सोचिए यदि अटल बिहारी वाजपेयी एक कांग्रेसी होते और महामना मालवीय संघ के एक कार्यकर्ता ! क्या इन दोनों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजे जाने का वक्त यही होता? क्या गोखले, तिलक , भगत सिंह और विवेकानन्द जैसे महापुरुषों को भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए? सर्वोच्च नागरिक सम्मान होने के नाते भारत रत्न तो देश का ब्रांड एंबेसडर है फिर मरणोपरांत क्यूँ? जब कभी भारत रत्न दिए जाने की घोषणा होती है इतना हो-हल्ला क्यूँ मचता है? क्या अब तक के भारत के रत्न इस उपाधी से अलंकृत होने के हकदार नहीं थे? क्या इतना बड़ा सम्मान भी राजनीति, पूर्वाग्रह, झुकाव और महत्वकांक्षा से प्रेरित होकर दिए जाने चाहिए?
1954 से लेकर अब तक कुल 45 लोग अलंकृत हुए हैं भारत रत्न से। सर्वपल्ली राधाकृष्णन से लेकर वाजपेयी तक के इस दौर में भारत ने ढ़ेर सारे बदलाव देखे। एक गरीब और उपेक्षित देश से आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने के इस सफर में इन 45 विभूतियों का कितना योगदान है यह विशद आकलन का विषय है। यह आकलन विवादित भी हो सकता है इसलिए इस पचड़े मे पड़ना फिलहाल जरुरी नहीं है। हां, यह जरुर है कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से देखा जाए तो सबने किसी ना किसी क्षेत्र और रुप में अपना अमुल्य योगदान दिया है। हम किसी के योगदान को नकार नहीं सकते हैं और ये अपना काम भी नहीं है। भारत रत्न राष्ट्रीय सेवाओं के लिए दिया जाता है। इन सेवाओ में कला, विज्ञान, साहित्य, सार्वजनिक सेवा और खेल के क्षेत्र में दी जाने वाली सेवाएं शामिल हैं। शुरुआत में यह सम्मान मरणोपरांत दिए जाने का प्रावधान नहीं था पर 1955 में इसमे सुधार कर मरणोपरांत भी यह सम्मान दिए जाने की व्यवस्था की गई। तब से लेकर अब तक 12 व्यक्तियों को यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया है। सेवा क्षेत्रों में खेल को शामिल किए जाने के समय भी काफी विवाद हुए जब यह सम्मान सचिन तेंदुलकर को दिया गया।
अब बात करते हैं इस सम्मान से जुड़े विवादों और उन विभूतियों की जिन्हे यह सम्मान प्राप्त हो चुका है।सबसे पहला सवाल यह उठता है कि यह सम्मान मरणोपरांत क्यूँ दिया जाए? ऐसे में तो भारत का पूरा इतिहास ही महापुरुषों और विभुतियों से भरा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन और उसके पहले भी ऐसे बहुत से लोग हुए हैं जिनका योगदान अप्रतिम है। विवेकानन्द से लेकर भगत सिंह औऱ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर गणेश शंकर विद्दायार्थी तक कई ऐसी हस्तीयां हैं जो इस सम्मान के हकदार हैं। इनका योगदान भी अब तक के मरणोपरांत व्यक्तियों(भारत रत्न से अलंकृत) से कम नहीं है। विवाद के जड़ में यह बात भी शामिल है कि भारत रत्न देश का प्रतिनिधित्व करता है फिर वर्तमान समय में मरे हुए लोग देश का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगे। एक जीवंत प्रतिमान की छाप किसी मरे हुए व्यक्ति से हमेशा ज्यादा गाढ़ा होता है। इतिहास को सामने रखकर यदि हम अपनी पहचान स्थापित करना चाहते हैं तो ठीक है। पर इस बात का हमेशा भान रहना चाहिए कि वर्तमान ही भविष्य को संवारता है।
