बुधवार, 29 अप्रैल 2015

त्रासदी के बाद

भूकंप आने की भविष्यवाणी और भूकंप झेलने के बाद के जीवन की कल्पना का वर्णन करना ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार मृत्यु का आभास और मर जाने के बाद परिजनों के बीच बिखरा मातम का माहौल। तमाम कोशिशों के बावजूद मौसम वैज्ञानिक और भूगर्भवेत्ता आज तक भूकंप की भविष्यवाणी करने में नाकाम रहे हैं। ज्योतिष और धर्मगुरुओं ने हालांकि इसके कारणों को जरुर गिनाया है लेकिन उनके बाताये कारण उसी प्रकार हास्यास्पद लगते हैं जैसे चोर चोरी करने के कारणों को बयान करता है। वैसे ही भूकंप के बाद की वास्तविक स्थिति का आकलन करना भी प्रतीत होता है। जिस प्रकार मनुष्य मृत्यु के बाद आत्मा के रुप में अपने परिजनों को रोते बिलखते देखने के बावजूद बाध्यकारी होकर कुछ नहीं कह पाता है और उन्हें इस बात का अहसास नहीं करा पाता कि मनुष्य मरणशील है। भूकंप के कारणों का असली पता होने के बावजूद भी विशेषज्ञों की तरफ से आयी प्रतिक्रिया भी वैसी ही लगती है जैसे रोते बिलखते परिजन मृत व्यक्ति की बुराईयों का पर्दाफाश उसकी नेकनीयती और सुंदर आचरण को बता कर करते हैं।
पिछले दिनों नेपाल और उससे सटे भारतीय राज्यों में आए भीषण भूकंप के बाद अब राहत और बचाव कार्य प्रगति पर है। पीड़ितों के पुनर्वास और मलवे में दबे शवों को निकालने का काम जोरों पर है। अभी तक 5000 से भी ज्यादा लोगों के मरने की पूष्टि हो चूकी है जबकि वहां के प्रधानमंत्री ने 10000 से भी ज्यादा लोगों के मरने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि भूकंप का केंद्र नेपाल की राजधानी से 90 किमी दूर पोखर था, लेकिन इससे मची तबाही का असर न केवल नेपाल में बल्कि उससे सटे भारतीय राज्यों में भी  देखने को मिला। भारत में भी भूकंप के कारण लगभग 150 जानें गई हैं। अपेक्षाकृत रुप से भारत में जान-माल का नुकसान कम हुआ लेकिन यहां के लोग भी दहशत में जीने को मजबूर हो गए। कारण था कि भूकंप के झटके लगातार आ रहे थे। नेपाल में तो छोटे बड़े कुल मिलाकर 60 से भी ज्यादा झटके महसूस किए गए। नेपाल के इतिहास में ऐसा भूकंप आठ दशकों के बाद आया है जिसकी अधिकतम तीव्रता 7.8 आंकी गई। भूकंप के बाद हुए जानमाल के नुकसान की तस्वीर तब स्पष्ट होगी जब राहत, बचाव और पुनर्वास कार्य पूरा होगा। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इस भायानक हादसे के कारण नेपाल को करोड़ो अरबों रुपए का नुकसान हुआ है और न जाने कितनी जिंदगियां  काल का ग्रास बन चुकी हैं। ये भी अनुमान लगाया जा रहा है कि इस हादसे से उबरने में नेपाल को एक लम्बा वक्त लगेगा और उसकी अर्थव्यवस्था बहुत पीछे चली गई है। वहां की इमारतें खासकर पुराने भवन और घरोहर अब धरोहर नहीं रह जाएंगे।
भूकंप के कारणों को वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य से देखें तो यह एक सामान्य सी प्राकृतिक प्रक्रिया है जो हमेशा गतिशील रहती है। पृथ्वी की संरचना विभिन्न परतों से मिलकर हुई है जिन्हें मेंटल, क्रस्ट और कोर कहते हैं। पृथ्वी के गर्भ में जब ये परतें एक दूसरे से टकराती हैं तब कंपन होना स्वाभाविक है। कभी कभार ये परतें जोर से टकराती हैं तब भूकंप की तीव्रता और भीषणता बढ़ जाती है। ये परतें अपने विकास के क्रम में ही एक दूसरे से टकराती हैं। यह एक प्रकार से प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रकिया है, जिसपर काबू नहीं पाया जा सकता है। ऐसे में भूकंप को रोका नहीं जा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि भूकंप का केंद्र कहां है जिससे विनाश और बर्बादी कम हो। ये बात तो तय है कि भूकंप को रोका नहीं जा सकता है लेकिन  कुछ उपायों और सावधानीयों को अपना कर हम इस तबाही और इसके दुष्परिणाम को कम जरुर कर सकते हैं। इमारतों के निर्माण के समय जरुरी मानकों को अपना कर, आपदा प्रबंधन को प्रभावी बना कर, नागरिकों को जरुरी जागरुकता प्रदान कर और पर्यावरणीय जरुरतों का खयाल रखकर हम तबाही को कम कर सकते हैं।
हमें हिमालय को भी ध्यान में रखना होगा। ये बात गौर करने लायक है कि बीते दिनों में ज्यादातर प्राकृतिक आपदाएं हिमालय से सटे प्रदेशों में ही हुई है, मसलन पिछले साल केदारनाथ की तबाही और अब नेपाल में आया भूकंप। अब सवाल ये है कि आखिर ये भीषण आपदाएं हिमालय से सटे प्रदेशों में ही क्यूं होती हैं। हिमालय विवधताओं से भरा एक यूवा पर्वत श्रृंखला है जो अपने विकास के दौर में है। नित-प्रतिदिन हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं में नवीनतम परिवर्तन आते रहते हैं। शायद ये परिवर्तन ही इन आकस्मिक आपदाओं के जनक हों। दूसरी बात जो हिमालय के लिहाज से और भी महत्वपूर्ण है वह यह कि हम हिमालय को लेकर कितने सजग हैं। ये कहने में तो हम देरी नहीं करते हैं कि हिमालय अपनी गोद में हम प्रश्रय प्रदान करता है लेकिन दुखद ये है कि हम हिमालय की इस महिमा को भूलकर कंक्रीट के शहर बनाने को ज्यादा तवज्जो देने लगे हैं। पहाड़ों को काटकर जब हम हिमालय के अंग को क्षत-विक्षत करने लगेंगे तो उसके दुष्परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। इसी का नतीजा आज हमारे सामने है। हम पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करेंगे तो जाहिर तौर पर पर्यावरण भी अपना रंग दिखाएगा।

