पढ़ना नहीं हो पा रहा है। जब पढ़ ही नहीं रहा हूं, तो लिखूं
क्या। जितना पढ़ा था, उससे कितने दिनों तक कम चलेगा। धीरे-धीरे वो भी खत्म
हो रहा है।
शब्द नहीं मिल पा रहे हैं। कितनी शर्म की बात है कि शब्द खोजने पड़ रहे हैं।
किसी मित्र ने कभी कहा था.. शब्द तलाशने पड़ते हैं बिंब और भावों को उकेरने के लिए कुछ खास शब्द चाहिए होते हैं।
मुझे तब हंसी आती थी। आखिर कोई शब्द की तलाश में, बिंब और भावों को शब्दों के रुप में गढ़ने के लिए पूरी रात खपा सकता है। पर, उसकी रात शब्द ढूंढते गुजरती थी।
सच कहूं तो मेरे साथ ऐसा नहीं था। बस लिखने का मन होना चाहिए था, शब्द तो स्वतः ही उपजते थे। अपने पास शब्दों का एक विशाल भंडार था। बचपन से ही
पापा ने पढाने की आदत डाली थी। भाई ने लिखने की प्रेरणा दी थी। तब लिखने के लिए उनकी नकल करता था। पाठ्यपुस्तकों के अध्ययन से ज्यादा अन्य किताबें पढ़ा करता था। पापा कहते तो अखण्ड ज्योति भी पढ़ लेता था। लेकिन अपने को दूसरे टाइप की किताबें पसंद थी।
शुरु में नन्हे सम्राट, चंपक, बालहंस और क्रिकेट सम्राट से दोस्ती हुई। पर, आठवीं पास करते-करते तक इनसे मन उब गया था। अब सरस सलिल, मनोरमा कथाएं और पापा से पढ़ ली गई सुरेंद्र के उपन्यास( रात का सच, खुनी दरिंदा टाइप) में मन रमता था। छुपा कर पढ़ना पड़ता था। उस उम्र में ये सब पढ़नेकी मनाही थी। हद तो तब हो गई जब 12वीं के दौरान पापा ने स्कूल बैग से ही 18+ किताब पकड़ ली थी। जमकर पिटायी हुई। आपको लगता होगा कि मैने हिन्दी
साहित्य का अध्ययन नहीं किया है, बस फालतू किताबें ही पढ़ी हैं। तो ये भी जान लिजिए, मैने ना केवल प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, दिनकर, गुप्त, हजारी
प्रसाद द्विवेदी, पंत, निराला, महापंडित, महादेवी वर्मा को पढा है बल्कि, शिवानी, कामेश्वर, यशपाल, नागार्जुन, बच्चन, मन्नू भंडारी और दुष्यंत से
भी सीखा है। वैसे मेरे पसंदीदा साहित्यकार महाप्राण निराला हैं। शिवानी और दुष्यंत से सीखने को मिलता है। प्रेमचंद और प्रसाद इतिहास का दर्शन कराते हैं। महापंडित और दिनकर भारतीयता जगाते हैं। बड़े होने पर भैया ने कहा अंग्रेजी नोवेल पढ़ो, इससे अंग्रेजी सीखने में मदद मिलेगी। खैर, अंग्रेजी तो नहीं सीख पाया लेकिन इस भाषा के दर्जनों उपन्यास पढ़ लिए
हैं। आपको ताज्जूब होगा कि अभी तक जितने भी अंग्रेजी उपन्यास पढ़े हैं, उनके नाम और लेखक के बारे में कुछ याद नहीं है। बस पढ़ लेता हूं। हां, इतना जरुर कहूंगा कि पिछले एक महीने से THE ALCHEMIST पढ़ रहा हूं, इसके पहले I TOO HAD A LOVE STORY पढ़ी थी। लेखक के नाम अभी तक नहीं पता है। इसका कारण ये है कि इन उपन्यासों को पढ़ने के लिए प्रयासशील नहीं होना पड़ता, बस कहीं मिल जाते है। अंग्रेजी में लिखा देख, पढ़ लेता हूं। एक बात जरुर है, इस भाषा के लिए भी अब शब्दों की कमी नहीं है। इसके लिए इन उपन्यासों का आभारी हूं।
हर टाइप के लिखे पढ़े हैं। किसी में अपना अपना हाथ तंग नहीं था। ये इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि, स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही 11वीं और
12वीं के बच्चों के लिए शिक्षाशास्त्र की किताब लिख दी थी। पापा ने मेरा नाम देने से मना कर दिया। ठीक किए थे । आखिर, 12वीं में विज्ञान की पढ़ाई किया बच्चा शिक्षाशास्त्र कैसे लिख सकता था। स्नातक में भी इस विषय से कोई वास्ता नहीं था। आज भी बच्चे वो किताबे पढ़ते हैं। उन्हें ये भी नहीं पता किसी नौसिखुए ने लिखा था। कुछ भी लिखने के लिए दिमाग पर जोर नहीं पड़ता था। बस ये पता होना चाहिए किस बारे में लिखना है। एक कहानी भी है,
पढ़िए..
