह या तो अपराधी पहले ही फरार हो जाएगा या फिर अपना ठिकाना बदल लेगा.
             विगत दशकों में पूलिस व्यवस्था मे सुधार से संबंधित कई आयोगों और समितियों का गठन किया गया. दर्जनों रिपोर्टें आयीं . पर असली मे क्या हुआ? आज वो रिपोर्टें न जाने कहां दफन हो गईं. अब कोई सूध लेने वाला नहीं है.  यदि कुछ वाकयी में हुआ है तो वह है मलाइदार पदों पर बैठे साहबों के शोहदों का ईजाफा और मन्त्रियों की सम्पति मे बढोतरी. कागजी कार्यवाहीयों और धूल फांकती रिपोर्टों की आड़ मे इन्होनें अपने रसूख का भरपूर ईस्तेमाल किया है. सारी योजनाएं कागजों में पूरी बतायी जाती हैं. धरातल पर उनका प्रतीक मात्र दिखायी देता है. कहीं पर नया वाहन तो है पर बाकी सामान नदारद है. किन्हीं अफसर को उन्नत प्रशिक्षण तो प्राप्त हे पर करने को कूछ नही है. वो ऐसी जगह तैनात हैं जहां बस किसी बड़े अधिकारी या मंत्री की तिमारदारी कर सकते हैं.
            इस पूरे तमाशे में सरकार की क्या भूमिका है ये सरकार भी कहने से कतराती है. इतना तो स्पष्ट है कि राज्य पुलिस व्यवस्था का प्रबंधन सरकार के पास ही है. पर हरेक मामले मे वह अपना पल्ला झाड़ते हुए क्यूं नजर आती है? जिम्मेदारी से क्यूं भागती है? क्या वह यह दिखाना चाहती है कि किसी भी कुप्रबंधन मे उसकी कोई भूमिका नहीं है? सरकार चाहे लाख छुपाने की कोशिश करे पर सभी जानते हैं कि वो कितनी जिम्मेदार है. कैसे किसी अच्छे अफसर का तबादला या तो किसी विरान जगह पर कर दिया जाता है या फिर किसी मंत्री की सूरक्षा मे. कई बार तो ऐसा भी होती है कि अफसर  की निष्ठा पर सवाल खड़े कर उसे लाईन हाजिर कर दिया जाता है. भ्रष्ट और चापलूसों को मनमर्जी तबादला मिलता है. योजनाओं की खानापूर्ती के लिए मनपसंद ठेके दिए जाते हैं. ज्यादा दाम देकर खराब माल की खरीदारी होती है. ऐसे उपकरण और साजो सामान पुलिस की सूरक्षा पर भारी पड़ते हैं. कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सरकार की भूमिका पुलिस की हतोत्साहित होने पर मजबूर करती हैं.
              समय रहते अगर सरकार और प्रशासन नहीं चेते तो निकट भविष्य में इससे भी भीषण परिणाम सामने आएंगे. तिवारी की तरह और जांबाज अफसर शहीद होंगे. किसी और सुहागन का सुहाग छीनेगा और फिर कोई मासूम के सर से पिता का साया हट जाएगा. प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो दूबारा कोई वीर अफसर हमारी और आपकी रक्षा करने नहीं आएगा. कुछ मिशालें डर बनकर मिट जाएंगी. इस शहादत से सीखने की जरुरत है. सरकार को अब जिम्मेदार होना होगा वरना ये पुलिस है . ये सरकार की भी सूरक्षा करती है.

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