 बहरहाल, जरुरत है नेपाल को वापस ढर्रे पर लाने की। भूकंप के बाद की त्रासदी और भी खतरनाक होती है। पड़ोसी होने के नाते हमें नेपाल को सहारा देना होगा इस तबाही से उबरने के लिए। आर्थिक मदद के साथ-साथ भावनात्मक लगाव की आवश्यकता है। एक ऐसा देश जिसने आज तक किसी को क्षति नहीं पहुंचायी है, हमसे मदद के उम्मीद लगाए बैठा है। भारत की तरफ से अब तक के किए प्रयास सराहनीय रहे हैं। इसे आगे भी जारी रखना होगा। राजनीतिक ही नहीं अपितु सामाजिक और मानवीय लिहाज से भी हमें साथ देना होगा।किसी को क्षति नहीं पहुंचायी है, हमसे मदद के उम्मीद लगाए बैठा है। भारत की तरफ से अब तक के किए प्रयास सराहनीय रहे हैं। इसे आगे भी जारी रखना होगा। राजनीतिक ही नहीं अपितु सामाजिक और मानवीय लिहाज से भी हमें साथ देना होगा। नेपाल को पून:  उसके पुराना रुप देने के लिए सबको साथ आना पड़ेगा। मानवता की यही पूकार है।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

