बुधवार, 23 दिसंबर 2015

थोड़ा ठहर..




थोड़ा ठहर..
तुम्हारी तल्खी सह लेता हूं
और, मैं चुप हूं
पैदा ही चिचियाते हुआ था
पर, अभी लाचारी है।

तुम फड़फड़ाते हो, भिनभिनाते हो
और, मैं भंवरा हूं
जमाने को पता है मेरी रसिकमिजाजी
पर, अभी जरा पहरा है।

तुम ज्वार-भाटा सा असर करते हो
और, मैं भंवर में फंसा हूं
इस समंदर में कोसी का अंश भी है
पर, अभी सामने मौत का कुंआ है।

तुम फुनगी के नीचे ही फुदकते हो
और, मैं ताड़ का पासी हूं
अपने दिल की गहरायी में उंचाई का राज है
पर, अभी मौसम ठंडा है।

तुम्हारी आहट सावधान होने को कहती है
और, मैं साढ़े सात रिक्टर पैमाने का जलजला हूं
कभी मगन होने दो, रुह कौंध जाएगी
पर, अभी प्रलय में देर है।

तुम पद का भान कराते हो
और, मैं कर्मयोगी हूं।
कभी फुर्सत में मिलना वास्तविक परिचय होगा
पर, अभी काम की जल्दी है।




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