शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

ये कैसी शहीदी?

पाटलीपुत्र की राजधानी पटना के गांधी मैदान की रणभूमी मे राम और रावण के बीच हुए भीषण युद्ध में प्रयोग मे लाए गए विद्दुत जनीत बाणों के मायावी मार से 33 नगरवासीयों की जान गयी। राम की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इस प्रकार के  बाणों का प्रयोग रावण की सेना की तरफ से हुआ है। ब्रह्मा ने इस घटना के जाँच की जिम्मेदारी अपने खास मताहतों को सौंप दी है।
            शुक्रवार की शाम  गांधी मैदान की रणभूमी मे जैसे ही युद्भ की रणभेरी बजी नगरवासी अपने घरों से निकल कर रणक्षेत्र की ओर कूच करने लगे। गौरतलब है कि नगरवासी इस युद्ध मे राम की तरफ से ल़डने का फैसला किये थे। राम के दल ने युद्ध मे हौसला अफजाइ के लिए जनता को आमंत्रित भी किया था। पूरी तैयारी के साथ पहुँचे नगरवासीयों को तब यातनाएँ झेलनी पडी जब रणक्षेत्र के किसी एक भाग में बिजली वाले बाणों के चलने की खबर प्राप्त हुई
यद्दपि ये खबर बाद में कोरी अफवाह साबित हुई तथापि लोगों के बीच अफरातफरी जैसा माहौल हो गया। नगरबासीयों को इस बात का तनिक भी अंदेशा नहीं था कि युद्ध में ऐसे भी प्रयोग हो सकते हैं। ऐसी अफवाह सुनने के बाद ये लाजमी था कि लोगों के बीच दहशत का माहौल बन गया। लोग एक दुसरे से टकराने लगे,सबको रणक्षेत्र से बाहर जाने की जल्दी थी। ऐसे माहौल मे ये अक्सर देखा जाता है कि बिना एक किसी की परबाह किए लोग स्वंय और अपने परिवार को बचाने में लग जाते हैं। मानवीय भाव में भी कमी आ जाती है। ऐसे ही तबाही के आलम में 33 लोग अपनी जान गँवा बैठे और दो दर्जन से ज्यादा जख्मी हो गये। बाद मे इस बात की पुष्टि हुई कि ये महज एक अफवाह था बाकी कुछ नहीं।

          गौर करने वाली बात ये है कि वहाँ इस प्रकार के अफवाहों से निपटने के पुख्ता इंतजाम नहीं किये गये थे। जनता जो कि सिर्फ एक दल का हौसला बढाने गई थी उसका क्या कसूर था कि उन्हें अपने प्राणों की आहुति देनी पडी। आम जनता तो  ये सोच कर गयी थी कि वो जिस दल का हौसला अफजाइ करने जा रही है उनके प्राणों की रक्षा करेगा। क्या इस प्रकार के घटिया इंतजाम की जिम्मेदारी राम के दल की नहीं है? प्रथम दृश्या तो यह स्पष्ट होता है कि इस प्रकार की बदइंतजामी का सारा श्रेय राम के दल को ही जाता है। अब अगर कोई जिम्मेदारियों से ही अपना पल्ला झाडने लगे तब तो सिर्फ एक ही आस बचती है, न्याय के लिए गुहार। बहरहाल नगरवासीयों को न्याय मिलेगा या नहीं वक्त तय करेगा परंतु एक बात तय है कि ऐसी घटनाओं को झेलने के लिए हमें कमर कस लेने की जरुरत है। आगे भी इस प्रकार की घटनाएँ होंगी, प्रशासन की बेरुखी यही कहती है। घटना के बाद इस प्रकार की खबरे भी निकल के आयीं कि  राम रावण के युद्ध में 33 लोग शहीद हुए। कृपया इस प्रकार की उपमाएँ देने से परहेज करें। ऐसी शहीदी क्या होती है जरा उन पीडीतों से जानने का प्रयास किजीए। किसी ने अपनों को खो दिया है तो किसी के सपने मिट्टी मे मिल गए। जरा उनमें खुद को रख कर देखिए सारी शहीदी हवा हो जाएगी।