गुमनामी का मुकाबला जुझारुपन से- बिहार के किसान

अब तक बहसों और परिचर्चाओं में ये अक्सर सुना करता था कि बिहार के किसान अंदर से बहुत मजबूत होते हैं। उनके पास अदम्य साहस और सहनशीलता होती है। ये एक धड़ा कहा करता था। एक दुसरा भी धड़ा था जो यह पक्ष रखता था कि बिहार के किसान अपेक्षाकृत रुप से कम खेती करते हैं। उनके कहने का अभिप्राय यह था कि दूसरे प्रदेशों के किसानों की तुलना में बिहार में नगदी या जिविकोपार्जन आधारित खेती कम की जाती है। इस प्रकार यहां के किसानों पर कम बोझ एंव जिम्मेदारी होती है।
ये दोनो पक्ष अपनी समझ और नजरिए के लिहाज से बहुत हद तक स्थिति का बयान भी अपने-अपने ढ़ंग से करते हैं। दरअसल एक पक्ष वो है जो बिहार के किसानों  और खेती से भावनात्मक लगाव रखता है। शायद किसी ना किसी रुप से वह इनसे जुड़ा भी होता है। शायद वह इसी जुड़ाव के कारण अपनी मनोदशा को ही किसानों की मनोदशा समझ लेता है। स्पष्ट है कि वह अपना पक्ष और स्थिति का आकलन अपने नजरिए और समझ के हिसाब से करता है। जो दूसरा पक्ष है वह रिपोर्टें तैयार करता है। पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखता है। टीवी की बहसों में भाग लेता है और कृषि एवं अर्थशास्त्र के संदर्भ ग्रन्थों को अपनी समझ में व्यापक तौर पर इस्तेमाल करता है। फसल उत्पादन और विकास दर को अपने हर एक वक्तव्य में उद्धृत करता है। इस धड़े के संदर्भ में इतना ही कह सकते हैं कि ये पक्ष भी आंकड़ो और उत्पादन पर अपनी समझ और नजरिए को व्यक्त करता है।
हां, हम एक काम जरुर कर सकते हैं कि इन दोनो धड़ों के विचारो के समन्वित और समेकित नजरिए पर अपनी नजर डाल सकते हैं। संयुक्त रुप से दोनो तरह के विचार बहुत हद तक स्थिति का वर्णन करने में सक्षम हैं। लेकिन, पूरी स्थिति तब स्पष्ट होगी जब हम वास्तव में सबसे निचले और बुनियादी स्तर पर इसकी पड़ताल करते हैं। ग्राउंड जीरो की स्थिति एक अलग तस्वीर पेश करती है। यहां आपको मनेर के किसान गजेंद्र के परिवार से मुलाकात होगी। ये वो गजेंद्र नहीं है जो किसी हाई वोल्टेज और आयोजित रैली के दौरान पेड़ से लटक कर आत्महत्या करता है। ये वो किसान नहीं है जिसके हक के लिए समाजसेवी और सिविल सोसाईटी के लोग धरने देते हैं, अदालतों में याचिकाएं दायर की जाती है। यह वह किसान भी नहीं है जिसके प्रतिनिधि संसद में बेबाक होकर उसके हक की मांग करते हैं। यह उस प्रदेश से भी नहीं आता जिसके कवरेज के लिए पत्रकारों और केमरामैनों का जत्था जाता है।
दरअसल,  गजेंद्र और उसके जैसे किसान गुमनामी और अनदेखी का शिकार होकर अपनी सहनशीलता का परिचय देते हैं। वह उत्पादन और पैदवार के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय पटल पर रिकार्ड विकास दर दर्ज कराता है। यह वह किसान है जो खेती के नए तरीकों को ढूंढता है और संमूची दुनिया उसे अपनाती है। राष्ट्रीय पटल पर इसकी गुंज दूसरे प्रदेशों के किसानों की आत्महत्याओं और अपने प्रदेश की राजनीति के मकड़जाल में दब कर चूुप हो जाती है। कर्ज अदायगी के मामले में भी सूबे के किसानों ने सबको आईना दिखाया है। इन सब के बावजूद वह आज भी प्रेमचंद के उपन्यासों का नायक बना हुआ है। उसकी माली हालत आज भी वैसी ही है जो औपनिवेशिक काल के दौरान थी। अंतत: वह अपने जीवन की इहलीला समाप्त करता है। अधिकतर मामलों मे तो जीवन प्राकृतिक  आपदाओं की भेंट चढ़ जाता है। वह इतने कर्ज में डूब जाता है कि उससे उबरने के लिए आत्महत्या की बजाय शहर पलायन को तवज्जो देता है। हालांकि, गजेंद्र शहर नहीं जा पाया क्यूंकि उसे परिवार की फिक्र थी। वह, टीवी कैमरों के सामने नहीं बल्कि बंद कोठरी के अंधेरों में दम तोड़ता है। वह गुमनाम है। उसकी खबर अखबारों को मौत के 5 दिन बाद मिलती है। वह केवल स्थानीय पन्नों और क्षेत्रीय टीवी चैनलों पर स्थान बना पाता है।
यदि वास्तव में बिहार के किसानों और खेती को जानना है तो पहले गजेंद्र जैसे किसान की व्यथा को जानना होगा। वह सरकार को नहीं कोसता है बल्कि जीवनदाता को कोसता है। यदि वास्तव में बिहार के किसानों और खेती में प्रगती के अभिलाषी हैं तो सबसे पहले इन्हें मुख्यधारा में लाना होगा। बिहार के किसान लाईमलाईट में नहीं रहना चाहते हैं बल्कि उन्हें जागरुक करने की आवश्यकता है। सहनशीलता, परिश्रम और जुझारुपन से लबरेज किसानी ही नहीं बल्कि गुमनामी और बेरुखी की दंश झेल रही किसानी के रुप में भी वर्णित कीजिए बिहार के किसान को।