रविवार, 21 दिसंबर 2014

पालने का सांप

           अपने घर को बर्बाद करने वाले को फाँसी! पड़ोसी के घर में तबाही मचाने वाले को संरक्षण! हत्यारा और  दहशतगर्द किसी भी सूरत में नापाक हरकत करेगा। ऐसा भी हो सकता है कि पड़ोसी के घर को लहुलूहान करने वाला  कल आपके भी घर को क्षत्-विक्षत् कर देगा। उसका कोई दोस्त नहीं होता और वो किसी का हमदर्द नहीं बन सकता। वो जब तक खुद को महफूज महसूस करेगा, जब तक आप उसे घर में पनाह देंगे तब तक ही  आपके साथ है, अन्यथा वो कभी भी आपका हितैषी नहीं है। जब कभी आपने उसकी ओर आँख तरेर कर देखा, उसने आपके  घर मे भी कत्लेआम मचाया। एक  बार नहीं हजारों बार। फिर भी ऐसा दोहरा रवैया  क्यूँ? एक जरा सी चाहत की खातीर आप कब तक अपने परिवार के साथ-साथ पड़ोसी का भी चैन छीनते रहेंगे।
        जिहाद और कोरे चाहत की आग में झुलस रहा पाकिस्तान स्वयं के पैरों पर कुल्हाड़ी मारता नजर आ रहा है।अवाम और सरकार के बीच एक खेल चल रहा है। एक ऐसा खेल जिसका परिणाम घर के सदस्यों के साथ-साथ पड़ोसी को भी भुगतना पड़ रहा है। सरकारें तो आती जाती रहीं हैं, पर भोग तो अवाम रहा है। मानवता चीत्कार रही है। सरकारों का रवैया हमेशा से ऐसा ही रहा है। कभी पेशावर तो कभी मुम्बई दहल उठता है। ऐसा कहा जाता है कि डाइन(चुड़ैल) भी सात घर छोड़ कर वार करती है, पर पाकिस्तान के दहशतगर्द तो उसी थाली मे छेद कर रहे हैं जिसमे उन्हें खाना परोसा जा रहा है। सवाल ये है कि सरकार इसके बावजूद भी हाथ पर हाथ धरे क्यूँ बैठी है? आखिर मजबूरी क्या है? 
            उन बच्चों का क्या दोष था जिनकी छाती छलनी कर दी गई? क्या स्कूल में पढ़ने गए मासूमों से इतना डर था कि भविष्य में वे गले की काट बन सकते हैं? या फिर क्या किसी सैन्यकर्मी के परिवार में जन्म लेने की सजा दी गई है उन्हें? 16 दिसम्बर को पाकिस्तान के एक आर्मी स्कूल में तालिबानी हमले में मारे गए 138 बच्चें पढ़-लिख कर पाकिस्तान की नई ईबारत गढने का सपना संजोए थे। शिक्षा की अलख जगा रहे थे। ठीक वैसे ही जैसे मलाला ने कर दिखाया है। वे सब मलाला बनना चाहते थे। सपना देखा था उन्होनें कि पाकिस्तान में एक नहीं सैकड़ों नोबेल पुरस्कार आए।  वो जानते थे कि एक नोबेल पाकिस्तान की साख में कितना ईजाफा कर सकता है। मलाला ने भी ये नहीं सोचा होगा कि उसकी प्रेरणा उन बच्चों के लिए नासूर बन जाएगी।
           अब बात करते हैं हुकूमत की। पाकिस्तान की नवाज शरीफ सरकार मजबूर नजर आ रही है। एक तरफ उसकी चाहत है तो दूसरी ओर अपना ही अवाम। इसे अवाम की बदकिस्मती ही कहेंगे कि वह सरकार के मंसूबों के आगे बेबस नजर आता है। पाकिस्तान में कहने को तो लोकतंत्र है पर शासन प्रक्रिया में लोक नदारद दिखता  है। सरकार की मंशा से यह साफ  जाहिर होता है कि उसकी चिंता किसके लिए कितनी है। पड़ोसी पर हमला  करने के लिए अपने ही घर में सांप पालने की प्रथा पाकिस्तान में हमेशा से ही चली आ रही है। सरकार भूल जाती है कि वही सांप उसके घर की तरफ भी फुफकारेगा जब कभी उस पर अंकुश लगाने की कोशिश की जाएगी।
          पाकिस्तान में शिक्षा, सुरक्षा तथा शासन के बीच ये जो भयावह पहेली बूनी गई है  उसमे मानवता पीस रही है। पाकिस्तान की अवाम को हमेशा एक डर को साथ जीना पड़ता है। मासूम बच्चों के साथ जब इतना घिनौना व्यवहार हो रहा है तब मानवाधिकारों की बात ही करना बेमानी है। जिहाद के नाम पर बोए गये नफरत के बीज अब लहलहाती फसल के रुप ले लिए हैं। रेडक्लिफ की मेड़ के आगे कब्जा जमाने की सरकार की नापाक हसरत अब अपने ही खेत को बंजर बना रही है। 

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