तब मैं कविताएं लिखता था(अब कैसे लिखूं, शब्द ही नहीं मिलते, पहले ही जिक्र कर चुका हूं)। प्रेमिका के साथ मिलन तय था, उसने अपने लिए एक कविता
की आरजू की थी। आरजू थी कि जब मैं मिलूं तो उसे अपनी कविता सुनाऊं। बात रात में ही तय हो चुकी थी। सोचा सुबह जल्दी उठकर लिख दूंगा। रात बेकार
करने से बेहतर होगा। सुबह 9 बजे सो कर उठा, 10 बजे मिलने का समय मुकर्रर हुआ था। अपने पास एक घंटे थे। दैनिक क्रिया कर्म से लेकर घर का काम और
नाश्ता करना था। सब निपटा कर जब कविता लिखने बैठा तो हमेशा की तरह चलते समय का आभास कराने वाली वस्तु पर नजर पड़ी। घड़ी का सबसे छोटी सूई 10 के बिल्कुल करीब थी। अपने पास 15 मिनट बचे थे। 5 मिनट थीम तय करने में लग गए। और अगले 10 मिनट तक कलम रेगीस्तानी उंट की तरह पन्ने पर रेंगने लगा। अचानक फोन की घंटी बजी, उसी का फोन था। फोन उठाने से पहले घड़ी पर नजर दौड़ायी। पूरे 10 बजे थे। वो समय की बहुत पाबंद थी, मैं कभी नहीं हो सका। हैलो... कहां हो? बस पहूंच रहा हूं बाबू। वहीं रहना। जिस तरह कोई छोटा बच्चा बिना मोह-दया के कागज फाड़ता है, मैनें भी अपनी डायरी के पन्ने
फाड़ लिए। पहले तो ये सोचा कि फोटो ले लूं, वही देख कर कविता सुना दूंगा। लेकिन, फिर खयाल आया कि वो अपने पास रखने के लिए मांगेगी जरुर। चींदी फोन
था उसका, सो फोटो भी ट्रांसफर नहीं हो सकता था। अभी तक प्रेम का इकरार भी नहीं हुआ था। इस वास्ते कुछ तो जताने के लिए चाहिए था। सो पन्ने लिए,
बेपरवाह होकर घर से निकल गया। उसे कविता सुनायी। मां कसम, कविता की उन 25 पंक्तियों ने उसपर जादू कर दिया था। इजहार तो हो ही चुका था, उस दिन इकरार भी हो गया। पहली पर किसी ने लगातार 5 मिनट तक गले से लगाकर रखा था।
डायरी को उन पन्नों को वो अपने साथ ले गई थी। वैसे तो अब उससे बात नहीं हो पाती, लेकिन पिछली बार उसने बताया था कि अपने फाइल में सहेज कर रखी
थी। इस तरह वो पन्ने हमारे लिए प्रेम का प्रमाण पत्र बन गए थे। शायद उसकी फाइल में अभी तक वो पन्ने होंगे।
तो, मैं लिखता था। बड़े आराम से लिखता था। सबकुछ लिखता था। कुछ दिनों पहले तक भी अपनी खास शैली में लघु प्रेम कथाओं की एक सीरीज लिखी थी। पर अब नहीं लिखता हूं। क्योंकि अब पढ़ता भी नहीं हूं। अपने लिखने की हद वर्टिकल पिरामिड और फाइव डब्ल्यू वन एच तक सिमट कर रह गयी है। तरस आती है खुद पर। मुझे पढ़ना चाहिए, मुझे लिखना चाहिए। अखबार से इतर भी। इसीलिए आज
लिखा है। खुद को बताने के लिए लिखा है। कहते हैं ना... संतोषम् परम सुखम्। उसी संतोष के लिए लिखा है। लेकिन नहीं मिला कमबख्त।
गुरु ने कहा था- पलायन और निराशा का नकार ही सृजन है, रचना है। और उधर रॉकस्टार कहता है, बिना दर्द के क्रिएटीविटी नहीं आती। जो भी है।
खुद से एक वादा है- इब लिखना होगा। जरुर होगा। नए साल में एक नई रचना श्रृंखला तैयार होगी। आपसे भी वादा रहा। उसके लिए भी लिखना है।
शब्द नहीं मिल पा रहे हैं। कितनी शर्म की बात है कि शब्द खोजने पड़ रहे हैं।
किसी मित्र ने कभी कहा था.. शब्द तलाशने पड़ते हैं बिंब और भावों को उकेरने के लिए कुछ खास शब्द चाहिए होते हैं।
