बुधवार, 23 दिसंबर 2015

तुम कह दो..




तुम कहो दो
की वो बोल तुम्हारे नहीं थे
वैसे ही जैसे
शराबी कहता है
अपने मुंह की बास के लिए।

तुम कह दो
की उस पल कुछ नहीं हुआ था
जब अंधेरे में
आंखें उल्लु सी देख रही थीं
सांसें कुत्ते सी हांफ रही थी
और हाथ, फिसल रहे थे
वैसे ही जैसे
चींटीयों के पैर फिसलते हें
किसी चिकने दीवार की चढाई में।

तुम कह दो
की तुम नहीं थे
जब कमरे में सन्नाटा था
शरीफ होने की होड़ लगी थी
ओसारे में झिंगुर पियानो पर थे
और, बदन में थर्मामीटर के सारे पैमाने समा गए थे
वैसे ही जैसे
हम बचपन में करते थे
भरी बैठक में एकांत ढूंढ कर रोते थे
जुते को सूखे रास्ते में भी पानी से भिगोते थे।

तुम कह दो
की पागल नहीं थे
जब वो दौर आया था
तुम निशाचर हो गए थे
बिना बात के भूख हड़ताल करते थे
खिलाने पर खाते थे.
सुलाने पर सोते थे
वैसे ही जैसे
कुछ कामरेड अभी भी करते है
क्रांति की बात पर
मरने से भी नहीं डरते हैं।

तुम कह दो
की सब भूल जाओ
उस रात को भी
उस बात को भी
सांसों को, आवाज को
झिंगुर की साज को
और पागलपन के राज को
वैसे ही जैसे
वो भूल जाते हैं
अपने बोल, अपने वादे
पुराने दिन और पुरानी रातें
जब, सड़कछाप बने फिरते थे
सरे बाजार में कहकहे लगाते थे
और, एकांत में चौपाल सजाते थे।



थोड़ा ठहर..




थोड़ा ठहर..
तुम्हारी तल्खी सह लेता हूं
और, मैं चुप हूं
पैदा ही चिचियाते हुआ था
पर, अभी लाचारी है।

तुम फड़फड़ाते हो, भिनभिनाते हो
और, मैं भंवरा हूं
जमाने को पता है मेरी रसिकमिजाजी
पर, अभी जरा पहरा है।

तुम ज्वार-भाटा सा असर करते हो
और, मैं भंवर में फंसा हूं
इस समंदर में कोसी का अंश भी है
पर, अभी सामने मौत का कुंआ है।

तुम फुनगी के नीचे ही फुदकते हो
और, मैं ताड़ का पासी हूं
अपने दिल की गहरायी में उंचाई का राज है
पर, अभी मौसम ठंडा है।

तुम्हारी आहट सावधान होने को कहती है
और, मैं साढ़े सात रिक्टर पैमाने का जलजला हूं
कभी मगन होने दो, रुह कौंध जाएगी
पर, अभी प्रलय में देर है।

तुम पद का भान कराते हो
और, मैं कर्मयोगी हूं।
कभी फुर्सत में मिलना वास्तविक परिचय होगा
पर, अभी काम की जल्दी है।




आदमी ही है !



                
समेट लाना 
जमाने भर के दुःख
विरह के आंसू
जन्मों की बदकिस्मती
जिंदगी की नाकामियां
खोने का दर्द
और.. नहीं हासिल होने का मलाल।

दर्ज कर देना
पैदा होने की तारीख
अब तक की शिकायतें
मर जाने की वजहें
नहीं पाने का कारण
सिलवट की खरोंचें
और... मरहम नहीं देने का राज।

कह देना
समाज के अभिजात्य वर्ग से
परिवार के मुखिया से
प्रेम के कथित पुजारी से
देवालय के आश्रित से
सत्संग के प्रवक्ता से
और... जंग लगी सोच से।

आदमी ही है
जिसके ललाट पर रेखाएं उभरी हैं
गाल झुर्रीयों से लटके हैं
किस्मत ही उसकी बदकिस्मती है
जिसके लिए खाने को खाली बटुआ है
जो पीता जमाने का गम है
प्रेम में विरह को प्राप्त है
समाज में जिरह का साधन है
और... जिंदगी है बस इसीलिए जीता है। 

आदमी ही है
जो सरेआम बिकता है, बेमोल सिलता है
औरों की फटेहाली
जो गालियां सुनता है, जिसकी जगहंसाई होती है
नहीं यकीन होने वाले सच के लिए।
और, वो आदमी ही है उस आदमी के जैसा।