बुधवार, 23 दिसंबर 2015

आदमी ही है !



                
समेट लाना 
जमाने भर के दुःख
विरह के आंसू
जन्मों की बदकिस्मती
जिंदगी की नाकामियां
खोने का दर्द
और.. नहीं हासिल होने का मलाल।

दर्ज कर देना
पैदा होने की तारीख
अब तक की शिकायतें
मर जाने की वजहें
नहीं पाने का कारण
सिलवट की खरोंचें
और... मरहम नहीं देने का राज।

कह देना
समाज के अभिजात्य वर्ग से
परिवार के मुखिया से
प्रेम के कथित पुजारी से
देवालय के आश्रित से
सत्संग के प्रवक्ता से
और... जंग लगी सोच से।

आदमी ही है
जिसके ललाट पर रेखाएं उभरी हैं
गाल झुर्रीयों से लटके हैं
किस्मत ही उसकी बदकिस्मती है
जिसके लिए खाने को खाली बटुआ है
जो पीता जमाने का गम है
प्रेम में विरह को प्राप्त है
समाज में जिरह का साधन है
और... जिंदगी है बस इसीलिए जीता है। 

आदमी ही है
जो सरेआम बिकता है, बेमोल सिलता है
औरों की फटेहाली
जो गालियां सुनता है, जिसकी जगहंसाई होती है
नहीं यकीन होने वाले सच के लिए।
और, वो आदमी ही है उस आदमी के जैसा।






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