गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

विकास या पर्यावरण

विकास क्या है? विकास के मापदण्ड क्या हैं? इन मानकों का निर्धारण किस प्रकार होगा? विकास की ये अवधारणा आज से ही नहीं बल्कि  लम्बे समय से एक पेचीदा मामला है। विद्वानों, अर्थशास्त्रियों, विकास के महान प्रणेताओं और भूमण्डलीकरण के पैरोकारों के बीच भी आज तक विकास की सही समझ स्थापित नहीं हो पायी है। दीगर बात ये है कि समय समय पर इनके एकत्रीत प्रयासों के माध्यम से विकास की कसौटी को जानने में थोडी सहुलियत हुई है। विकास के पैमाने चाहे जो भी हो पर एक बात तो जरुर है कि विकास की संरचना पर्यावरण या पारिस्थितिकी की आवश्याकताओं को समझे बगैर नहीं हो सकती।
         विकास के नाम पर हम पर्यावरण को अनदेखा नहीं कर सकते। विकास की उन सारी स्थापित या अनस्थापित अवधारणाओं की धमक  पर्यावरणीय सहुलियतों और आवश्यकताओं पर भारी नहीं पडनी चाहिए।विकास और पर्यावरण को अगर समान नजरिए से देखने का प्रयास किया जाए तो मेरे खयाल से शायद एक समन्वित अवधारणा स्थापित की जा सकती है।
         मानवीय सभ्यता के विकास में मानव और पर्यावरण (प्रकृति ) का अन्योन्याश्रय संबंध रहा है। इसे एक दुसरे से पृथक नहीं किया जा सकता। वर्तमान संदर्भ की बात करे तो पर्यावरणीय असंतुलन के लिए मुख्यत: मनुष्य ही उतरदायी है क्योंकि यही अपने पर्यावरण का सबसे प्रमुख और गतिशील कारक है। फर्ज किजिए कि जब कारक ही अपनी महत्वकांक्षाओं और भोगलिप्साओं की प्राप्ति के लिए, अपनी थोथी विकास आधारित अवधारणाओं के लिए सारी हदों तक जाने को तैयार हो तो फिर पर्यावरण कोकिस रुप में अपनाएग। जाहिर है कि वर्तमान संदर्भ में पर्यावरण पीछे छुटता चला जा रहा है। विकास की वही अवधारणाएं उस पर इस कदर हावी है कि अब इनसे दुषित भी होता चला जा रहा है।
         पर्यावरणीय महत्ता एक व्यक्ति के लिए जितनी मायने रखती रखती है उससे कहीं ज्यादा किसी विकासशील या फिर विकसित राज्य के लिए। पर्यावरण का उतना ही महत्व एक कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक है जितना की एक कारोबारी समुह के लिए। विकास के नाम पर किसी राष्ट्र से यही अपेक्षा की जाती है कि वह एक सुगठित व आधारभूत संरचना का निर्माण करे। ये संरचना सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक किसी भी प्रकार की हो सकती है। सवाल ये है कि क्या एक उन्नत संरचना के निर्माण के लिए पर्यावरणीय अवश्यकताएं और पर्यावरण के तत्व अपनी भूमिका सजग रुप से नहीं निभा सकते हैं ? पर्यावरण की महत्ता क्या संरचना के लिए कोई मायने नहीं रखती है?

         विकास की बात  करने पर अनयास ही ये लम्बी चलने वाली प्रक्रिया हो जाती है पर जब हम इसके अन्योन्याश्रयी संबंधी अर्थात् पर्यावरण को इसके बीच लाते हैं, प्रक्रिया की गतिशीलता शिथिल पडने लगती है। जरुरत है हमें पर्यावरण के भावी अवश्यकतों को जानने की वरना विकास के क्रम में पर्यावरणीय त्रासदी आसार हैं। उदाहरणों से सीख लेना होगा, पुन: उत्तराखण्ड और जम्मू जैसी आपदाओं से बचने के लिए। 

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