मुझे तब हंसी आती थी। आखिर कोई शब्द की तलाश में, बिंब और भावों को शब्दों के रुप में गढ़ने के लिए पूरी रात खपा सकता है। पर, उसकी रात शब्द ढूंढते गुजरती थी।
सच कहूं तो मेरे साथ ऐसा नहीं था। बस लिखने का मन होना चाहिए था, शब्द तो स्वतः ही उपजते थे। अपने पास शब्दों का एक विशाल भंडार था। बचपन से ही
पापा ने पढाने की आदत डाली थी। भाई ने लिखने की प्रेरणा दी थी। तब लिखने के लिए उनकी नकल करता था। पाठ्यपुस्तकों के अध्ययन से ज्यादा अन्य किताबें पढ़ा करता था। पापा कहते तो अखण्ड ज्योति भी पढ़ लेता था। लेकिन अपने को दूसरे टाइप की किताबें पसंद थी।
शुरु में नन्हे सम्राट, चंपक, बालहंस और क्रिकेट सम्राट से दोस्ती हुई। पर, आठवीं पास करते-करते तक इनसे मन उब गया था। अब सरस सलिल, मनोरमा कथाएं और पापा से पढ़ ली गई सुरेंद्र के उपन्यास( रात का सच, खुनी दरिंदा टाइप) में मन रमता था। छुपा कर पढ़ना पड़ता था। उस उम्र में ये सब पढ़नेकी मनाही थी। हद तो तब हो गई जब 12वीं के दौरान पापा ने स्कूल बैग से ही 18+ किताब पकड़ ली थी। जमकर पिटायी हुई। आपको लगता होगा कि मैने हिन्दी
साहित्य का अध्ययन नहीं किया है, बस फालतू किताबें ही पढ़ी हैं। तो ये भी जान लिजिए, मैने ना केवल प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, दिनकर, गुप्त, हजारी
प्रसाद द्विवेदी, पंत, निराला, महापंडित, महादेवी वर्मा को पढा है बल्कि, शिवानी, कामेश्वर, यशपाल, नागार्जुन, बच्चन, मन्नू भंडारी और दुष्यंत से
भी सीखा है। वैसे मेरे पसंदीदा साहित्यकार महाप्राण निराला हैं। शिवानी और दुष्यंत से सीखने को मिलता है। प्रेमचंद और प्रसाद इतिहास का दर्शन कराते हैं। महापंडित और दिनकर भारतीयता जगाते हैं। बड़े होने पर भैया ने कहा अंग्रेजी नोवेल पढ़ो, इससे अंग्रेजी सीखने में मदद मिलेगी। खैर, अंग्रेजी तो नहीं सीख पाया लेकिन इस भाषा के दर्जनों उपन्यास पढ़ लिए
हैं। आपको ताज्जूब होगा कि अभी तक जितने भी अंग्रेजी उपन्यास पढ़े हैं, उनके नाम और लेखक के बारे में कुछ याद नहीं है। बस पढ़ लेता हूं। हां, इतना जरुर कहूंगा कि पिछले एक महीने से THE ALCHEMIST पढ़ रहा हूं, इसके पहले I TOO HAD A LOVE STORY पढ़ी थी। लेखक के नाम अभी तक नहीं पता है। इसका कारण ये है कि इन उपन्यासों को पढ़ने के लिए प्रयासशील नहीं होना पड़ता, बस कहीं मिल जाते है। अंग्रेजी में लिखा देख, पढ़ लेता हूं। एक बात जरुर है, इस भाषा के लिए भी अब शब्दों की कमी नहीं है। इसके लिए इन उपन्यासों का आभारी हूं।
हर टाइप के लिखे पढ़े हैं। किसी में अपना अपना हाथ तंग नहीं था। ये इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि, स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही 11वीं और
12वीं के बच्चों के लिए शिक्षाशास्त्र की किताब लिख दी थी। पापा ने मेरा नाम देने से मना कर दिया। ठीक किए थे । आखिर, 12वीं में विज्ञान की पढ़ाई किया बच्चा शिक्षाशास्त्र कैसे लिख सकता था। स्नातक में भी इस विषय से कोई वास्ता नहीं था। आज भी बच्चे वो किताबे पढ़ते हैं। उन्हें ये भी नहीं पता किसी नौसिखुए ने लिखा था। कुछ भी लिखने के लिए दिमाग पर जोर नहीं पड़ता था। बस ये पता होना चाहिए किस बारे में लिखना है। एक कहानी भी है,
पढ़िए..