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

विकास या पर्यावरण

विकास क्या है? विकास के मापदण्ड क्या हैं? इन मानकों का निर्धारण किस प्रकार होगा? विकास की ये अवधारणा आज से ही नहीं बल्कि  लम्बे समय से एक पेचीदा मामला है। विद्वानों, अर्थशास्त्रियों, विकास के महान प्रणेताओं और भूमण्डलीकरण के पैरोकारों के बीच भी आज तक विकास की सही समझ स्थापित नहीं हो पायी है। दीगर बात ये है कि समय समय पर इनके एकत्रीत प्रयासों के माध्यम से विकास की कसौटी को जानने में थोडी सहुलियत हुई है। विकास के पैमाने चाहे जो भी हो पर एक बात तो जरुर है कि विकास की संरचना पर्यावरण या पारिस्थितिकी की आवश्याकताओं को समझे बगैर नहीं हो सकती।
         विकास के नाम पर हम पर्यावरण को अनदेखा नहीं कर सकते। विकास की उन सारी स्थापित या अनस्थापित अवधारणाओं की धमक  पर्यावरणीय सहुलियतों और आवश्यकताओं पर भारी नहीं पडनी चाहिए।विकास और पर्यावरण को अगर समान नजरिए से देखने का प्रयास किया जाए तो मेरे खयाल से शायद एक समन्वित अवधारणा स्थापित की जा सकती है।
         मानवीय सभ्यता के विकास में मानव और पर्यावरण (प्रकृति ) का अन्योन्याश्रय संबंध रहा है। इसे एक दुसरे से पृथक नहीं किया जा सकता। वर्तमान संदर्भ की बात करे तो पर्यावरणीय असंतुलन के लिए मुख्यत: मनुष्य ही उतरदायी है क्योंकि यही अपने पर्यावरण का सबसे प्रमुख और गतिशील कारक है। फर्ज किजिए कि जब कारक ही अपनी महत्वकांक्षाओं और भोगलिप्साओं की प्राप्ति के लिए, अपनी थोथी विकास आधारित अवधारणाओं के लिए सारी हदों तक जाने को तैयार हो तो फिर पर्यावरण कोकिस रुप में अपनाएग। जाहिर है कि वर्तमान संदर्भ में पर्यावरण पीछे छुटता चला जा रहा है। विकास की वही अवधारणाएं उस पर इस कदर हावी है कि अब इनसे दुषित भी होता चला जा रहा है।
         पर्यावरणीय महत्ता एक व्यक्ति के लिए जितनी मायने रखती रखती है उससे कहीं ज्यादा किसी विकासशील या फिर विकसित राज्य के लिए। पर्यावरण का उतना ही महत्व एक कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक है जितना की एक कारोबारी समुह के लिए। विकास के नाम पर किसी राष्ट्र से यही अपेक्षा की जाती है कि वह एक सुगठित व आधारभूत संरचना का निर्माण करे। ये संरचना सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक किसी भी प्रकार की हो सकती है। सवाल ये है कि क्या एक उन्नत संरचना के निर्माण के लिए पर्यावरणीय अवश्यकताएं और पर्यावरण के तत्व अपनी भूमिका सजग रुप से नहीं निभा सकते हैं ? पर्यावरण की महत्ता क्या संरचना के लिए कोई मायने नहीं रखती है?

         विकास की बात  करने पर अनयास ही ये लम्बी चलने वाली प्रक्रिया हो जाती है पर जब हम इसके अन्योन्याश्रयी संबंधी अर्थात् पर्यावरण को इसके बीच लाते हैं, प्रक्रिया की गतिशीलता शिथिल पडने लगती है। जरुरत है हमें पर्यावरण के भावी अवश्यकतों को जानने की वरना विकास के क्रम में पर्यावरणीय त्रासदी आसार हैं। उदाहरणों से सीख लेना होगा, पुन: उत्तराखण्ड और जम्मू जैसी आपदाओं से बचने के लिए।