विवाद का दुसरा पहलु यह है कि यह सर्वोच्च सम्मान किन्हें मिलना चाहिए। यदि गौर करें तो भारत रत्न से सम्मानित अधिकांश व्यक्ति किसी ना किसी रुप में राजनीति से जुड़े रहे हैं। हालांकि कुछ ऐसे भी लोग हैँ जिनका राजनीति से कोई वास्ता नहीं है। वो अपने क्षेत्र के महारथी रहे हैं। भारत रत्न का चुनाव तात्कालिक राजनीति करती है। कहने का आशय यह है कि सरकार ही यह तय करती है कि भारत रत्न किन्हें मिलना चाहिए। जैसी सरकार वैसी पसंद। ऐसे में सरकार का झुकाव, राजनीति की दशा-दिशा, पूर्वाग्रह आदि का प्रभाव पड़ना ही है। कुछ राजनैतिक स्वार्थ भी इस चुनाव में महत्ती भूमिका निभाते हैं, मसलन किसी खास वर्ग, क्षेत्र या धर्म-संम्प्रदाय में अपनी सक्रिय प्रतीती देना।
भारतीय जनता पार्टी की सरकार का वाजपेयी और महामना को भारत रत्न दिए जाने के फैसले का स्वागत होना चाहिए। दोनों ने भारत के विकास और इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। विवाद उठने भी लाजिमी हैं क्यूंकि दोनों में कुछ खामियां भी हैं। विगत की सप्रंग सरकार के कार्यकाल में भी सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने पर कुछ इसी तरह का बवाल खड़ा हुआ था। बाद में तेंदुलकर कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा के सदस्य भी बनाए गए थे। तेदुलकर की काबिलियत पर किसी को कोई संदेह नहीं है। सचिन ने क्रिकेट के मारफत दुनिया में भारत को एक विशिष्ट पहचान दी है। वाजपेयी और महामना के साथ भी ऐसा ही है। वाजपेयी ने 21वी सदी के भारत को गढ़ने के लिए जो मजबूत आधार प्रदान किया उसी का नतीजा आज भारत की बढ़ती साख है।महामना ने भी स्वत्तंत्रता आंदोलन मे शिक्षा के क्षेत्र में महती भूमिका निभायी थी। बनारस हिन्दु विश्वविद्दयालय की स्थापना तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान असाधारण है। विवाद समय से है। इन दोनों को सम्मान तभी मिला है जब केंद्र में भाजपा की सरकार है। वाजपेयी भाजपा के पर्याय रहे हैं तो मालवीय हिन्दु महासभा के संस्थापक। महासभा की याद हमेशा नाथुराम गोडसे से जोड़ कर की जाती है।
ऐसे और भी मुद्दे और सवाल हैं जो भारत रत्न जैसे सम्मान पर सवाल खड़े करते हैं। इसमे कोई दो राय नहीं है कि भारत रत्न मिलना चाहिए। यह देश के मुड और सोच को प्रदर्शित करता है। अभी तक के दिए गए पुरस्कार सही और उचित हो सकते हैं जब हम हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान का चुनाव बिना किसी पूर्वाग्रह, झुकाव, दबाव और स्वार्थ के अधार पर करें। सरकार को राजनीति से उपर उठकर अपनी तटस्थ छवि पेश करनी होगी। यही बात हंगामा करने वालों पर भी लागु होती है कि वे इस पुरस्कार की शुचिता का सम्मान करें। इसमे निहित स्वार्थ, राजनीति और महत्वाकांक्षा को परे रखकर आकलन करें। कोई भी व्यक्ति सम्पूर्णता में विशिष्ट नहीं हो सकता है। किसी ना किसी रुप में उसकी एक कमजोरी रहेगी ही। भारत रत्न पर ज्यादा जीरह करना इसके प्रासंगिकता को चोट कर सकता है। हमें भारत पर ध्यान लगाना होगा यहां रत्नों की कमी नहीं है. यहां मूंगा भी एक रत्न है और गुंगा भी..