तब मैं कविताएं लिखता था(अब कैसे लिखूं, शब्द ही नहीं मिलते, पहले ही जिक्र कर चुका हूं)। प्रेमिका के साथ मिलन तय था, उसने अपने लिए एक कविता
की आरजू की थी। आरजू थी कि जब मैं मिलूं तो उसे अपनी कविता सुनाऊं। बात रात में ही तय हो चुकी थी। सोचा सुबह जल्दी उठकर लिख दूंगा। रात बेकार
करने से बेहतर होगा। सुबह 9 बजे सो कर उठा, 10 बजे मिलने का समय मुकर्रर हुआ था। अपने पास एक घंटे थे। दैनिक क्रिया कर्म से लेकर घर का काम और
नाश्ता करना था। सब निपटा कर जब कविता लिखने बैठा तो हमेशा की तरह चलते समय का आभास कराने वाली वस्तु पर नजर पड़ी। घड़ी का सबसे छोटी सूई 10 के बिल्कुल करीब थी। अपने पास 15 मिनट बचे थे। 5 मिनट थीम तय करने में लग गए। और अगले 10 मिनट तक कलम रेगीस्तानी उंट की तरह पन्ने पर रेंगने लगा। अचानक फोन की घंटी बजी, उसी का फोन था। फोन उठाने से पहले घड़ी पर नजर दौड़ायी। पूरे 10 बजे थे। वो समय की बहुत पाबंद थी, मैं कभी नहीं हो सका। हैलो... कहां हो? बस पहूंच रहा हूं बाबू। वहीं रहना। जिस तरह कोई छोटा बच्चा बिना मोह-दया के कागज फाड़ता है, मैनें भी अपनी डायरी के पन्ने
फाड़ लिए। पहले तो ये सोचा कि फोटो ले लूं, वही देख कर कविता सुना दूंगा। लेकिन, फिर खयाल आया कि वो अपने पास रखने के लिए मांगेगी जरुर। चींदी फोन
था उसका, सो फोटो भी ट्रांसफर नहीं हो सकता था। अभी तक प्रेम का इकरार भी नहीं हुआ था। इस वास्ते कुछ तो जताने के लिए चाहिए था। सो पन्ने लिए,
बेपरवाह होकर घर से निकल गया। उसे कविता सुनायी। मां कसम, कविता की उन 25 पंक्तियों ने उसपर जादू कर दिया था। इजहार तो हो ही चुका था, उस दिन इकरार भी हो गया। पहली पर किसी ने लगातार 5 मिनट तक गले से लगाकर रखा था।
डायरी को उन पन्नों को वो अपने साथ ले गई थी। वैसे तो अब उससे बात नहीं हो पाती, लेकिन पिछली बार उसने बताया था कि अपने फाइल में सहेज कर रखी
थी। इस तरह वो पन्ने हमारे लिए प्रेम का प्रमाण पत्र बन गए थे। शायद उसकी फाइल में अभी तक वो पन्ने होंगे।
तो, मैं लिखता था। बड़े आराम से लिखता था। सबकुछ लिखता था। कुछ दिनों पहले तक भी अपनी खास शैली में लघु प्रेम कथाओं की एक सीरीज लिखी थी। पर अब नहीं लिखता हूं। क्योंकि अब पढ़ता भी नहीं हूं। अपने लिखने की हद वर्टिकल पिरामिड और फाइव डब्ल्यू वन एच तक सिमट कर रह गयी है। तरस आती है खुद पर। मुझे पढ़ना चाहिए, मुझे लिखना चाहिए। अखबार से इतर भी। इसीलिए आज
लिखा है। खुद को बताने के लिए लिखा है। कहते हैं ना... संतोषम् परम सुखम्। उसी संतोष के लिए लिखा है। लेकिन नहीं मिला कमबख्त।
गुरु ने कहा था- पलायन और निराशा का नकार ही सृजन है, रचना है। और उधर रॉकस्टार कहता है, बिना दर्द के क्रिएटीविटी नहीं आती। जो भी है।
खुद से एक वादा है- इब लिखना होगा। जरुर होगा। नए साल में एक नई रचना श्रृंखला तैयार होगी। आपसे भी वादा रहा। उसके लिए भी लिखना है।
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